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शिक्षा की विश्वसनीयता

बिहार की इंटरमीडिएट परीक्षा में अव्वल आने वाले छात्रों का घोटाला उजागर होने के बाद बिहार सरकार ने काफी सख्त कदम उठाए हैं। दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है और जिस शिक्षा संस्थान से इन फर्जी अव्वल नंबर छात्रों ने परीक्षा दी थी, उसकी मान्यता रद्द कर दी गई है।

यह जरूरी भी था कि बिहार में शिक्षा विभाग की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए सख्त कार्रवाई की जाती। इस साल राज्य में मैट्रिक की परीक्षा में धांधली और नकल रोकने के लिए सरकार ने सख्ती दिखाई, जिसका नतीजा यह है कि 50 प्रतिशत से भी कम छात्र पास हो पाए हैं। भले ही बड़ी संख्या में छात्र फेल हुए हों, लेकिन इससे यह तो समझ में आता है कि वास्तव में राज्य में शिक्षा की क्या स्थिति है? अगर वास्तविक स्थिति सामने होगी, तो उसका इलाज भी संभव होगा। अगर धांधली और नकल के जरिये शानदार नतीजे आते रहे, तो यह बिहार की शिक्षा व्यवस्था और छात्रों को अंधेरे में धकेलने जैसा होगा। टॉपर घोटाले से यह पता चलता है कि तमाम सख्ती के बावजूद कुछ लोग गड़बड़ी करने से बाज नहीं आते।

परीक्षाओं में सख्ती बरतना एक अच्छा कदम है और इससे शिक्षा संस्थानों पर पढ़ाई का स्तर बेहतर करने के लिए दबाव बनेगा। लेकिन यह अपने आप में मुकम्मल कदम नहीं है। बिहार में यह घोटाला खुल गया, लेकिन कई और राज्यों में शिक्षा की हालत कमोबेश ऐसी ही होगी। मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले से यह साबित होता है कि परीक्षाओं में धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार अब कुटीर उद्योग नहीं है, बल्कि विशाल उद्योग का रूप धारण कर चुका है और यह उद्योग अंतरराज्यीय स्तर पर काम करता है। इसके पनपने की सबसे बड़ी वजह यह है कि आम परिवार के छात्रों के लिए बेहतर भविष्य की संभावनाएं परीक्षाओं में अच्छे नंबरों से जुड़ी हैं। अवसर कम हैं और प्रतिस्पर्द्धा तगड़ी है, इसलिए अच्छे नंबरों के लिए सही-गलत तरीके अपनाने में अक्सर छात्र, अभिभावक और शिक्षा संस्थान संकोच नहीं करते।

हमारे यहां छात्रों की योग्यता, ज्ञान या दिलचस्पी जानने का कोई विश्वसनीय तंत्र नहीं है, क्योंकि परीक्षाओं में नंबर पाने के कई तरीके हो सकते हैं। इस व्यापक भ्रष्टाचार को रोकने के लिए शिक्षा व्यवस्था में बड़े परिवर्तन करने होंगे, और ये परिवर्तन इक्का-दुक्का राज्य के बस की बात नहीं है। जो सरकारें इसमें सुधार करना चाहती हैं, वे बिहार सरकार की तरह ही परीक्षाओं को विश्वसनीय बनाने और शिक्षा संस्थानों में पढ़ाई का स्तर बेहतर बनाने की कोशिश कर सकती हैं। लेकिन इस कोशिश की अपनी सीमा है। शिक्षा को वास्तव में बेहतर बनाने के लिए राष्ट्रव्यापी बदलाव की जरूरत है।

शिक्षा का महत्व और उसकी जरूरत असंदिग्ध है, लेकिन उस पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए और जितने संसाधन उसमें लगने चाहिए, उतने नहीं दिए जाते। इससे शिक्षा में तरह-तरह की गड़बडि़यां और घोटालों की गुंजाइश होती है। सबसे बड़ी जरूरत यह है कि शिक्षा में सार्वजनिक निवेश बढ़ाया जाए। कई जानकार यह कहते हैं कि सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश को भारत में विकास का मुख्य आधार बनाया जाए। हमारे देश में इन क्षेत्रों की उपेक्षा से गंभीर परिस्थितियां पैदा हो रही हैं। शिक्षा में सार्वजनिक निवेश बढ़ेगा और उस पर ध्यान दिया जाएगा, तो आने वाली पीढि़यां काबिल, हुनरमंद और सचमुच पढ़ी-लिखी होंगी। वरना हमारा परीक्षा तंत्र लगातार घोटालों और धांधलियों का शिकार होता रहेगा। बिहार का टॉपर घोटाला बीमारी नहीं, बीमारी का लक्षण है, और इस व्यापक बीमारी का इलाज राष्ट्रव्यापी स्तर पर किया जाना जरूरी है।

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  • Web Title:education reliability and bihar