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भ्रष्टाचार का हारमोन

जॉन डालबर्ग-एक्टन उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज राजनेता, लेखक और इतिहासकार थे। उनका नाम तो कम लोगों ने सुना होगा, लेकिन उनका एक वाक्य शायद दुनिया के सर्वाधिक चर्चित वाक्यों में से एक है- सत्ता भ्रष्ट करती है और असीम सत्ता, असीमित रूप से भ्रष्ट करती है। यह वाक्य अक्सर यहां-वहां खूब बोला और सुना जाता है। लेकिन स्विट्जरलैंड में मानव व्यवहार का अध्ययन करने वाले कुछ वैज्ञानिकों ने इस वाक्य की असलियत जानने के लिए कुछ दिलचस्प प्रयोग किए। वे सत्ता और भ्रष्टाचार के रिश्तों के साथ ही भ्रष्टाचार, सत्ता और मानव व्यवहार के ताने-बाने की गहराई से पड़ताल करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने प्रबंधन के कुछ छात्रों के साथ कुछ प्रयोग किए। ये प्रयोग काफी सारे और काफी जटिल थे, फिलहाल उनकी तफसील में जाना संभव नहीं है, लेकिन जो निष्कर्ष निकले, वे काफी दिलचस्प थे। उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि व्यक्ति तानाशाह कैसे बनता है और कब वह व्यक्तिगत हित के लिए सार्वजनिक हित को कुर्बान कर सकता है। उन्होंने पाया कि भ्रष्ट होने की संभावना बहुत ज्यादा प्रतिशत लोगों में होती है और यह संभावना सत्ता की मात्रा के अनुपात में बढ़ती जाती है। यानी सत्ता बढ़ते ही भ्रष्टाचार भी उसी अनुपात में बढ़ जाता है। एक निष्कर्ष उन्होंने निकाला कि पुरुष हारमोन टेस्टोस्टेरॉन की मात्रा का सीधा रिश्ता भ्रष्ट होने से है, यानी जिसमें यह हारमोन ज्यादा होगा, उसके भ्रष्ट होने की आशंका भी ज्यादा होगी।

टेस्टोस्टेरॉन किसी न किसी रूप  में तमाम रीढ़ की हड्डी वाले जीवों में पाया जाता है। इंसानों के संदर्भ में स्त्रियों के मुकाबले पुरुषों में इसकी मात्रा सात-आठ गुना ज्यादा होती है। इसी हारमोन की वजह से पुरुषों में मजबूत मांसपेशियों, दाढ़ी-मूंछें, भारी आवाज वगैरह गुण आते हैं। व्यवहार के लिहाज से यह हारमोन आक्रामकता और खतरा उठाने की प्रवृत्ति से जुड़ा होता है, इसलिए इसे नेतृत्व से भी जोड़ा जाता है। लेकिन हम देखते हैं कि जिन्हें हम गुण या दुर्गुण कहते हैं, वे अलग-अलग नहीं होते, बल्कि एक ही प्रवृत्ति कभी गुण और कभी दुर्गुण भी बन जाती है। ऐसे में, टेस्टोस्टेरॉन के साथ दुस्साहस, तानाशाही और आत्मकेंद्रित होने जैसे दुर्गुण भी जुड़ जाते हैं। यानी व्यक्ति दूसरों के सुख-दुख व भावनाओं के प्रति कम संवेदनशील रह जाता है और अपने सुख और अपनी सफलता से ज्यादा जुड़ जाता है। जो साहस और आक्रामकता किसी की मदद उसमें नेतृत्व क्षमता पैदा उपजाने में करती है, वही दुस्साहस और क्रूरता का रूप भी धारण कर लेती है। इन सारी बातों की वजह से अक्सर नेताओं को अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपने या विरोधी पक्ष के लोगों को कुर्बान करने में हिचक नहीं होती और वे सत्ता पाकर भ्रष्ट भी हो जाते हैं। जॉन डालबर्ग-एक्टन के उद्धरण का अगला वाक्य उतना चर्चित नहीं है- महान व्यक्ति अक्सर बुरे होते हैं।

यहां हमारे लिए यह याद रखना जरूरी है कि परहित भी इंसान की बहुत बुनियादी प्रवृत्ति है और वैज्ञानिक प्रयोगों में यह पाया गया है कि परहित करने से इंसानों में ऐसे हारमोन स्रवित होते हैं, जो खुशी और संतुष्टि देते हैं। इस नए प्रयोग से यही साबित होता है कि क्रूरता और भ्रष्टाचार के बीज भी इंसान में होते हैं। इसीलिए समाज में ऐसी संस्थाएं बनाई जाती हैं, जो व्यक्तिगत तानाशाही, क्रूरता और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रख सकें। सत्ता का विकेंद्रीकरण और संस्थाओं का नियंत्रण असीमित सत्ता और उससे जुड़े असीमित भ्रष्टाचार की आशंका को कम करता है। प्रकृति ने संतुलन और नियंत्रण के कई तंत्र विकसित किए हैं। समाज-संस्कृति ने भी और इनके सहारे अपने उजले पक्ष को मजबूत करने को ही सच्चा पुरुषार्थ माना है।

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