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सरकारी मिठास

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने चीनी मिलों को 6,000 करोड़ रुपये का कर्ज स्वीकृत किया है, ताकि वे गन्ना किसानों को गन्ने की कीमत का भुगतान कर सकें। इससे चीनी मिलों और सबसे ज्यादा गन्ना किसानों को राहत मिलेगी। गन्ना किसान इस बात से बहुत परेशान हैं कि चीनी मिलों ने उन्हें गन्ने की कीमत का भुगतान नहीं किया है। बताया जाता है कि किसानों का 21,000 करोड़ रुपये का भुगतान चीनी मिलों पर बकाया है। कई चीनी मिलों ने सरकार से इस मामले में मदद मांगी थी, क्योंकि उनकी स्थिति भुगतान करने की नहीं है। इस कर्ज का बोझ सरकारी खजाने पर लगभग 600 करोड़ रुपये का होगा, क्योंकि एक साल तक इस कर्ज का भुगतान नहीं किया जाएगा और इस साल का ब्याज सरकार को भरना पड़ेगा। 2013 में भी सरकार ने इसी तरह 6,600 करोड़ रुपये का ब्याज मुक्त कर्ज चीनी मिलों को दिया था। इस स्थिति की वजह यह है कि चीनी के दाम इस साल काफी गिरे हैं। इस साल चीनी का उत्पादन भी 2.80 करोड़ टन होने का अनुमान है, जबकि देश में खपत का अनुमान 2.40 करोड़ टन है, यानी जरूरत से ज्यादा उत्पादन की वजह से दाम बढ़ने की कोई संभावना नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चीनी के दाम काफी कम हैं और निर्यात से भी कोई फायदा नहीं होगा। सरकार ने आयातित चीनी पर आयात शुल्क 20 प्रतिशत कर दिया है और निर्यात पर 4,000 रुपये प्रति टन की सब्सिडी दी है।

ये सारे उपाय बार-बार करने पड़ते हैं और चीनी उद्योग बार-बार संकट में आता रहता है, इसका अर्थ यह है कि इसमें कुछ बुनियादी गड़बड़ियां हैं। गन्ना एक व्यापारिक फसल है और इसका अर्थ यह है कि गन्ना किसानों को अच्छी फसल आने पर अच्छा मुनाफा होना चाहिए। लेकिन चीनी  का अर्थशास्त्र ऐसा बना हुआ है कि किसान की परेशानी कभी कम नहीं होती। सरकार गन्ना किसान, चीनी मिल और उपभोक्ता, सबको संरक्षण देने और किसी को नाराज नहीं करने के लिए तरह-तरह के उपाय करती है और यह उद्योग और ज्यादा पेचीदा गांठों में फंस जाता है। चीनी उद्योग की सबसे बुनियादी समस्या भारतीय खेती की बुनियादी समस्या से जुड़ी है कि हमने फसलों के लिए जमीन का तर्कसंगत विभाजन करने की कोशिश नहीं की है। गन्ने में इसलिए एक नियमित चक्र चलता है। गन्ने की कमी की वजह से चीनी के दाम बढ़ते हैं, जब चीनी के दाम बढ़ते हैं, तो किसान ज्यादा गन्ना बोते हैं और जब ज्यादा गन्ना हो जाता है, तो उत्पादन बढ़ जाता है और दाम गिर जाते हैं। चीनी की जरूरत और सप्लाई के बीच जो संतुलन बने रहना चाहिए, वह कभी नहीं बन पाता। गन्ने को लेकर तमाम किस्म की पाबंदियां हैं, जिनकी वजह से भी किसान अपनी फसल की ठीक कीमत नहीं पाता। व्यापार और उद्योगों में मुक्त बाजार का फायदा इस उद्योग को नहीं मिला है और यह उद्योग हमेशा सरकार के सहारे रहता है।

सबसे बड़ी जरूरत यह है कि धीरे-धीरे सरकार इस उद्योग से खुद को बाहर करने की कोशिश करे। इसके लिए शुरुआत में किसानों को जरूर सहारा देना पड़ेगा, लेकिन इससे चीनी के दाम भी स्थिर होंगे और मिलें भी अच्छी हालत में आएंगी। गुड़, खांडसारी और एथेनॉल जैसे गन्ने के अन्य उत्पादों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। इस मानसिकता से बाहर आना जरूरी है कि गन्ने का अर्थ सिर्फ चीनी है। जब गन्ने को बहुउपयोगी फसल की तरह देखा जाएगा, तो किसानों के पास विकल्प होंगे और उनके पास ज्यादा पैसा आएगा। खुले बाजार के बिना वे बेहतर स्थिति में नहीं आएंगे। सरकार सहायता करे, यह अच्छा है, लेकिन कोशिश यह होनी चाहिए कि इसकी जरूरत न पड़े।

 

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