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मणिपुर में आतंकी हमला

मणिपुर में जिस आतंकवादी हमले में 20 सैनिक मारे गए हैं, वह पिछले लंबे दौर में उत्तर-पूर्वी भारत का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला है। कई आतंकी गुटों ने मिलकर यह हमला किया है और इस तरह के हमले का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि ये गुट और ज्यादा हमलों की योजना बना रहे हों। ऐसी आशंका के लिए स्थानीय स्तर पर राज्य सरकारों को और सेना को सचेत हो जाना चाहिए, क्योंकि ऐसे हमलों से न सिर्फ प्राणहानि होती है, बल्कि अस्थिरता और अशांति का जो माहौल बनता है, उससे आम जनता की स्थिति खराब होती है। इसके अलावा, सरकार की क्षमता में लोगों का विश्वास भी घटता है।

इसका अर्थ यह कतई नहीं निकालना चाहिए कि ये आतंकवादी गुट मजबूत हो रहे हैं। इसका अर्थ शायद यह है कि वे ज्यादा कमजोर हो रहे हों और अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए ऐसी वारदात कर रहे हों। यह वारदात ऐसे वक्त पर हुई है, जब प्रतिबंधित गुटों का भारत सरकार के साथ सैनिक कार्रवाई रोकने का समझौता चल रहा है। इनमें से कुछ गुट पड़ोस के म्यांमार के जंगलों में रहते हैं, जहां से भारत की सीमा में घुसकर वे वारदात करते हैं। जमीनी स्तर पर इन गुटों की स्थिति बहुत मजबूत नहीं है और वे अपना विचारधारात्मक आधार भी खो चुके हैं। अलगाववाद का नारा और उसके पीछे का विचार बहुत पहले ही व्यर्थ हो चुका है, मगर ज्यादातर गुट इन्हीं नारों के नाम पर सक्रिय हैं, इसलिए वे अपना कारोबार चलाए हुए हैं। सही अर्थों में ये गुट अपराधी गिरोहों में तब्दील हो चुके हैं और तस्करी, अपहरण जैसे अपराधों से अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। ऐसे में, अपना आतंक बनाए रखने के लिए वे एक तरफ कबीलाई रिश्तों का दोहन करते हैं और दूसरी ओर इस तरह की वारदातें करते हैं। एक बड़ी समस्या यह है कि लंबे वक्त तक भारत सरकार का पूरा ध्यान अलगाववादी आंदोलनों से निपटने में लगा रहा, इसलिए उत्तर-पूर्वी राज्यों में प्रशासन को दुरुस्त करना कभी प्राथमिकता नहीं रही।

ऐसे में, स्थानीय सरकारें भ्रष्टाचार और निकम्मेपन का शिकार रहीं। इससे आम जनता की मुश्किलें बढ़ती रहीं और इन आतंकवादी गुटों का प्रभाव बना रहा। दूसरी ओर, भारत के इस हिस्से का बहुत बड़ा क्षेत्र सेना के अधीन रहा है, इसलिए स्थानीय सुरक्षा बल भी बहुत प्रभावशाली नहीं रहे। अगर स्थानीय स्तर पर प्रशासन को ज्यादा चुस्त और जवाबदेह बना दिया जाए, तो इन गुटों का बचा-खुचा प्रभाव भी खत्म हो जाएगा, जो वैसे भी तेजी से घट रहा है।
ऐसी स्थिति में यह तो जरूरी है ही कि इन गुटों से सख्ती से निपटा जाए, लेकिन इससे भी जयादा जरूरी यह है कि स्थानीय प्रशासन को मजबूत बनाने की कोशिश की जाए। यह भी संभव है कि इन गुटों की कोशिश शांति और समझौते की प्रक्रिया को भंग करने की रही हो, क्योंकि ये गुट बुरी तरह आपस में बंटे हुए हैं और इनके कई धड़े शांति नहीं चाहते।

एक और बड़ी कोशिश म्यांमार से इन्हें खदेड़ने की होनी चाहिए। भारत सरकार यह कोशिश कर रही है कि म्यांमार के उन इलाकों तक पहुंच आसान हो, जिनका इस्तेमाल ये गुट करते हैं। एक बड़ी योजना म्यांमार के रास्ते उत्तर-पूर्व तक सड़क बनाने की भी है। अगर ये योजनाएं पूरी हो गईं, तो इन जंगलों में इन गुटों का शरण पाना मुश्किल हो जाएगा। जिन रास्तों से तस्करी के जरिए इन्हें हथियार मिलते हैं, उन्हें भी बंद करना जरूरी है और इसमें म्यांमार और बांग्लादेश मदद कर सकते हैं। उत्तर-पूर्व में अलगाववाद वैचारिक रूप से खत्म हो गया है, लेकिन उसका व्यर्थ हिंसक प्रभाव अभी तक बाकी है, अब उसे खत्म करना जरूरी है।

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