DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

भारत का अंतरिक्ष में मानव भेजने की दिशा में कदम

भारत का अंतरिक्ष में मानव भेजने की दिशा में कदम

इसरो ने गुरुवार को चार टन वजनी सैटेलाइट को ले जाने में सक्षम जीएसएलवी मार्क-3 रॉकेट का सफल प्रक्षेपण किया। इसके साथ ही अंतरिक्षयात्रियों को ले जाने और लाने वाले क्रू मॉड्यूल को वातावरण में पुन: प्रवेश कराने में भी अंतरिक्ष एजेंसी कामयाब हुई। इसे अंतरिक्ष में मानव को भेजने के भारत के लक्ष्य की ओर बड़ा कदम माना जा है।

इसरो ने कहा है कि मानव को अंतरिक्ष में भेजने में अभी कम से कम 10 साल का समय और लगेगा। लेकिन इस प्रयोग ने अंतरिक्ष से मानव को सुरक्षित वापस लाने वाले मॉडयूल का परीक्षण करने में स्पेस एजेंसी की मदद की है। यह पहली बार है कि अंतरिक्ष एजेंसी ने 3775 किलो (करीब चार टन) वजनी रॉकेट की सफल लांचिंग की है। सूत्रों के मुताबिक, इसरो ने अंतरिक्ष के मानव मिशन को पूरा करने के लिए सरकार से 12,500 करोडम् रुपये मांगे हैं। सरकार की मंजूरी के बाद इस अभियान को गति मिलेगी।

दो साल में तैयार होगा क्रायोजेनिक इंजन
इस सफलता के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने कहा है कि अब अंतरिक्ष में मानव भेजने की दिशा में अन्य प्रायोगिक परीक्षण तेज किए जाएंगे। जीएसएलवी मार्क-3 रॉकेट में इस्तेमाल होने वाले क्रायोजेनिक इंजन को दो वर्ष में तैयार कर लिया जाएगा। क्रायोजेनिक इंजन को तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के महेंद्रगिरी लिक्विड प्रोपल्सन सिस्टम सेंटर में विकसित किया जा रहा है।

2014 इसरो का सुनहरा वर्ष------
24 सितंबर को भारत का मंगलयान मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंचा
16 अक्तूबर को नेवीगेशन सिस्टम का तीसरा सैटेलाइट भी लांच हुआ
2015 तक सात ऐसे सैटेलाइट भेजने के साथ चलेगा नेवीगेशन सिस्टम

अंतरिक्षयान के साथ भारत के अंतरिक्षयात्रियों को ले जाने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण चरण था क्रू मॉडय़ूल। क्रू मॉडय़ूल यानी अंतरिक्षयात्रियों का कमरा, जिसके अंदर बैठकर वे अंतरिक्ष में जाएंगे। गुरुवार को ऐसे ही एक क्रू मॉडय़ूल को जीएसएलवी मार्क-3 के साथ प्रक्षेपित कर इसरो ने पहली कामयाबी पाई।

अब क्रू मॉडय़ूल का अध्ययन होगा
अंतरिक्ष मिशन की निर्णायक तैयारी से पहले अब इसकी ताकत को और परखा जाएगा। इसके लिए तमाम प्रायोगिक परीक्षण किए जाएंगे। इस क्रू मॉडय़ूल पर भारतीय तटरक्षक पोत ने नजर रखी और फिर उसे चेन्नई के कामराजार बंदरगाह ले जाया जाएगा। अंतरिक्ष में जाने और वापस धरती की कक्षा में प्रवेश करने के दौरान मॉडय़ूल पर क्या असर पडम, यह जानने के लिए इसे केरल में तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र ले जाया गया।   

