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कभी लेट नहीं होता ‘डब्बावाला’

डॉक्टर पवन अग्रवाल ने मुंबई के डब्बावालों पर पीएचडी की है। वर्तमान में वह मुंबई डब्बावाला एसोसिएशन के सीईओ हैं। डॉ. अग्रवाल ने दुनिया के तमाम प्रबंधन संस्थानों में लेक्चर दिए हैं। वह मुंबई में कई स्कूल व प्रबंधन संस्थान भी चलाते हैं, जहां डब्बावालों के बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है। दुबई में ‘आईआईएम गल्फ समिट’ में उनके भाषण के अंश:
मुंबई में ‘डब्बावाले’
लोग अक्सर सवाल करते हैं कि आखिर मुंबई में डब्बेवालों की इतनी जरूरत क्यों है? दरअसल मुंबई में लोगों को घर से ऑफिस तक पहुंचने के लिए लोकल ट्रेनों में लंबा सफर तय करना पड़ता है। यहां की ट्रेनों में भारी भीड़ के बारे में सब जानते हैं। मुंबई लोकल में सफर करना अपने आप में कठिन है, ऊपर से टिफिन लेकर चलना तो बहुत ही मुश्किल है। दूसरे, समय पर ऑफिस पहुंचने के लिए मुंबईवासियों को घर से कम से कम दो-तीन घंटे पहले निकलना पड़ता है। मसलन, यदि आपको नौ बजे ऑफिस पहुंचना है, तो आपको हर हाल में सुबह छह बजे अपना घर छोड़ना होगा। जाहिर है, सुबह इतनी जल्दी घर में खाना तैयार होना मुश्किल होता है और ज्यादातर लोग बाहर के खाने की बजाय घर का खाना पसंद करते हैं। डब्बावाले लोगों के घरों से खाने का टिफिन लेकर लंच टाइम तक उनके ऑफिस पहुंचाते हैं और शाम को वही खाली टिफिन वापस घर रखते हैं।   

समय के पाबंद
मुंबई में करीब पांच हजार डब्बवाले रोजाना दो लाख टिफिन की डिलीवरी करते हैं। इस सेवा की सबसे बड़ी खासियत है, समय पर डिलीवरी। डब्बावाले कभी लेट नहीं होते। आप ट्रेन की देरी या फिर किसी वजह से ऑफिस में लेट हो  सकते हैं, पर डब्बावाला हमेशा समय पर आपका टिफिन लेकर हाजिर हो जाता है। डब्बावाले हर दिन दो लाख टिफिन की डिलीवरी करते हैं, पर टिफिन की पहचान में कभी कोई गड़बड़ी नहीं होती है। टिफिन पर इस तरह कोडिंग की जाती है कि जिसका टिफिन है, उसे ही मिलता है। डिलीवरी करने वाले डब्बावाले बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं  हैं, किंतु टिफिन डिलीवरी में किसी तरह की गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं होती।

मेहनत और लगन
‘आईआईएम गल्फ समिट’ में आने से पहले किसी ने मुझसे पूछा कि इस लेक्चर से लोगों को क्या सीख मिलेगी, तो मैंने बताया कि मैं तो सिर्फ डब्बावालों की कार्यशैली, मेहनत और ईमानदारी की चर्चा करूंगा, बाकी सुनने वालों पर निर्भर है कि वे इनसे क्या प्रेरणा लेते हैं। डब्बावाले ईमानदारी, मेहनत, सामंजस्य और लगन की मिशाल हैं। वह सुबह-सुबह घरों से टिफिन एकत्र करने, उन्हें स्टेशन तक पहुंचाने, फिर ट्रेन में लादने और स्टेशन से ऑफिस तक पहुंचाने और वापस उसी रास्ते आपके घर तक खाली टिफिन पहुंचाने का काम करते हैं। यह प्रक्रिया एक चेन पर निर्भर है। अगर इस चेन में किसी एक जगह गलती हो जाए, तो पूरी व्यवस्था ही बिगड़ जाएगी। लेकिन पिछले 132 वर्षों के अपने इतिहास में डब्बावालों ने अपने ग्राहकों को शिकायत का मौका नहीं दिया।

