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IAS खेमका ने सौंपी रिपोर्ट, वाड्रा पर फर्जीवाड़े का आरोप

हरियाणा के गांव में रॉबर्ट वाड्रा का भूमि सौदा एक बार फिर कांग्रेस पार्टी और उसकी अध्यक्ष के लिए परेशानी का सबब बनता दिख रहा है। भंडाफोड़ करने वाले आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने आरोप लगाया है कि वाड्रा...

IAS खेमका ने सौंपी रिपोर्ट, वाड्रा पर फर्जीवाड़े का आरोप
एजेंसीSat, 10 Aug 2013 10:06 PM
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हरियाणा के गांव में रॉबर्ट वाड्रा का भूमि सौदा एक बार फिर कांग्रेस पार्टी और उसकी अध्यक्ष के लिए परेशानी का सबब बनता दिख रहा है। भंडाफोड़ करने वाले आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने आरोप लगाया है कि वाड्रा ने गुड़गांव में 3.53 एकड़ जमीन के दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा किया और वाणिज्यिक कालोनी के लाइसेंस पर बड़ा मुनाफा हासिल किया।

वाड्रा़ डीएलएफ सौदे की जांच के संदर्भ में पिछले वर्ष अक्टूबर में हरियाणा सरकार की ओर से गठित की गई तीन सदस्यीय जांच समिति के समक्ष विस्तृत जवाब पेश किया। समझा जाता है कि खेमका ने वाड्रा पर आरोप लगाया है कि उन्होंने गुड़गांव के शिकोहपुर गांव में 3.53 एकड़ जमीन के लिए फर्जी लेनदेन किया।

खेमका ने आरोप लगाया कि वाड्रा ने वाणिज्यिक लाइसेंस पर बड़ी राशि प्राप्त की। आईएएस अधिकारी ने आरोप लगाया कि हरियाणा के शहरी एवं क्षेत्रीय योजना विभाग (डीटीसीपी) ने नियमों एवं नियमन को नजरंदाज करते हुए दलालों के रूप में काम करने से संबंधित सांठगांठ वाले पूंजीवादियों (क्रोनी कैपिटलिज्म) को फलने-फूलने की अनुमति दी।

खेमका ने आरोप लगाया कि डीटीसीपी की मदद से वाड्रा ने फर्जी लेनदेन किया। खेमका ने 21 मई को अपना जवाब पेश किया था। इसमें कहा गया है कि 12 फरवरी 2008 के बिक्री के दोनों अनुबंध में वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी ने ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से जमीन खरीदी और मार्च 2008 में डीटीसीपी की ओर से उनकी कंपनी को वाणिज्यिक लाइसेंस प्रदान करने के लिए जारी आशय पत्र फर्जी लेनदेन है, ताकि वाड्रा को बाजार से मुनाफा हासिल हो सके।

उन्होंने सवाल किया कि अगर कोई भुगतान नहीं किया गया जैसा की पंजीकृत दस्तावेज में आरोप लगाया गया है, तब क्या यह कहा जा सकता है कि उक्त भूमि पर पंजीकत दस्तावेज में स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी को स्वामित्व फर्जी बिक्री के माध्यम से दिया गया। पिछले वर्ष अक्टूबर में वाड्रा और डीएलएफ के बीच जमीन का म्यूटेशन रद्द करने वाले खेमका ने दावा किया कि पंजीकृत दस्तावेत में भविष्य में कोई भुगतान नहीं करने का वायदा किया गया था।

समझा जाता है कि खेमका ने 100 पन्नों की रिपोर्ट में कहा कि कोई राशि का भुगतान नहीं किया गसा जैसा की पंजीकत दस्तावेज में दावा किया गया। इस दस्तावेज में बिक्री के पंजीकरण को सही अर्थों में कानूनी या नैतिक रूप में बिक्री नहीं कहा जा सकता और यह नहीं कहा जा सकता कि स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी दस्तावेज में बिक्री के पंजीकरण के माध्यम से जमीन का मालिक हो गया।

खेमका का जवाब सार्वजनिक होने पर, इस बारे में पूछे जाने पर अधिकारी ने कहा कि वह इस मुद्दे पर मीडिया में कुछ नहीं कहेंगे।

पीटीआई ने खेमका का जो जवाब हासिल किया है उसमें वाड्रा—डीएलएफ सौदे में कई अनियमितताएं और अवैधता गिनाई हैं। 2 फरवरी 2008 के विक्रय पत्र में कॉरपोरेशन बैंक के जिस 7.5 करोड़ रूपये के चेक का उल्लेख किया गया है वह वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी की नहीं है।