आगरा में तैयार हुआ पैराशूट
क्रू मॉडय़ूल का पैराशूट एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेबलिशमेंट आगरा में स्थित डीआरडीओ की लैब में तैयार हुआ था। यह देश में तैयार अब तक का सबसे बडम पैराशूट है। पैराशूट अपने इम्तहान में खरा उतरा। इस चालक दल मॉड्यूल की आंतरिक सतह पर एल्यूमीनियम की मिश्र धातु लगी है और इसमें हजारों डिग्री के तापमान को सहन करने की क्षमता है। इस मुख्य पैराशूट की मदद से ही चालक दल मॉड्यूल ने जल की सतह को सात मीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार के साथ छुआ। क्रू मॉड्यूल ने पृथ्वी की सतह की ओर आते हुए गुरुत्वाकर्षण के तहत 1600 डिग्री के तापमान को भी सहा।


कैसा होगा अंतरिक्षयात्रियों का कमरा
2-3 यात्रियों को ले जाने में सक्षम अंतरिक्ष कैप्सूल
1600 डिग्री की गर्मी को सफलतापूर्वक सहन किया
2.7 मीटर लंबाई इसकी, 3.1 मीटर व्यास का कक्ष
31 मीटर व्यास का पैराशूट धरती पर उतरने के लिए
03 टन के करीब वजन कप-केक जैसा क्रू मॉडय़ूल
20 मिनट 43 सेकेंड बाद बंगाल की खाड़ी में उतरा

भारत अब खुद भारी सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेज सकेगा
जीएसएलवी मार्क-3 रॉकेट के सफल प्रक्षेपण ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत को पूरी तरह आत्मनिर्भरता पाने के लक्ष्य को मजबूती मिली है। अभी तक भारत पीएसएलवी रॉकेट से कम वजन के अपने और विदेशी सैटेलाइट को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करता था। जबकि दो टन से ज्यादा वजनी उपग्रह को धरती की कक्षा में स्थापित करने के लिए भारत यूरोपीय स्पेस एजेंसी का सहारा लेता था। भारत के 3181 किलो के जीसैट-16 सैटेलाइट को सात दिसंबर को यूरोपीय स्पेस एजेंसी ने फ्रैंच गुयाना स्थित कौरू प्रक्षेपण केंद्र से धरती की कक्षा में स्थापित किया था।

इसरो के अध्यक्ष के. राधाकृष्णन ने कहा है कि चार टन वजन सैटेलाइट को कक्षा में स्थापित करने वाले वाहन का सफल प्रक्षेपण इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण दिन है। सस्ती लागत में अंतरिक्ष तकनीक तैयार कर दुनिया भर में अपना लोहा मनवाने वाला भारत दूसरे देशों के भारी उपग्रहों को भी धरती की कक्षा में प्रक्षेपित करने का काम कर सकता है। अभी यूरोप, रूस और अमेरिका ही भारी सैटेलाइट प्रक्षेपित कर भारी कमाई कर रहे हैं।

जीएसएलवी मार्क-3 से फायदे------------
04 टन के सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेज सकेगा भारत
02 टन के सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेज सकता था अभी
160-170 करोड़ रुपये की लागत जीएसएलवी मार्क-3 की

भारी रॉकेट की लांचिंग के लिए यूरोपीय एजेंसी पर निर्भरता नहीं रहेगी
नासा, यूरोपीय स्पेस एजेंसियों के ऐसे मॉडय़ूल की आधी लागत में
सस्ती लागत में दूसरे देशों के भारी सैटेलाइट भी प्रक्षेपित कर पाएगा

कैसे रहा प्रक्षेपण------------------
9.30 बजे: श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से रॉकेट का सफल प्रक्षेपण
05 मिनट 24 सेकेंड बाद 126 किमी की ऊंचाई पर रॉकेट से अलग हुआ क्रू मॉडय़ूल
80 किमी समुद्र तल की ऊंचाई पर पृथ्वी के वातावरण में पुन: प्रवेश कर गया क्रू मॉडय़ूल
07 मीटर प्रति सेकेंड की तेज गति से बंगाल की खाड़ी में सफलतापूर्वक उतरा मॉडय़ूल

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:भारत का अंतरिक्ष में मानव भेजने की दिशा में कदम