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केजरीवाल की चुनौती

दिल्ली सरकार ने अपने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) के लिए बिहार से छह पुलिस अफसरों को प्रतिनियुक्ति पर लिया है। इस कदम का भ्रष्टाचार के नियंत्रण पर क्या असर होगा, यह सवाल छोड़ भी दिया जाए, तो इसके राजनीतिक निहितार्थ काफी दिलचस्प हैं। दिल्ली में उप-राज्यपाल के जरिए केंद्र सरकार और निर्वाचित 'आप' सरकार के बीच जो द्वंद्वयुद्ध चल रहा है, उसकी एक चाल की तरह इस कदम को समझा जा सकता है। इस फैसले से आप ने यह संदेश दिया है कि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए वह गंभीर है और दिल्ली पुलिस उसके पास नहीं है, इसलिए उसने एसीबी को मजबूत बनाने का फैसला किया है। आमतौर पर दिल्ली के एसीबी में दिल्ली पुलिस के ही अधिकारी होते हैं, लेकिन बिहार से अधिकारी लाकर आप यह भी जताने की कोशिश कर रही है कि दिल्ली पुलिस की वफादारी पर उसे भरोसा नहीं है। उसे यह लग रहा है कि दिल्ली में केंद्रीय सेवाओं के अफसरों की वफादारी केंद्र सरकार और उप-राज्यपाल के साथ है। इससे केंद्र के मन में यह संदेह तो पैदा होगा ही कि अरविंद केजरीवाल एसीबी को एक समानांतर पुलिस बल की तरह खड़ा कर रहे हैं।

उप-राज्यपाल नजीब जंग ने इन नियुक्तियों का विरोध किया है, उनका मानना है कि पुलिस से संबंधित मामलों पर केंद्र के प्रतिनिधि होने के नाते उनका अधिकार है। उनका यह भी कहना है कि एसीबी उप-राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में आता है। उप-राज्यपाल के विरोध से यह मामला जटिल हो जाएगा, क्योंकि बिहार सरकार ने इन अफसरों को दिल्ली भेजा है। ये अधिकारी ऊंचे पदों पर नहीं हैं और केंद्रीय सेवाओं से नहीं हैं। ये बिहार की प्रांतीय सेवाओं से हैं, इसलिए केंद्र सरकार के अधीन नहीं हैं। उप-राज्यपाल के हस्तक्षेप से केजरीवाल को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि केंद्र भ्रष्टाचार विरोधी उनकी मुहिम के खिलाफ है। जटिल स्थिति तब आएगी, जब दिल्ली पुलिस या डीडीए या केंद्र सरकार के अधीन अन्य विभागों के भ्रष्टाचार के मामलों की शिकायतें एसीबी के पास आएंगी। राजनीतिक नजरिये से यह चतुराई भरा कदम है, क्योंकि इसका विरोध करने पर दिल्ली भाजपा की स्थिति कठिन हो जाएगी। दिल्ली में भाजपा राज्य सरकार को ज्यादा अधिकार देने, बल्कि दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने की वकालत करती रही है और उप-राज्यपाल का समर्थन करने से जनता में उसकी विश्वसनीयता घट रही है। दूसरी ओर, केजरीवाल ने इसके जरिए यह भी संकेत दिया है कि सारी राजनीतिक पार्टियों से दूरी बनाए रखने की नीति उन्होंने बदल दी है और नीतीश कुमार को उन्होंने सीमित दायरे में ही सही, सहयोगी बना लिया है। नीतीश कुमार की छवि भी साफ-सुथरी है, इसलिए इससे केजरीवाल को कोई दिक्कत नहीं होगी और जद (यू) का समर्थन उनकी स्थिति मजबूत करेगा।

केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के बीच का द्वंद्व अब राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के पाले में है, लेकिन यह साफ है कि इस झगड़े से दिल्ली की जनता का भारी नुकसान हो रहा है। यह झगड़ा इसलिए खड़ा हुआ है, क्योंकि दोनों ही पक्षों ने एक-दूसरे का विरोध करने की ठान ली है, वरना समझ-बूझ और लोकतंत्र के मूल्यों के आधार पर केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार मिल-जुलकर काम कर सकती है। इस झगड़े की वजह से सरकारी अमला भी अनिश्चय की स्थिति में है। यह टकराव और बढ़ा, तो स्थिति ज्यादा खराब हो सकती है और इन अधिकारियों की नियुक्ति से केजरीवाल ने उप-राज्यपाल को चुनौती दी है। अब भी वक्त है कि सांविधानिक मर्यादा का लिहाज करके इन झगड़ों को बढ़ने से रोका जाए।

 

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