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रिश्तों के खांचे

चीन का कहना है कि भारत-चीन सीमा के विवादों को सुलझाने की बजाय दोनों देशों को सीमा के मसले पर एक आचरण संहिता बनानी चाहिए। नरेंद्र मोदी ने चीन यात्रा के दौरान चीनी नेताओं से यह कहा था कि दोनों देशों को सीमा विवाद और अन्य विवादास्पद मसले सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि ये मसले दोनों देशों के संबंधों में रुकावट बने रहेंगे। चीनी प्रतिक्रिया का सरल मतलब यह है कि चीन व्यापारिक संबंधों और अन्य मसलों को अलग-अलग रखकर देखना चाहता है। इसके बरक्स नरेंद्र मोदी का आग्रह यह था कि इस तरह मुद्दों को अलग-अलग खांचों में नहीं रखा जा सकता। चीन यह चाहता है कि आर्थिक रिश्तों में तेजी से बढ़ोतरी हो और व्यापारिक लेन-देन बढ़ता रहे। अन्य द्विपक्षीय मसलों में यथास्थिति बनी रहे और सिर्फ इस बात का ख्याल रखा जाए कि कोई विवाद एक हद से ज्यादा न बढ़ पाए। चाहे अरुणाचल और जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को नत्थी वीजा देने का मामला हो या पाक अधिकृत कश्मीर में चीन द्वारा सैनिक महत्व का निर्माण करने का सवाल, ये मुद्दे ऐसे ही बने रहें और सीमा पर हल्का-फुल्का शक्ति परीक्षण भी चलता रहे।

भारत और चीन के रिश्ते लगभग 1962 के युद्ध के बाद से इसी तरह बने हुए हैं। दोनों देशों ने इसके बाद कोई जंग नहीं लड़ी, लेकिन किसी भी विवादास्पद मुद्दे पर किसी किस्म के समझौते के आसपास भी दोनों देश नहीं पहुंचे। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार खूब बढ़ा है, भविष्य में इसके और ज्यादा बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन यह भी तय है कि अन्य मुद्दों पर विवाद भी चलता रहेगा। इन तमाम विवादों में ऐसा कोई बिंदु नहीं है, जिस पर भारत-चीन में सहमति हो सके। चीन की महत्वाकांक्षा महाशक्ति बनने के साथ-साथ विश्व शक्ति संतुलन में अमेरिका के मुकाबले का ध्रुव बनने की है। आर्थिक और सामरिक स्तर पर भारत चीन से काफी पीछे है, लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था भी तेजी से बढ़ रही है। भारत का पलड़ा भारी करने वाला सबसे बड़ा तत्व यह है कि यह एक लोकतांत्रिक देश है और बाकी दुनिया में उसके रिश्ते ज्यादा मित्रतापूर्ण हैं। एशिया-प्रशांत क्षेत्र के अन्य लोकतांत्रिक देश चीन को शक की नजरों से देखते हैं। उन्हें यह लगता है कि भारत इस क्षेत्र में और हिंद महासागर में चीन के वर्चस्व को रोक सकता है। ऐसे में, चीन उन तमाम मुद्दों को यथावत रखना चाहता है, जिनका इस्तेमाल वह भारत के खिलाफ कर सके। उसका सबसे बड़ा हथियार पाकिस्तान है, जिसकी आड़ में वह भारत को घेर सकता है। जम्मू-कश्मीर में किसी भी तरह का समझौता उसकी इस रणनीति के आड़े आएगा। अरुणाचल प्रदेश पर उसका दावा तिब्बत पर उसके दावे से जुड़ा है और वह जानता है कि तिब्बत पर उसके अधिकार का नैतिक वजन नहीं है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो पक्ष अपनी चीन यात्रा में रखा, वह इस यथास्थिति को चुनौती देने की कोशिश है। भारत अच्छी तरह जानता है कि इन मुद्दों पर समझौते के कोई आसार निकट भविष्य में नहीं हैं और चीन जो कह रहा है, व्यावहारिक बात वही है, लेकिन अब भारत यह जता रहा है कि निष्क्रिय होकर यथास्थिति को बर्दाश्त नहीं करेगा। चीन यात्रा को मंगोलिया और दक्षिण कोरिया की यात्रा से जोड़कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह संकेत तो दिया ही है कि भारत भी चीन के उन पड़ोसियों के साथ है, जिनके चीन से रिश्ते बहुत अच्छे नहीं हैं। भारत सरकार भी चीन के साथ व्यावसायिक रिश्तों को बढ़ाना चाहती है, लेकिन अन्य मुद्दों पर भी स्थिति वैसी ही न रहे, जैसा चीन चाहता है।

 

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