अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आप सबको आज की शुभकामनाएं

पूरे साल में एक दिन आता है मूर्ख दिवस। वैलेंटाइन डे की तरह। इस दिन सारे मूर्ख मिलकर एक-दूसरे को मूर्ख बनाते हैं। यह मूर्ख परंपरा हमने विदेशों से आयात की है। यह हमारी मजबूरी है कि हम उसका निर्यात नहीं कर पा रहे। हमारी जनसंख्या बताती है कि बहुमत में मूर्खता हमारे ही देश में है। इस दिन किसी बज्जर मूर्ख को भी मूर्ख कह दो, तो वह बुरा नहीं मानता। मूर्खता की कृपा से हमारे यहां कालिदास बना जा सकता है। मूर्ख व्यक्ति इतना भोला और मासूम होता है कि कोई भी भोला और मासूम उसे मूर्ख बना सकता है। हमारे यहां यह मूर्खता चुनावों में हर पांच साल के बाद रिन्यू होती है। लोकतंत्र की छांह में ही बहुमतीय मूर्खता फलती-फूलती हैं। अप्रैल में नया वर्ष यूं ही नहीं होता। उसका भी कारण है। यह काम मूर्खों ने नहीं किया।

बज्जर मूर्ख बहुत प्रतिभावान होते हैं। मूर्ख कौन बनाता है और कौन बनता है, यही तो रहस्यवाद है। कभी-कभी मूर्खता से जन-कल्याण भी हो जाता है। परिवार में भी वर्षों तक पति-पत्नी एक-दूसरे को- आई लव यू कहकर मूर्ख नहीं बनाते? वैसे भी, पत्नी कभी मूर्ख नहीं होती, क्योंकि वह एक मूर्ख से शादी कर चुकी होती है। मूर्ख बनने में जो सुख संतोष मिलता है, वह इंद्र का आसन मिलने से भी नहीं मिलता। जब सभी मूर्ख हों, तो बहुमत में हो जाते हैं। मूर्ख कभी अल्पसंख्यक नहीं होते। इसलिए असुरक्षित महसूस नहीं करते। मूर्खता तो एक नशा है। 

मित्रो, यह विषय इतना सांकेतिक है कि कह सकते हैं कि समझने वाले समझ गए हैं, नहीं समझे वे मूर्ख हैं। मूर्खता और नासमझी में मां-मौसी का अंतर होता है। यूं भी मूर्ख व्यक्ति यदि मौन रखे, तो वह विद्वान लगने लगता है। प्रेमी जोड़े भी एक-दूसरे को मूर्ख बनाते देखे गए हैं। हमारे यहां तो मूर्ख बनने की परंपरा आजादी के बाद से शुरू हो गई थी। अब तो इस पुरानी परंपरा में नए कल्ले फूटने लगे हैं। मूर्खता के लिए आधार कार्ड की जरूरत नहीं होती।
एक बात बताइए, जो मूर्ख अपने को मूर्ख नहीं समझता, क्या वह बुद्धिमान है? बताइए? आपको आज की बधाई।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:best wishes to all of you today