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कुदरत की बेजोड़ सौगात सौर उर्जा

एक तरफ तेल और बिजली की किल्लत, तो दूसरी तरफ ग्लोबल वॉर्मिग के चलते आज जब सारी दुनिया पर्यावरण के लिहाज से गंभीर खतरे का सामना कर रही है, तो सबका ध्यान उर्जा के वैकल्पिक और सुरक्षित स्रोतों की ओर जाना लाजिमी है। ऐसे में सूरज की रोशनी से मुफ्त मिलने वाली सौर उर्जा का अथाह भंडार, कुदरत की तरफ से इस धरती को बख्शी गई सबसे बड़ी सौगात साबित होने जा रहा है। उर्जा के लिहाज से सूर्य ईंधन का सबसे आदर्श स्रोत है। सबसे प्रमुख बात ये है कि सूर्य में अनंत उर्जा है, यह उर्जा सर्वव्यापी है और शुद्ध भी। जहां तक उर्जा के अन्य रिन्यूएबल स्रोतों जियोथर्मल और पवन उर्जा की बात है, तो यह सीमित हैं।

आज पूरी दुनिया में बिजली की जितनी मांग है, सौर उर्जा के जरिए हम उससे कई गुना ज्यादा ताकत हासिल कर सकते हैं। हालांकि कैलिफॉर्निया के रेगिस्तान में दुनिया के सबसे बड़े (एसईजीएस जसे) सौर उर्जा उत्पादन केंद्र अब थर्मल प्लांट्स पर भी जोर दे रहे हैं, लेकिन सूरज की ताकत का भरपूर दोहन करने के लिए हाल में पुर्तगाल और जर्मनी में विशाल मल्टी-मेगावॉट फोटोवॉल्टैक संयंत्र लगाए गए हैं। पुर्तगाल के जिस रेगिस्तानी मौरा इलाके में ऐसा प्लांट लगाया गया है, वह यूरोप में आर्थिक रूप से सबसे पिछड़ा, लेकिन तीखी धूप का इलाका माना जाता है। कुल 250 मिलियन यूरो की लागत से बन रहे इस सौर उर्जा संयंत्र का पहला चरण तो पिछले साल ही पूरा हो चुका है, जबकि दूसरा चरण अगले साल तैयार हो जाएगा।

मैक्लॉ रेंज के रेगिस्तान मोजवे में एक पावर प्लांट की खूबसूरती दुनिया भर के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है। इस प्लांट को देखने पर आपको ऐसा लगेगा, जैसे बेहद तप्त उजाले वाला दिन। इस प्लांट की क्षमता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि लास वेगास के 14,000 घरों या कुछ जुआघरों को भी इससे उर्जा मिल सकती है।

उर्जा की जरूरत का सर्वोत्त्म विकल्प
जर्मनी के फ्रानहॉफर इंस्टीटच्यूट फॉर सोलर एनर्जी सिस्टम के डाइरेक्टर इ.के. वेबर कहते हैं कि दुनिया भर की आबादी को तकरीबन 16 टेरावाट उर्जा की आवश्यकता होती है। संभावना है कि 2020 तक ये मांग 20 टेरावाट हो जाएगी। पृथ्वी के मैदानी प्रदेशों में 120,000 टेरावाट उर्जा की आवश्यकता होती है। गौर करने वाली बात ये है कि अगर दुनिया के सिर्फ चार प्रतिशत रेगिस्तानी इलाके में सोलर पैनल का जंगल खड़ा कर ऐसे संयंत्रों के जरिए सूरज की ताकत बटोर ली जाए, तो इससे पूरी दुनिया में बिजली की जरूरत पूरी हो सकती है। 

कैसे करें उर्जा का उपयोग
इस उर्जा का दोहन करने के दो तरीके हैं। पहला ये कि पैराबोलिक नहरों या नालियों या खंदकों के द्वारा भाप उत्पन्न कर के। यही तरीका नेवादा में अपनाया जाता है या फिर कंप्यूटर द्वारा संचालित चपटे शीशे (फ्लैट मिरर) जिन्हें हीलियोस्टेट्स कहा जाता है। इस प्रक्रिया में किसी पावर टॉवर के शीर्ष पर स्थित रिसीवर पर सूर्य के प्रकाश को फोकस किया जाता है। दूसरा तरीके में सिलिकॉन सेमीकंडक्टर सिलिकॉन फोटोवोल्टैक पैनल द्वारा सूर्य के प्रकाश को सीधे इलैक्ट्रीसिटी में बदला जाता है। प्रत्येक तरीके के अपने फायदे हैं।

स्टीम जेनरेशन को सोलर थर्मल के नाम से भी जाना जाता है। यह फोटोवोल्टैक की तुलना में ज्यादा प्रभावी है। इसमें सूर्य से आने वाले प्रकाश के ज्यादा से ज्यादा हिस्से को इलैक्ट्रीसिटी में बदला जा सकता है, लेकिन इसके लिए काफी तादाद में जमीन और लंबी ट्रांसमिशन लाइनों की आवश्यकता होती है। फोटोवोल्टैक पैनल्स को आप छत के शीर्ष पर वहां रख सकते हैं, जहां उर्जा की आवश्यकता होती है। दोनों ही तरीकों में फायदे के साथ कुछ नुकसान भी हैं। वह उस दौरान कारगर नहीं होते, जब आसमान में बादल छाते हैं और अंधेरा होता है। हालांकि वैज्ञानिक ऐसी प्रक्रिया विकसित करने में लगे हैं जिसकी मदद से अंधेरे में भी उर्जा को एकत्र किया जा सके।

अथाह उर्जा का भंडार
सौर उर्जा, पूरी दुनिया को लगातार रोशनी देने वाली बिजली की 6000 गुना होती है। वर्तमान टेक्नोलॉजी के दम पर ही हम उर्जा की तमाम जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। हालांकि विश्व का प्रमुख सोलर उर्जा उत्पादक मुल्क जर्मनी में सबसे ज्यादा धूप नहीं चमकती, लेकिन वह लगातार इस क्षेत्र में अभूतपूर्व काम कर रहा है। सौर उर्जा लगातार सस्ती हो रही है। हालांकि सबट्रॉपिक के विकसित देशों को इससे आने वाले समय में फायदा होगा।

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