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क्वेटा में विस्फोट

आतंकवादी वारदात दुनिया में कहीं भी हो, चौंकाती भी है और परेशान भी करती है। इसका अपवाद शायद सिर्फ पाकिस्तान है, जहां ऐसी घटनाएं भी रोजमर्रा की चीज ही लगती हैं। सोमवार को बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी क्वेटा के सिविल अस्पताल में हुए बम विस्फोट की घटना कुछ ऐसी ही है। ऐसी वारदात कहीं और हुई होती, तो शायद उस दिन की सबसे बड़ी सुर्खियों में होती, लेकिन यह वारदात पाकिस्तान में हुई है, इसलिए दोपहर होते-होते मीडिया में यह दूसरी खबरों के नीचे दब-सी गई। 

बेशक, यह वारदात भी उतनी ही निंदनीय है, जितनी कोई अन्य जघन्य आतंकवादी वारदात हो सकती है। इसकी खासकर इसलिए भी निंदा की जानी चाहिए कि इसमें ऐसे बेगुनाह लोगों को निशाना बनाया गया, जो अपना या अपने परिजनों के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे हुए थे। पर ऐसी वारदात को रोजमर्रा की घटना मान लिया जाना पाकिस्तान के प्रति कोई उदासीनता नहीं, बल्कि इसके पीछे वहां के हालात से दुनिया का निराश हो जाना भी है। खुद पाकिस्तान ऐसी वारदात को लेकर कितना गंभीर है, यह क्वेटा की घटना से जाहिर हो जाता है। विस्फोट के एक घंटे के भीतर सूबे की सरकार ने यह कह दिया कि वारदात के पीछे भारत का हाथ है, जबकि तब तक प्रारंभिक जांच भी नहीं हो सकी थी। 

पाकिस्तान जब यह कहता है कि आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार वह खुद है, तो तथ्यात्मक रूप से इस बात में कुछ भी गलत नहीं है। पाकिस्तान में आतंकवादी वारदात जिस तादाद में होती रही हैं, उतनी इस समय शायद ही दुनिया में किसी और जगह पर हो रही हों। लेकिन दिक्कत यह है कि पाकिस्तान इसे शायद अपनी सबसे बड़ी समस्या नहीं मानता। अगर वह मानता होता, तो इससे निपटने की गंभीर कोशिश करता दिखाई देता। 

सच यह है कि पाकिस्तान का पूरा तंत्र आतंकवादियों की पौध तैयार करने, उन्हें पूरी दुनिया में रोपने और उनके राजनीतिक व कूटनीतिक इस्तेमाल पर आधारित हो चुका है। आतंकवाद जिस कट्टरता की जमीन पर पनपता है, उसे पाकिस्तान ने अपनी मुख्यधारा बना लिया है। कोई भी देश जिस चीज का सबसे ज्यादा उत्पादन व निर्यात करता है, वह उसका सर्वाधिक उपभोग भी करता है। इस लिहाज से भी पाकिस्तान आतंकवाद का दंश भोगने के लिए अभिशप्त है। अगर वह सचमुच इसे खत्म करना चाहे, तो उसे पूरे समीकरण को पलटना होगा। इसे पलटने में फिलहाल उसकी दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि अगर ऐसा हो सका, तो वहां के सत्ता प्रतिष्ठान को मुल्क का विकास करने और अवाम की बदहाली दूर करने जैसे कठिन कर्तव्यों से जूझना होगा।

यह विस्फोट बलूचिस्तान में हुआ है, जो कई तरह से पाकिस्तान की दुखती रग है। यह पाकिस्तान का ऐसा गरीब व बदहाल इलाका है, जिसके पास अकूत प्राकृतिक संसाधन हैं। वाबजूद इसके वहां के विकास में पाकिस्तान की कोई दिलचस्पी नहीं है। दशकों से चली आ रही इसी उपेक्षा के कारण अब वहां के लोग पाकिस्तान से आजादी मांगने लगे हैं। वे इसके लिए कई तरह से संघर्ष भी कर रहे हैं। दुनिया भर के कई रक्षा विशेषज्ञ यह कहते रहे हैं कि भारत को बलूचिस्तान के बागियों की मदद करनी चाहिए, लेकिन बावजूद इसके भारत ने अपने आप को इससे अलग रखा है। 

हालांकि बलूचिस्तान ही नहीं, मुल्क में कहीं भी आतंकवादी वारदात हों, भारत पर उसका आरोप लगा देना पाकिस्तान को सबसे आसान लगता है, जो यह बताता है कि पूरे मुल्क में पनप रही आतंक की पाठशालाओं को खत्म करने में उसकी दिलचस्पी नहीं है। जब तक यह नहीं होगा, दहशतगर्दी की आग पाकिस्तान में सुलगती रहेगी और उसके पड़ोसी भी झुलसते रहेंगे।

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