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डॉक्टरी पर्चे में सुलेख

डॉक्टरों की लिखाई बरसों से मजाक का विषय बनी हुई है। लगता है, खराब लिखाई जैसे डॉक्टर होने की अनिवार्य शर्त है या डॉक्टर जान-बूझकर ऐसा लिखते हैं, जिसे पढ़ना बहुत मुश्किल हो। स्वास्थ्य मंत्रालय अब एक अधिसूचना जारी करने वाला है, जिसके मुताबिक डॉक्टरों को अपने पर्चे अंग्रेजी के कैपिटल अक्षरों में साफ-साफ लिखने होंगे और दवाओं के ब्रांड नाम के साथ ही उनके जेनेरिक नाम भी लिखने होंगे। हालांकि, ऐसा न करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ कोई कार्रवाई करने का प्रावधान नहीं होगा, पर एमसीआई के अन्य नियमों की तरह इसका पालन करना भी डॉक्टरों के लिए जरूरी होगा। ऐसा इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि डॉक्टरों की खराब लिखाई की वजह से मरीजों की जान खतरे में पड़ सकती है। यह आम अनुभव है कि दवा विक्रेता भी कभी-कभी डॉक्टर के पर्चे पर लिखी दवाओं का नाम नहीं पढ़ पाते। पुराने वक्त में जब ब्रांडेड दवाएं नहीं होती थीं, तब इस तरह की दिक्कत कम होती थीं, क्योंकि कम दवाएं होती थीं और दवा विक्रेता सही-सही अंदाजा लगा सकते थे। अब दवाओं के हजारों ब्रांड नाम हैं और कई-कई नाम तो इतने समान हैं कि उनमें एकाध अक्षर का ही फर्क है, लेकिन उन दवाओं के इस्तेमाल बिल्कुल अलग-अलग हैं। ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं कि ठीक से न पढ़ पाने के कारण गलत दवा दे दी गई और इससे मरीज की मौत तक हो गई। इस क्षेत्र में काम करने वाली एक संस्था का कहना है दुनिया में हर साल हजारों मरीजों की मौत इस वजह से होती है कि डॉक्टरों का लिखा ठीक से पढ़ा नहीं जा सका।

डॉक्टरों की लिखाई खराब होने के पीछे कई कारण बताए जाते हैं। एक तर्क यह है कि अन्य पेशे के लोगों की तरह ही डॉक्टरों की लिखाई भी अच्छी-बुरी होती है, लेकिन डॉक्टरों की लिखाई समाज की नजरों में ज्यादा आती है, इसलिए इस पर टीका-टिप्पणी ज्यादा होती है। डॉक्टर यह मानते हैं कि उनका काम मरीज देखना और उनका इलाज करना है, लिखना उनके काम का एक गौण पहलू है, इसलिए इसे वे लापरवाही और बेमन से करते हैं। फिर डॉक्टरों को, खासकर बड़े अस्पतालों से जुड़े डॉक्टरों को लिखने का काम बहुत करना पड़ता है, उन्हें तमाम मरीजों की केस हिस्ट्री, उनके लक्षण, तरह-तरह की रिपोर्ट, इलाज की जानकारी वगैरह लिखनी होती है, जिसमें बहुत ज्यादा वक्त खर्च होता है, इसलिए उन्हें जल्दबाजी में लिखने की आदत हो जाती है। यह भी देखा गया है कि डॉक्टरों की लिखाई ही नहीं, भाषा ज्ञान भी बहुत अच्छा नहीं होता, क्योंकि स्कूली शिक्षा खत्म होते ही वे चिकित्सा की पढ़ाई में जुट जाते हैं, जिसमें महत्व जानकारी और कौशल का होता है, अभिव्यक्ति का नहीं। कई देशों में यह कोशिशें जारी हैं कि हाथ से लिखने की बजाय हर चीज डिजिटल हो जाए, ताकि किसी तरह की गलतफहमी की गुंजाइश न रहे।

साफ लिखने से ज्यादा दिक्कत डॉक्टरों को दवाओं के जेनेरिक नाम लिखने में आ सकती है, क्योंकि एक बार प्रैक्टिस में आ जाने के बाद डॉक्टर अक्सर ब्रांड नामों से ही काम चलाते हैं, जेनेरिक नाम उन्हें याद भी नहीं रहते। अगर वे जेनेरिक नाम लिखने लगे, तो मरीज सस्ती या सहज उपलब्ध दवा को खोज सकता है। ब्रांडेड दवाओं के साथ अक्सर निहित स्वार्थ भी जुड़े होते हैं, क्योंकि अपने ब्रांड को चलाने के लिए दवा कंपनियां डॉक्टरों को तरह-तरह के प्रलोभन देती हैं। जेनेरिक नाम लिखने से इस प्रवृत्ति पर कुछ तो नियंत्रण लग सकता है। सुंदर अक्षरों में लिखी दवा ज्यादा कारगर होगी, यह तो नहीं कह सकते, लेकिन सही दवा ही मिलेगी, यह जरूर कहा जा सकता है।

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