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11 जुलाई, 2020|3:36|IST

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ओबामा की यात्रा से बढ़ेगा मोदी और भारत का रुतबा

ओबामा की यात्रा से बढ़ेगा मोदी और भारत का रुतबा

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की यात्रा भारत-अमेरिका संबंधों के साथ ही भारत के पड़ोसी देशों पाकिस्तान, चीन, म्यांमार सहित रूस के साथ संबंधों पर ज्यादा असर डालने वाली होगी। अपने कार्यकाल के आखिरी दौर में चल रहे ओबामा से बड़ी घोषणाओं की अपेक्षा नहीं करने की सलाह दे रहे भारतीय अधिकारी मान रहे हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा से भारत को इस क्षेत्र में अपना रुतबा बढ़ाने में मदद मिलेगी।

यात्रा की तैयारियों से वाकिफ विदेश मंत्रालय में जानकार सूत्रों का मानना था कि भारत-अमेरिका के बीच व्यापारिक व रणनीतिक भागीदारी को लेकर अधिकांश बातें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछले वर्ष सितंबर में अमेरिका यात्रा के दौरान हो चुकी हैं। ओबामा के इस दौरे में जो सबसे बड़ी घोषणा हो सकती है वह परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में तकनीकी हस्तांतरण और अमेरिकी निवेश को लेकर हो सकती है, लेकिन उस पर अभी अंतिम सहमति बनना बाकी है। दूसरा महत्वपूर्ण मसला जलवायु परिवर्तन का है। अमेरिका की कोशिश चीन की तरह भारत को इस मसले पर राजी करने की है। लेकिन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कोयले पर काफी निर्भर भारत इतनी जल्दी कोई आश्वासन देने को तैयार नहीं है। वह तभी हो सकता है जब परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में कोई प्रगति हो।

दौरे की अहमियत 
मंत्रालय के सूत्र इस दौरे की राजनीतिक अहमियत पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। यह दौरा खुद प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत राजनीति के लिहाज से और एशिया क्षेत्र में भारत का रुतबा बढ़ाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। एक अधिकारी का मानना था कि पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश के साथ घनिष्ठ मित्रता के बावजूद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या उनकी पार्टी कांग्रेस उन संबंधों का राजनीतिक फायदा नहीं उठा सके। इसके पीछे एक कारण आजादी के बाद से विदेश नीति का अमेरिका के बजाय रूस की ओर झुकाव था।

मोदी के लिए मौका

ज्यादा समय कांग्रेस के सत्ता में रहने के कारण विदेश नीति में मामूली बदलाव की भी देश में बड़ी प्रतिक्रिया हो सकती थी। अमेरिका के साथ परमाणु ऊर्जा करार करते हुए कांग्रेस को इसी दुविधा का सामना करना पडम था। सरकार पर अमेरिकी पिठ्ठ होने का आरोप भी लगा। भाजपा के साथ यह समस्या नहीं है। पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई नरेंद्र मोदी की सरकार पर किसी खास किस्म की विदेश नीति का ठप्पा नहीं है। इसलिए वह अमेरिका के करीब जाने और दिखने का जोखिम उठा सकते हैं। इस लिहाज से प्रधानमंत्री मोदी के लिए यह खुद को बाकी प्रधानमंत्रियों से अलग दिखाने का एक बड़ा मौका है।

चीन की भी नजरें

ओबामा की यात्रा का दूसरा पहलू भारत और उसके पड़ोसी देशों के बीच संबंधों से संबंधित है। चीन और पाकिस्तान दोनों महत्वपूर्ण पड़ोसियों से भारत के खट्टे मीठे और तनावपूर्ण संबंध रहे हैं। यह दूसरा मौका है जब अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी भारत यात्रा के बाद पाकिस्तान नहीं जाएंगे। पाकिस्तान के लिए यह अच्छी खबर नहीं है। ओबामा की यात्रा के ठीक पहले पाक स्थित आतंकी संगठनों के खिलाफ टिप्पणी कर अमेरिकी प्रशासन ने पाकिस्तान को आगाह किया है कि वह क्षेत्र में शांति के लिए भारत के साथ बातचीत कर मसले सुलझाए। चीन की नजरें भी इस यात्रा पर होंगी। चीन की विकास दर में कमी आई है और अमेरिका यदि नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया कार्यक्रम में निवेश करता है तो चीन को आने वाले समय में भारत की चुनौती से जूझने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।

भारत की ओर देख रहा रूस
इन दोनों पड़ोसियों के अलावा ओबामा की यात्रा भारत के पुराने मित्र रूस के साथ संबंधों को भी प्रभावित करेगी। अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते आर्थिक तंगी की ओर बढ़ रहा रूस रक्षा क्षेत्र में व्यापार के लिए भारत की ओर ताक रहा है। भारत के लिए फिलहाल रूस का साथ छोड़ना मुश्किल है। लेकिन आने वाले दिनों में रूस के साथ भारतीय समीकरणों का खाका मोदी-ओबामा के बीच बनने वाली केमिस्ट्री पर भी निर्भर करेगा।

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