कोई हड़ताल नहीं
मुंबई में डब्बावाले सेवा की शुरुआत मूलरूप से 1880 में हुई। उस समय देश में अंग्रेजों का राज था। इसलिए हम कह सकते हैं कि हम अंग्रेजों के जमाने के डब्बावाले हैं। साल 1890 में महादेव हवाजी बच्चों ने सौ लोगों के साथ टिफिन सेवा शुरू की। बाद में, उन्होंने 1930 में डब्बावालों को संगठित किया। इस समय मुंबई टिफिन बॉक्स सप्लायर एसोसिएशन में करीब पांच हजार डब्बावाले हैं। विशेष बात यह है कि इस एसोसिएशन का अध्यक्ष भी एक आम डब्बावाला है। ज्यादातर डब्बावाले पिछले चालीस-पचास साल से इस सेवा से जुड़े हुए हैं। 132 वर्षों के इतिहास में डब्बावालों  ने एक भी दिन हड़ताल नहीं की। वे हड़ताल में यकीन नहीं करते। वे जानते हैं कि एक दिन की हड़ताल से हजारों लोग भूखे रह जाएंगे। अगर डब्बावालों की कोई शिकायत होती है, तो वे एसोसिएशन के सदस्यों के साथ बैठकर समस्या का हल ढूंढ़ते हैं और अध्यक्ष का फैसला उनके लिए अंतिम आदेश होता है।

ईमानदारी और भरोसा
डब्बावालों पर अध्ययन के दौरान कई दिलचस्प किस्से सामने आए। कई लोगों ने बताया कि ऑफिस जाते वक्त अगर वे कोई अहम चीज, जैसे मोबाइल या पर्स ले जाना भूल जाते हैं, तो उनकी पत्नी उसे टिफिन में रख देती है। वह सामान बिना किसी गड़बड़ी के उनके पास पहुंच जाता है। इसी तरह एक व्यक्ति ने बताया कि वेतन की राशि जेब में रखकर मुंबई लोकल से यात्रा करना बहुत मुश्किल होता है, इसलिए वह अक्सर अपने खाली टिफिन में तनख्वाह की रकम रख देता है। डब्बावाला ईमानदारी के साथ वह टिफिन उनके घर पहुंचा देता है। मैं मजाक में इसे वैल्यूऐडेड सर्विस कहता हूं। डब्बावाले कभी आपका टिफिन खोलकर नहीं देखते। वे आपके घर से टिफिन लेकर सीधे ऑफिस और फिर ऑफिस से आपके घर टिफिन पहुंचाते हैं। 

अवॉर्ड की चाह नहीं
डब्बावालों को उनकी बेहतरीन सेवा के लिए कई अवॉर्ड मिले हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान मिली है। चाहे जितनी बड़ी हस्ती उनसे मिलने आए, वे कभी अपना काम छोड़कर उनके पीछे नहीं भागते। मैं आपको एक दिलचस्प किस्सा सुनाता हूं। बात नवंबर 2003 की है। ब्रिटेन के प्रिंस चाल्र्स भारत आए थे। उन्होंने मुंबई में डब्बावालों से मिलने की इच्छा जताई। डब्बावालों ने कहा कि वे उनसे जरूर मिलेंगे, लेकिन इस मुलाकात के लिए एक बजे के बाद का समय तय किया जाए, ताकि टिफिन सप्लाई प्रभावित न हो। प्रिंस चाल्र्स उनसे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने साल 2005 में अपनी शादी में डब्बावालों को निमंत्रण भेजा। फोर्ब्स पत्रिका ने मुंबई टिफिन सर्विस को दुनिया की बेहतरीन सेवा की सूची में शामिल किया है। लेकिन डब्बावालों के लिए सबसे बड़ा अवॉर्ड है, उनके ग्राहकों का प्यार और भरोसा। 
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

 

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