DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

शोध में साधें भविष्य

करीब 10-15 वर्ष पहले सिर्फ मास्टर्स (एम़ ए./एम़ एससी./एम़ कॉम़) और राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) की बुनियाद पर कॉलेज और विश्वविद्यालयों में अध्यापन की नौकरियां मिल जाया करती थीं, लेकिन अब इस क्षेत्र में रोजगार तलाशने के लिए अभ्यर्थी के पास एम.फिल., पीएच.डी़ आदि शोध उपाधियों का होना जरूरी हो गया है। 

बीच-बीच में यूजीसी द्वारा एम.फिल़/पीएच़ डी़ उपाधि धारकों को नेट की अनिवार्यता से भी मुक्त कर दिया जाता है। ऐसे में डिग्री धारकों को अलग से फायदा मिल जाता है। 

अध्यापन के अलावा दूसरे क्षेत्रों में विशेषज्ञों की बढ़ती मांग ने शोध के प्रति रुझान बढ़ाया है। आज विश्वविद्यालयी शोध के गिरते स्तर और शोधार्थियों को पेश आ रही मुश्किलों को ध्यान में रखते हुए शोध के बारे में एक बुनियादी समझ बनाना जरूरी हो गया है।

शोध के प्रति बढ़ता रुझान
नामी शोध संस्थानों से मिली जानकारी के मुताबिक पिछले वर्षो में शोध उपाधियों में प्रवेश लेने के इच्छुक अभ्यर्थियों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। जवाहरलाल नेहरू विश्व-विद्यालय में जहां पांच साल पहले सामान्यत: एम.फिल़ और डायरेक्ट पीएच़ डी. में प्रवेश के लिए आवेदन करने वालों की संख्या क्रमश: 100-150 और 10-15 हुआ करती थी, वहीं अब यह संख्या 500-1000 और 50-100 तक पहुंच गई है।

शोध उपाधियों हेतु बढ़ते रुझान के दो प्रमुख कारण हैं- रोजगार के लिए शोध की बढ़ती अनिवार्यता और पिछले वर्षो में शुरू हुई विभिन्न शोधवृत्तियां। अच्छे उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापन के लिए तो शोध अनिवार्य हो गया है।

इसके साथ ही निजी एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों, गैर सरकारी संगठनों आदि में भी शोध उपाधि धारकों को वरीयता दी जाती है। सभी बड़े संस्थानों में रिसर्च एण्ड डवलपमेंट (आरएंडडी) विभाग होता है, इसके अलावा निजी संस्थानों और कंपनियों में ‘कॉपरेरेट सोशल रेसपॉन्सबिलिटी’ विभाग होता है, जहां पीएचडी धारकों को वरीयता दी जाती है। गैर सरकारी संगठनों में भी इनकी जरूरत होती है।

कैसे करें विषय का चुनाव?
- विषय आपकी रुचि का हो, न कि किसी का थोपा हुआ क्योंकि थोपे हुए विषय पर आप न तो अच्छा शोध कर सकते हैं और न ही बाद में साक्षात्कार में अपेक्षित जवाब दे सकते हैं।
- विषय समयसामयिक महत्व का होना चाहिए। ऐसे विषय का चुनाव करें जिसकी आप साक्षात्कार में प्रासंगिकता स्पष्ट कर सकें।
- विषय में अधिक फैलाव से बचना चाहिए। विषय सीधे समस्या पर केंद्रित हो, इसलिए विषय चुनने से पहले समस्या की पड़ताल करें। उदाहरण के लिए अगर आपको भूमंडलीकरण से संबंधित विषय लेना है तो ‘दुनिया पर भूमंडलीकरण का प्रभाव’ की जगह किसी छोटे क्षेत्र पर भूमंडलीकरण के खास प्रभाव का अध्ययन ज्यादा अच्छा विषय होगा।

महत्वपूर्ण शोध विषय
किसी भी विषय पर अच्छा काम कर उसे उपयोगी और महत्वपूर्ण बनाया जा सकता है। वैसे इन दिनों मानविकी और समाज विज्ञानों में दलित, आदिवासी, स्त्री, भूमंडलीकरण, गरीबी, निजीकरण, उदारीकरण, बाजारवाद, किसान आदि से जुड़े विषयों का चलन है। प्राकृतिक विज्ञानों में कोई भी नई खोज या प्रयोग महत्वपूर्ण होता है जिसमें नए और उत्तेजक निष्कर्ष निकल रहे हों। चिकित्सा के क्षेत्र में नित-नई खोजें इसी प्रक्रिया का परिणाम हैं। माइक्रोबायोलॉजी और नैनो टैक्नोलॉजी इन दिनों प्राकृतिक विज्ञानों संबंधी शोधकार्यो में लोकप्रिय विषय हैं।