खेमका ने कहा कि इस बात की संभावना है कि कंपनी ने डीएलएफ की पूरी जानकारी में काल्पनिक चेक नंबर दर्शाया ताकि वह जमीन का कानूनी स्वामित्व हासिल कर सके। खेमका के जवाब का उनके वकील अनुपम गुप्ता ने समर्थन किया। खेमका का कहना है कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि बिक्री दस्तावेज का पंजीकरण करने के दौरान स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी के खाते में उतना धन नहीं था कि वह भूमि की खरीद और दस्तावेज के पंजीकरण पर लगने वाले स्टांप शुल्क के लिए जरूरी 7.5 करोड़ रूपये का भुगतान कर सके।

खेमका ने कहा कि चूंकि धन का कोई हस्तांतरण नहीं हुआ जैसा पंजीकृत बिक्री दस्तावेज में कहा गया है और 45 लाख रुपये के स्टांप शुल्क का भी भुगतान ओंकारेश्वर प्रोपर्टीज ने किया, न कि वाड्रा की कंपनी ने इसलिए यह गलत बयानी है। उन्होंने कहा कि कंपनी द्वारा 31 मार्च 2008 को दायर बैंलेस शीट में गलत तरीके से बैंक बैलेंस को सात करोड़ 94 लाख रुपये के बुक ओवरड्राफ्ट के तौर पर दिखाया गया है क्योंकि 7.5 करोड़ रुपये का चेक कभी पेश नहीं किया गया।

दो महीने के भीतर वाड्रा का 58 करोड़ रूपये में जमीन को बेचने के लिए डीएलएफ के साथ समझौता हुआ और अग्रिम में किश्तों में धन हासिल करना शुरू कर दिया। इसमें से पहली किश्त जून 2008 में आई।

ओंकारेश्वर प्रोपर्टीज को धन का भुगतान डीएलएफ से मिली अग्रिम राशि के जरिए किया गया। आईएएस अधिकारी खेमका ने कहा कि वाड्रा की कंपनी ने जमीन खरीदने में अपना कोई धन लगाए बगैर ही अपने खाते में धन हासिल करना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि डीटीसीपी ने कॉलोनी के लाइसेंस के लिए कंपनी को आशय पत्र बिना खरीद-बिक्री या वाणिज्यिक कॉलोनी के विकास के लिए स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी की क्षमता की वास्तविकता की जांच किए बिना जारी कर दिया।

खेमका ने दावा किया कि भूमि का स्वामित्व और आशय पत्र (एलओआई) आवश्यक शर्तें थीं ताकि वाड्रा की कंपनी अग्रिम राशि हासिल कर सके और जमीन के विकास के लिए डीएलएफ के साथ सहयोग समझौते पर तामील कर सके। डीएलएफ ने इस जमीन के लिए वाणिज्यिक लाइसेंस के लिए अगस्त और सितंबर 2008 में दो बार आवेदन किया लेकिन उसे नहीं मिला। 18 नवंबर 2008 को स्काईलाइट ने डीटीसीपी को नया आवेदन दिया और आवेदन में सहयोग समझौते का संकेत दिया गया है जिसमें कॉलोनी के विकास के लिए स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी की क्षमता को उचित ठहराया गया है। समझौते में दर्ज है कि स्काईलाइट ने तब तक भूमि का कब्जा डीएलएफ को सौंप दिया।

खेमका ने कहा कि बिक्री के एवज में साढ़े सात करोड़ रुपये हासिल किए बिना वाड्रा की स्काईलाइट के पक्ष में बिक्री दस्तावेज की तामील के बाद कंपनी को गुड़गांव के साही गांव में 6.2 एकड़ और 15 एकड़ जमीन पर दो समूह आवासीय लाइसेंस दिया गया। उसे शिकोहपुर में 4.8 एकड़ जमीन के विकास के लिए एक और लाइसेंस दिया गया। इसके साथ ही उसकी कुल संपत्ति जो मार्च 2005 में 6783 रूपये थी, मार्च 2011 में उसका बैंक बैलेंस बढ़कर 70.84 करोड़ रूपये हो गया। यह 25 लाख रुपये के पेड अप शेयर कैपिटल से बढ़कर इतना हो गया।

खेमका ने दावा किया कि राजस्व विभाग, उद्योग एवं वाणिज्य और टाउन एवं कंट्री प्लानिंग विभाग के अधिकारियों ने इस मामले में बिक्री से संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों को हासिल करने के उनके प्रयासों को अवरूद्ध करने की कोशिश की।

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