28 अगस्त 1990...सरबजीत की जिंदगी का सबसे मनहूस दिन - 28 अगस्त 1990...सरबजीत की जिंदगी का सबसे मनहूस दिन DA Image
13 दिसंबर, 2019|4:00|IST

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28 अगस्त 1990...सरबजीत की जिंदगी का सबसे मनहूस दिन

28 अगस्त 1990...सरबजीत की जिंदगी का सबसे मनहूस दिन

पाकिस्तान की जेल में 22 साल तक सड़ने के बाद कैदियों की पिटाई से जख्मी होकर मरने वाले सरबजीत को भले ही इंसाफ नहीं मिला, पर वह दोनों मुल्कों के इतिहास में अमर हो गया।
 
19 मार्च 1962 को पंजाब के फिरोजपुर जिले के भिखीविंड में जन्मे सरबजीत की दर्दकारी कहानी कई सालों तक दोनों मुल्कों के अखबारों में सुर्खियां बनीं, पर उनकी मौत ने न्याय व्यवस्था के सामने सवाल खडा कर दिया।
 
कबड्डी का बेहतरीन खिलाड़ी सरबजीत मैट्रिक तक की पढ़ाई करने के बाद अपने परिवार की सहायता करने के लिए खेतों में ट्रैक्टर चलाकर आजीविका चलाने लगा और वह 1984 में सुखप्रीत कौर से शादी रचाकर अपना जीवन खुशी-खुशी बिताने लगा था। उनसे उसे दो बेटियां पूनमदीप और स्वपनदीप हुई, लेकिन उसे क्या पता था कि किस्मत उसे पाकिस्तान की जेल में ले जाएगी।
 
28 अगस्त 1990 को उसकी जिंदगी का सबसे मनहूस दिन था। वह शराब के नशे में पाकिस्तान की सीमा में घुस गया, क्योंकि तब तार के बाड़े नहीं होते थे और एक पाकिस्तानी कर्नल ने उसे पकडकर सात दिन तक रखा, फिर अदालत में पेश कर दिया।

अदालत में उसे मंजीत सिंह के नाम से पेश किया गया, क्योंकि इसी नाम से उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज किया गया। उन पर भारत के लिए जासूसी करने के आरोप भी लगे। यहीं से उनकी दर्द भरी कहानी शुरू हुई। 

सरबजीत के वकील एवं भारत-पाक शांति प्रयास के अध्यक्ष अवैस शेख ने अपने मुवक्किल पर एक पुस्तक भी लिखी। जस्टिस मार्कण्डेय काटजू की अध्यक्षता में फ्री सरबजीत सिंह नाम की एक समिति भी बनी।

प्रख्यात पत्रकार कुलदीप नैय्यर, महेश भट्ट, लाहौर के वकील मंजूर अहमद मलिक तथा सारा बिलाल, दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश राजिंदर सच्चर, प्रोफेसर भीम सिंह, अमेरिका तथा ब्रिटेन के वकीलों ने भी सरबजीत के समर्थन में आवाज बुलंद की। ब्रिटेन के वकील जे सी उप्पल ने सरबजीत के नाम एक बेवसाइट भी लांच की।
 
अवैस शेख के अनुसार सरबजीत को 30 अगस्त 1990 को गिरफ्तार किया गया और उसे आठ सितंबर 1990 को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। सरबजीत के खिलाफ तीन मुकदमें दर्ज किए गए थे। उसका इकवालिया बयान भी किसी मुकदमे में दर्ज किया गया, बल्कि एक सामान्य बयान दर्ज किया गया, जो जो गैर कानूनी है। यहां तक कि जेल में कोई पहचान परेड भी नहीं हुई।
 
सरबजीत को रॉ का एजेंट बताया गया और मंजीत सिंह की जगह उसे पेश किया गया, जो भगोड़ा था। मंजीत सिंह को 31 अगस्त 1990 को गिरफ्तार किया गया था, पर सेना ने उसे छोड़ दिया और उनकी जगह सरबजीत सिंह को पेश किया गया।
 
मंजीत सिंह नकोदर के मेतनपुर के नजदीक रामोवल गांव का रहने वाला था। वह 1986 में जालंधर आ गया। 1993 में वह इंग्लैंड चला गया, फिर 1997 में कनाडा चला गया। धोखाधडी के आरोप में 1999 में गिरफ्तार किया गया, फिर वह दोबारा 2000 में ब्रिटेन गया, जहां से 2001 में भारत भेजा गया। फिर वह दोबारा पाकिस्तान भी गया।

पहली बार वह 1990 में पाकिस्तान पहुंचा और तीन साल तक रहा। उसने इस्लाम धर्म अपना लिया, लेकिन पाकिस्तान की अदालत ने सरबजीत को मंजीत मानकर 1995 में सजा-ए-मौत का ऐलान कर दिया, जबकि रतू बम विस्फोट के समय मंजीत पाकिस्तान में था और उसका अलकायदा से भी संबंध थे। लेकिन सरबजीत पर बम विस्फोट करने का आरोप लगा।

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