कैसे करें गाइड का चुनाव?
जेएनयू जैसे कुछ विश्वविद्यालय गाइड (शोध निर्देशक) के चयन का अधिकार शोधार्थी को देते हैं। कई विश्वविद्यालयों में सीटों की उपलब्धता के आधार पर गाइड शोधार्थी का चयन करते हैं। अगर शोधार्थी के पास चयन की छूट हो तो गाइड के रूप में ऐसे व्यक्ति का चुनाव करना चाहिए जिसका विशेषज्ञता क्षेत्र आपके शोध विषय से संबंधित हो।

सिनॉप्सिस कैसे बनाएं?
सिनॉप्सिस या शोध प्रारूप शोध का पहला चरण है। कुछ विश्वविद्यालयों में प्रवेश के वक्त ही शोध प्रारूप ले लिया जाता है। सिनॉप्सिस आपके भावी शोध की रूपरेखा प्रस्तुत करती है, इसलिए इसे बहुत सावधानी से बनाएं। विषय की बुनियादी जानकारी जरूरी है। अपने क्षेत्र से जुड़ी महत्वपूर्ण किताबें पढ़ने के बाद ही सिनॉप्सिस बनाएं। 

इस तरह बांटना अच्छा रहेगा-
क्षेत्र, उद्देश्य और संभावनाएं : इसमें शोधार्थी अपने विषय को स्पष्ट करता है और संबंधित विषय में शोध की उपादेयता सिद्ध करता है। एक हाइपोथीसिस (शोध परिकल्पना) प्रस्तुत करता है कि शोध के संभावित परिणाम कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

शोध की वर्तमान स्थिति : इसमें शोधार्थी को अपने विषय से संबंधित अब तक हुए शोध कार्यो का ब्यौरा देना पड़ता है। नई दिल्ली स्थित भारतीय विश्वविद्यालय संघ (एसोशिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज) ने भारतीय विवि. में हुए तमाम शोध कार्यो के विषयों का एक वृहद कैटलॉग बनाया है। इससे शोधार्थी यह जान पाता है कि अपने शोध विषय जुड़े क्षेत्र में कहां कहां शोध कार्य हो चुका है। विषय के संबंध में सीनियर्स से बात करना भी अच्छा रहेगा। 

प्रस्तुत शोध विषय में नवीनता :  शोधार्थी का विषय और भावी शोध कार्य कैसे अलग और नया है, यह शोधार्थी को सिनॉप्सिस के इस हिस्से में स्पष्ट करना चाहिए। कई बार शोध का विषय पुराने विषय से बहुत मेल खाता है, ऐसी स्थिति में शोधार्थी को अपने कार्य की भिन्नता को विस्तृत रूप से बताना अनिवार्य होगा।

शोध विधि : यह शोध में अपनाई जाने वाली पद्धति है। यह हमारे विषय और अनुशासन पर निर्भर करता है कि हमें कौन सी शोध पद्धति ज्यादा उपयोगी लगेगी। तुलनात्मक, समाजशास्त्रीय, ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक आदि पद्धतियां मानविकी संबंधी शोधकार्यों में प्रचलित हैं।

संभावित अध्याय योजना : इसे आप अपने भावी शोध प्रबंध का मूलाधार कह सकते हैं। यह उन रेखाओं का नाम है जिनमें रंग भरकर हम मुकम्मल तस्वीर बनाते हैं। अच्छी अध्याय योजना बनाने के लिए विषय की समुचित जानकारी होना जरूरी है। सामान्यत: एम.फिल़ में दो या तीन अध्याय होते हैं और पीएच़डी़  में पांच से सात अध्याय होते हैं। शुरुआती अध्याय विषय से जुड़े सैद्धांतिक प्रश्नों से टकराते हैं और बाद के मूल विषय और समस्या से। अंत में निष्कर्ष या उपसंहार लिखने की परंपरा है।

