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आपदा के प्रकोप से बच सकते हैं हम

राधिका मूर्ति स्विट्जरलैंड में ‘डिजास्टर रिस्क मैनेजमेंट’ विशेषज्ञ हैं। फिजी में पली-बढ़ी राधिका का पालन-पोषण ऐसे इलाकों में हुआ जहां अक्सर तूफान और सुनामी आया करते हैं। उनका मानना है कि इंसान सजग रहे तो प्राकृतिक आपदाओं को कम किया जा सकता है। पेश हैं उनके एक भाषण के अंश:

प्रकृति का कहर
मुझे आज भी अपने स्कूल का वह पहला दिन याद है। हम सब बच्चे खाली जमीन पर बैठे थे। ऊपर खुला आसमान था। हमारे पीछे दीवार के रूप में बस एक टेंट लगा था। टेंट के उस पार था तूफान का खौफनाक मंजर। तब मैं बहुत छोटी थी, इसलिए तूफान की त्रासदी का अंदाजा नहीं था। लेकिन बड़े होने पर पता चला कि कितना मुश्किल होता है प्रकृति के कहर से जूझना। मेरा पालन-पोषण फिजी में हुआ। फिजी दुनिया भर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। यहां के खूबसूरत समुद्री किनारे, विशाल ताड़ के पेड़ और लोगों केमुस्कुराते चेहरे पर्यटकों को खींच लाते हैं। लेकिन इन लुभावने नजारों के बीच कुछ डरावनी और दिल दहलाने वाली प्रकृति की लीलाएं भी हैं जिनसे हम अक्सर रूबरू होते हैं। तूफान, बाढ़ और भूस्खलन के रूप में डरावने  वाले प्रकृति के रौद्र से लड़ना आसान नहीं होता। सच कहूं तो बचपन में हमारे लिए तूफान और बाढ़ की घटनाएं दिलचस्प किस्से हुआ करते थे। लेकिन धीरे-धीरे मुझे इनकी गंभीरता का अहसास हुआ। मैं अपने माता-पिता की समझदारी और हौंसले को सलाम करती हूं जिन्होंने मुझे ऐसी आपदाओं के कहर से बचाकर रखा।

मानव व्यवहार
प्राकृतिक आपदाओं के लिए मानव व्यवहार कितना जिम्मेदार है? जब मैंने आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में काम शुरु किया तो कई अहम बातें सामाने आईं। सबसे बड़ी बात यह है कि बहुत सारे लोग प्राकृतिक आपदा को ईश्वर का प्रकोप समझते हैं। उनका मानना है कि बाढ़ और तूफान के जरिए ईश्वर हम इंसानों को हमारे पापों के लिए सजा देते हैं। जाहिर है ऐसे में हमारे लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि हमारी किन हरकतों की वजह से प्रकृति को नुकसान हो रहा है और हम खुद को कैसे आपदाओं के कहर से बचा सकते हैं। हमें आपदाओं की असली वजहों को समझना होगा।

पर्यटन से पहले
जब कभी हम छुट्टियां मनाने की तैयारियां करते हैं तो हम सबसे पहले अपने बजट के बारे में विचार करते हैं। फिर तय करते हैं कहां जाना है, कौन सी ट्रेन या फ्लाइट पकड़नी है। हम वहां के मुख्य आर्कषण के बारे में पता करते हैं। लेकिन क्या हम वहां संभावित प्राकृतिक आपदाओं और खतरे के बारे में जानने की कोशिश करते हैं। क्या हम यह पता करते हैं कि पिछले सालों में वहां कोई संकट पैदा हुआ था। क्या हम जानने की कोशिश करते हैं कि आपदा से निपटने के लिए वहां सुरक्षा और राहत के क्या इंतजाम हैं। मैं यह नहीं कह रही हूं कि हमें हमेशा खौफ और आशंका के साथ जीना चाहिए लेकिन कम से कम पर्यटन स्थल पर जाने से पहले वहां की भागौलिक स्थिति और संभावित खतरे के बारे में सजग तो होना ही चाहिए। अगर पर्यटन स्थल के आस-पास समुद्र, नदी, झील और पहाड़ हैं तो हमे सजग होना  चाहिए।

सबक लें
हमारी दिक्कत यह है कि हम लोग पिछली आपदाओं से सबक नहीं लेते हैं। अगर आपको पता है कि फलां जगह पहले संकट आया था तो आपको यह भी जानना चाहिए कि अब वहां बचाव के क्या इंतजाम हैं। हममें से बहुत सारे लोगों को अपने ही देश में आईं प्राकृतिक आपदाओं के बारे में पता नहीं होता है। क्या आपको पता है कि आपके देश में पिछले सौ साल में कब-कब बड़े तूफान, बाढ़ और सुनामी आई थी। कहां हुए थे ये प्राकृतिक हादसे, कितने लोग मारे गए थे। उन हादसों के बाद क्या इंतजाम किए गए। हमारी दिक्कत यह है कि हम बहुत जल्द प्राकृतिक कहर को भूल जाते हैं। हमें लगता ही नहीं कि ऐसा दोबारा फिर ऐसा हो सकता है।

आपदा रिकॉर्ड
इंडोनेशिया और जापान जैसे देशों में आपदा रिकॉर्ड का बेहतर प्रबंधन है। ये रिकॉर्ड आने वाले खतरों से निबटने में मददगार होते हैं। क्या आपको जिनेवा में आए तूफानी कहर के बारे में कुछ याद है। क्या आपको लिस्बन सिटी में आए भूकंप व सुनामी के बारे में कुछ पता है जिसमें करीब 40 हजार लोग मारे गए थे। हाल के वर्षों को याद करें तो श्रीलंका में आई सुनामी का जिक्र कर सकते हैं। 2004 में यहां सुनामी ने हजारों लोगों पर कहर ढाया था। तब वहां दुनिया का सबसे बड़ा राहत कार्यक्रम चला था। ऐसे हादसों के रिकॉर्ड आने वाले खतरों से निपटने में मददगार हो सकते हैं।

हमारी जिम्मेदारी
अब सवाल उठता है कि प्राकृतिक प्रकोप से बचने के लिए हम क्या कर सकते हैं। सबसे पहले तो हम आपदाओं के लिए सिर्फ प्रकृति को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। हमें अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। हमें स्वीकार करना होगा कि आपदाओं के पीछे कहीं न कहीं हमारी गलती भी है। दूसरा मुद्दा है: आपदाओं से होने वाले नुकसान को कैसे कम किया जाए। हम अपने नेताओं पर इस बात के लिए दबाव बना सकते हैं कि वे आपदा प्रबंधन के इंतजामों पर खास ध्यान दें। हम उद्योग जगत पर भी दबाव बना सकते हैं कि वे औद्योगिकरण के नाम पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना बंद करें। हम सरकार पर दबाव बनाएं कि वे कड़ाई से पर्यावरण संरक्षण नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करें। हम नेता चुनते हैं और हमें पूरा अधिकार है कि हम उनसे सवाल करें। सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि हम सजग रहें और आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए सरकार की जिम्मेदारी तय करें। हम चाहें तो आने वाले खतरों से खुद को बचा सकते हैं। 
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

 

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