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बदलाव की तारीख

कहा जाता है कि समय हमेशा एक सा नहीं होता, वह बदलता रहता है। भारत जैसे देश में अगर एक ऐसी तारीख तलाशी जाए, जब एक साथ बहुत से लोगों का समय बदल जाता है, तो वह तारीख निर्विवाद रूप से एक अप्रैल ही होगी। इसलिए नहीं कि अप्रैल की पहली तारीख को मूर्ख दिवस मनाया जाता है, एक ऐसा दिन जब हम अपने और दूसरों की मूर्खता पर लज्जित नहीं होते, बल्कि उसका उत्सव मनाते हैं। काश, एक अप्रैल की तिथि इसी अर्थ में हमारे जीवन को बदलती, तो शायद ज्यादा अच्छा होता। मगर एक अप्रैल का ज्यादातर बदलाव हमारी जेब, हमारी जमापूंजी के जरिये आता-जाता है। हमारे देश में यह तारीख हमारी बुद्धि के परिहास से उतनी नहीं जुड़ती, जितनी हमारी आर्थिक स्थिति से होने वाले सालाना सुलूक से जुड़ती है। एक अप्रैल नए वित्त वर्ष का पहला दिन होता है, जिस दिन हम पुराने वित्त वर्ष के कई आर्थिक बोझ से मुक्ति पाकर नए वित्त वर्ष के आर्थिक बोझ तले पहुंच जाते हैं। यह जरूर है कि एक अप्रैल से सब कुछ बुरा नहीं होता। करों की बहुत सी राहतें और रियायतें भी हमें इसी दिन से मिलनी शुरू होती हैं। ज्यादातर कर्मचारियों की वेतन वृद्धि भी इसी दिन से लागू होती है। लेकिन मानव स्वभाव इसे अलग ढंग से देखता है। राहतें, रियायतें और वेतन वृद्धि कितनी भी हो, हमें हमेशा ही अपनी उम्मीद से कम लगती है, और एक अप्रैल से लागू होने वाले नए कर, शुल्क वगैरह जरूरत से ज्यादा कमरतोड़ दिखाई देते हैं। 
अब आज शुरू हो रहे वित्त वर्ष को ही लें। आज से होम लोन की ब्याज दर कम हो रही है। पानी स्वच्छ करने वाले आरओ सस्ते हो रहे हैं। डाक सेवा की दरों में कमी हो रही है, साथ ही रेल टिकट की ऑनलाइन बुकिंग भी। चमड़े के सामान से लेकर बायोगैस तक कई चीजें हैं, जिनके सस्ती होने की खबरें आ रही हैं।

लेकिन इनमें से कोई भी राहत लोगों को उस तरह खुश नहीं कर रही, जिस तरह से यह खबर दुखी कर रही है कि अब अगर बैंक खाते में मिनिमम बैलेंस से कम पैसे हुए, तो भारी शुल्क अदा करना होगा। सोशल मीडिया पर इन दिनों जितनी चर्चाएं इस बात की हैं, किसी और चीज की नहीं हैं। ऐसी ही, दूसरी परेशान करने वाली खबर यह है कि अब स्वास्थ्य बीमा के लिए पहले से ज्यादा प्रीमियम चुकाना होगा और वाहन के बीमा के लिए भी। कड़े जुर्माने के कई नए प्रावधान भी इस बार एक अप्रैल से लागू हो रहे हैं। जैसे आयकर रिटर्न दाखिल करने में देरी पर लगने वाला जुर्माना हो या फिर दो रुपये से ज्यादा के नगदी लेन-देन के लिए लगने वाला भारी दंड हो। हो सकता है कि इनमें से बहुत सी चीजों से हमारा कभी वास्ता न पड़े, लेकिन भारी दंड के प्रावधान हमें परेशान तो करते ही हैं।


ऐसा नहीं है कि एक अप्रैल को आर्थिक नियम-कायदों और प्रावधानों में भारी बदलाव की परंपरा को सभी अर्थशास्त्री स्वीकार करते हों, इसकी आलोचना भी होती रही है। आलोचकों का कहना है कि अर्थव्यवस्था एक सतत प्रक्रिया है, कोई ऐसा सालाना उपक्रम नहीं कि हर साल एक दिन पतझड़ आए, पुराने सारे पत्ते गिर जाएं और उनकी जगह नए आ जाएं। इसलिए सालाना बजट पेश करने की बजाय हमें समय-समय पर आर्थिक नीतियों में वक्त जरूरत बदलाव करते रहना चाहिए। ऐसे बदलाव होते भी हैं, पर सालाना बजट की परंपरा को बदलना आसान नहीं है। एक तो यह हमारे लिए गिरेबान में झांकने का मौका होता है और दूसरे यह कई तरह से राजनीतिक औजार का काम भी करता है। सरकार से लेकर कॉरपोरेट जगत तक सभी इसी अवधारणा के आस-पास चलते हैं। जब तक यह अवधारणा नहीं बदलती, बदलाव के लिए एक अप्रैल अच्छी तारीख है।

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  • Web Title:date of change