संदर्भ ग्रंथ सूची : शोध कार्य के दौरान उपयोग में लाई गई किताबों की सूची को संदर्भ ग्रंथ सूची या बिबलियोग्राफी कहते हैं। कुछ शोध विषयों में हम कुछ पाठ (टेक्स्ट) का अध्ययन करते हैं। ऐसे शोध प्रबंध में हम संदर्भ ग्रंथ सूची को दो भागों में बाँटते हैं- प्राथमिक ग्रंथ (प्राइमरी सोर्स) और सहायक ग्रंथ (सैकेंडरी सोर्स)। इनमें किताबों के अलावा उपयोग में लाई गई पत्र-पत्रिकाएं, विश्वकोश, जर्नल, वेबसाइट आदि का भी ब्यौरा देना चाहिए।

शोधार्थी को अपने विषय का नयापन और महत्ता साबित करते हुए संभावित शोध का एक खाका पेश करना होता है। सिनॉप्सिस बनाने में शोधार्थी अपने गाइड की मदद ले सकते हैं। गाइड की सहमति के बाद विभाग के रास्ते विश्वविद्यालय की शोध समिति तक आपकी सिनॉप्सिस जाती है।

फैलोशिप से राह आसान
पिछले वर्षों में शोध के प्रति रुझान बढ़ने का एक कारण यह भी है कि इस बीच भारत सरकार द्वारा नई-नई शोधवृत्तियां (फैलोशिप) शुरू की गईं हैं तथा यूजीसी की जूनियर रिसर्च फैलोशिप और सीनियर रिसर्च फैलोशिप को भी बढ़ाया गया है।

पहले विद्यार्थियों की समझ थी कि बेरोजगारी में शोध के लिए व्यर्थ समय और धन क्यों खर्च करें, लेकिन बढ़ती फैलोशिपों ने इस सोच को बदला है। वैसे भी सरकारी शोध संस्थानों में मानविकी आदि के क्षेत्रों में शोध में ज्यादा खर्चा नहीं आता है। विज्ञान संबंधी शोधों के लिए अतिरिक्त फैलोशिपों और कंटीजेंसी की व्यवस्था की गई है। इसलिए अब शोध करना आर्थिक दृष्टि से आसान हुआ है।

विदेशों में शोध संभावनाएं
भारत में अच्छे शोध संस्थानों और विश्वविद्यालयों के अभाव की वजह से भारतीय विद्यार्थियों की विदेशी संस्थानों में शोध की प्रवृत्ति बढ़ी है। भूमंडलीकरण के ताजा दौर में दुनिया के देश एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं और उनके बीच तमाम क्षेत्रों में आपसी सहमति (एमओयू) बढ़ रही है। शोध हेतु विद्यार्थियों का आवागमन भी इन समझौतों का अहम हिस्सा है।

महाद्वीपीय स्तर पर देखें तो इन दिनों भारतीय विद्यार्थियों का शोध हेतु यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया आना जाना बढ़ा है। दूसरे देशों से शोध के दौरान आने वाले खर्चे सामान्य तौर पर हमारी या संबंधित देश की सरकार वहन करती है। प्रतिवर्ष दूसरे देशों से भारत आने और भारत से विदेश जाने वाले शोधार्थियों की संख्या हजारों में है।
(लेखक जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र में प्राध्यापक हैं)

इन्हें रखें ध्यान
-समस्या को सही ढंग से पहचानने की कोशिश करें।
- कुछ नया खोजने की कोशिश करें।
-पूर्वाग्रहों से बचें, करें ताकि सही निष्कर्ष तक पहुंच सकें।
-संदर्भ ग्रंथ सूची और अनुक्रमणिका बहुत सावधानी से बनाएं।

प्रमुख संस्थान

मानविकी और समाज विज्ञानों के क्षेत्र में-
- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली  ल्ल दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
- हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद
-टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई  ल्ल इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
-कलकत्ता विश्वविद्यालय, कोलकाता

प्राकृतिक विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज, बंगलूरू
- आईआईटी, दिल्ली, मुंबई, चैन्नई, कानपुर, रुड़की आदि।
- भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, दिल्ली (पूसा)
- स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, चंडीगढ़, (चिकित्सा)
- एम्स, नई दिल्ली।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:शोध में साधें भविष्य