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हमारे लालच का शिकार हुई गंगा

देहरादून में जन्मी वंदना शिवा का नाम पर्यावरण आंदोलन के बड़े नेताओं में गिना जाता है। उन्होंने पर्यावरण व वैश्वीकरण पर करीब बीस किताबें लिखी हैं। इलाहाबाद में ‘शक्ति और प्रकृति’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने लोगों से गंगा को बचाने का आह्वान किया। भाषण के अंश:

जीवन की प्रेरणा
यह मां गंगा की प्रेरणा है कि आज हम सब यहां एकत्र हुए हैं। गंगा सिर्फ एक नदी नहीं है, यह एक आध्यात्मिक प्रेरणा है। आज गंगा के प्रदूषण पर बहस हो रही है। हम सब जानते हैं कि प्रकृति कभी प्रदूषण नहीं फैलाती है। गंगा में गंदगी फैलाने वाले हम ही हैं। हम विकास की गलतफहमी में गंगा को बरबाद करने पर तुले हैं। गंगा तो हमेशा से अविरल व निर्मल रही है। हमने बांध के नाम पर गंगा के रास्ते में रुकावटें पैदा कीं। बांध बिल्कुल कोलेस्ट्रॉल की तरह है। जैसे कोलेस्ट्रॉल हमारी सेहत के लिए ठीक नहीं है, वैसे ही बांध गंगा की सेहत के लिए ठीक नहीं है। उद्गम स्थल से तो गंगा निर्मल ही बहती है, यह तो हम इंसान हैं, जो गंगा में गंदगी फेंककर इसे मैला कर देते हैं।

लालच हावी
गंगा हमारे लिए सिर्फ आध्यात्मिक प्रेरणा नहीं है, बल्कि यह हमारी आर्थिक समृद्धि का भी स्रोत है। इसी महान उद्देश्य के साथ भगवान भागीरथ गंगा मां को पृथ्वी पर लेकर आए थे, पर हमने प्रकृति के इस महान उपहार का अपमान किया। गंगा हमारे लालच का शिकार हो गई। हम विकास के नाम पर गांव खत्म कर नए-नए शहर बसाते जा रहे हैं। फिर शहरों में पानी और बिजली की जरूरत को पूरा करने के लिए नदियों का दोहन शुरू करते हैं। यह सब गलत विकास मॉडल की वजह से हो रहा है।

गांव से पलायन
हम विकास की दिशा तय नहीं कर पा रहे हैं। हम हर व्यक्ति को कंप्यूटर एक्सपर्ट बनाने पर तुले हैं। हमारी आबादी के मात्र 0.01 प्रतिशत लोग आईटी उद्योग में रोजगार पाते हैं। फिर हम हर एक को क्यों कंप्यूटर टेबल पर लाने में तुले हैं? क्यों हम लोगों को गांव छोड़कर शहर आने को मजबूर कर रहे हैं? अगर हम गांवों में रहकर खेत व जमीन की देखभाल करने वालों को बेहतर अवसर उपलब्ध कराएंगे, तो भला वे घर छोड़कर क्यों भागेंगे? हम क्यों गांव में जीवन जीने की संभावनाओं को खत्म कर रहे हैं। जैसे-जैसे शहरों में भीड़ बढ़ रही है, वैसे-वैसे प्रदूषण व बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। जाहिर है, इनसे निपटने के लिए हमें और पैसा खर्च करना पड़ता है।

मौसम पर असर
आज मुझे यहां सुबह साढ़े छह बजे आना था, लेकिन मैं साढ़े बारह बजे पहुंच सकी। क्यों छह घंटे लेट हुई ट्रेन? इसकी वजह है कोहरा। पहले तो ऐसा न था मौसम का मिजाज। पहले तो सर्दियों की सुबह में सही समय पर सूरज उगता था। क्यों बिगड़ रहा है मौसम का चक्र? हम जैविक खेती की बजाय केमिकल फर्टीलाइजर की ओर भाग रहे हैं। नई कृषि प्रणाली में हमें सिंचाई के लिए बहुत अधिक पानी चाहिए। यही पानी भाप बनकर वातावरण में नमी पैदा कर रहा है और नमी का नतीजा है कोहरा। हम प्रकृति से कुछ नहीं सीख रहे हैं। प्रकृति में रिसाइकिलिंग की बेहतरीन व्यवस्था है। प्रकृति प्रदूषण नहीं फैलाती। लेकिन हम प्रकृति की उपेक्षा करते जा रहे हैं।

उपभोग की अति
हमारे लिए ऊर्जा का मतलब सिर्फ कोयले की ऊर्जा या परमाणु ऊर्जा है। दरअसल, ऊर्जा का असली मतलब कार्य करने की क्षमता है। हम जानते हैं कि प्रकृति में असीमित ऊर्जा है। पर हम प्रकृति के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। उपभोग के मामले में अति हो रही है। हम उपभोग के लिए प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इन दिनों रेडीमेड फूड, यानी डिब्बा बंद खाना का चलन बहुत बढ़ गया है। खाने के बाद हम पैकेट और डिब्बे बाहर फेंक देते हैं। हम ताजा खाने से दूर होते जा रहे हैं। ये चीजें न सिर्फ हमारी सेहत के लिए नुकसानदायक हैं, बल्कि प्रदूषण की एक बड़ी वजह भी हैं।

गलतफहमी
अन्न उत्पादन को लेकर कई तरह की गलतफहमी है। पहली, हम समझते हैं कि केमिकल फर्टीलाइजर डालने से बहुत अच्छी फसल होगी। जबकि केमिकल फर्टीलाइजर मिट्टी की उर्वरता को बरबाद करती हैं और साथ ही हमारे खाने में जहर भी मिलाती हैं। हमें खाने में जहर नहीं चाहिए। केमिकल व कीटनाशक पदार्थ हमारे पर्यावरण के लिए ठीक नहीं हैं। दूसरी गलतफहमी यह है कि हम समझते हैं कि जीन संवर्धित बीज के इस्तेमाल से हम उत्पादन बढ़ा लेंगे। रिपोर्ट बताती हैं कि दुनिया में कहीं भी इन बीजों की वजह से उत्पादन नहीं बढ़ा है।

पानी की कीमत
कुछ चीजों की कीमत नहीं आंकी जाती, जैसे पानी। पानी इतना बहुमूल्य है कि इसकी कीमत नहीं लगाई जा सकती है। बात 2002 की है। देश में पानी के निजीकरण के लिए एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनी के साथ सौदा होना था। वल्र्ड बैंक के प्रमुख इस संबंध में दिल्ली में आए थे। हमने इस सौदे के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन किया था। मैं एक छोटे से बर्तन में गंगाजल लेकर वर्ल्ड बैंक प्रमुख से मिली। बाहर हजारों महिलाएं प्रदर्शन कर रही थीं। मैंने वह गंगाजल वल्र्ड बैंक प्रमुख को देते हुए कहा कि आप यह पवित्र जल अपने बेड के पास रखें, ताकि आपको हमेशा याद रहे कि यह पानी हमारे लिए कितना पवित्र है। आप इसकी कीमत नहीं लगा सकते। गंगा हमारी मां है और हमारी मां बिकाऊ नहीं है। गंगा बिकाऊ नहीं है, इसलिए यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम गंगा को प्रदूषण से बचाएं। अगर हम सब मिलकर कोशिश करें, तो हम अपनी गंगा,  मिट्टी और अपने भोजन को प्रदूषण से मुक्त करा सकते हैं।  
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

 

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