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जुनून ने रेतीली भूमि को बनाया हरा-भरा

जुनून ने रेतीली भूमि को बनाया हरा-भरा

उम्र के पचासवें दशक के उतरार्ध में एक व्यक्ति ने असम के जोरहट में ब्रह्मपुत्र नदी के बीचों बीच रेतीली भूमि पर एक घना जंगल उगाया है। उनके इस काम ने सरकार, पर्यटकों और फिल्मकारों का ध्यान आकर्षित किया है।

जादव पायेंग नाम के इस व्यक्ति को स्थानीय लोग मुलई नाम से बुलाते हैं। मुलई ने 30 सालों तक 550 हेक्टेयर के इलाके में जंगल उगाने के लिए काम किया। असम वन विभाग ने उनके इस काम को अनुकरणीय बताया है।

मुलई ने 1980 में इस जंगल के लिए काम करना शुरू किया था जब गोलाघाट जिले के सामाजिक वानिकी प्रभाग ने अरूणा चपोरी इलाके में 200 हेक्टेयर भूमि पर वक्षारोपण की एक योजना शुरू की थी। अरूणा चपोरी जोरहट जिले के कोकिलामुख से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

वन के सहायक संरक्षक गुनिन सैकिया जो अब शिवसागर जिले में कार्यरत हैं ने कहा, मुलई हमारी परियोजना के अंतर्गत काम करने वाले मजदूरों में से एक था। हमारी परियोजना पांच साल में पूरी हो गयी लेकिन मुलई ने इसके बाद भी वहीं रूकने का फैसला किया। सैकिया ने कहा कि मुलई ने ना केवल पौधों की देखभाल की बल्कि अपने खुद के प्रयासों से और भी पौधे लगाने जारी रखे जिससे यह इलाका एक बड़ा जंगल बन गया।

सैकिया ने कहा कि शायद यह नदी के बीच स्थित सबसे बड़ा जंगल है। उन्होंने कहा कि वन विभाग ने अब इस इलाके में एक और वृक्षारोपण कार्यक्रम शुरू करने की योजना बनायी है। इससे जंगलों को 1,000 हेक्टेयर भूमि तक फैलाया जा सकता है।

अब इस जगह ना केवल पर्यटक जुट रहे हैं बल्कि एक प्रसिद्ध ब्रिटिश फिल्मकार टॉम रॉबर्ट ने पिछले साल यहां अपनी एक फिल्म की शूटिंग भी की। असमी भाषा में मुलई कथोनी या मुलई जंगल के रूप में जाने जाने वाले इस जंगल में चार बाघ, तीन गैंडे, सौ के लगभग हिरण, लंगूर, खरगोश और चिड़ियों की बहुत सी प्रजातियां पायी जाती हैं।

यहां वालकोल, अर्जुन, इजर, गुलमोहर, कोरोई, मोज और हिमोलू के पेड़ पाये जाते हैं। यहां 300 हेक्टेयर भूमि में बांस के पेड़ हैं। यहां हर साल 100 के लगभग हाथियों का झुंड आता है। ये हाथी यहां छह महीने तक रहते हैं। पिछले कुछ समय में इन हाथियों ने यहां 10 बच्चों को जन्म भी दिया है।

मुलई के प्रयासों पर वन विभाग का ध्यान तब गया जब 2008 में वन अधिकारियों का एक दल 115 हाथियों के एक झुंड की तलाश में यहां आया। ये हाथी पास के गांव के लोगों की संपत्तियों को नुकसान पहुंचाकर जंगलों में घुस आये थे। मुलई ने कहा, अधिकारी घने और विशाल जंगल को देखकर आश्चर्य में पड़ गये और तब से वन विभाग इसके संरक्षण के लिए नियमित तौर पर यहां का दौरा करता रहता है।

प्रकृति प्रेमी मुलई जंगल के पास ही एक छोटे से घर में अपनी पत्नी, दो बेटों और एक बेटी के साथ रहते हैं। उन्होंने गाय और भैंस पाल रखे हैं। वह इन्हीं का दूध बेचकर अपनी आजीविका चलाते हैं। मुलई को राज्य सरकार से एक शिकायत है कि उसने अभी तक उनके अभियान के लिए किसी तरह की वित्तीय सहायता नहीं दी। हालांकि वन विभाग समय-समय पर उन्हें वृक्षारोपण के लिए पौधे उपलब्ध कराता रहता है।

स्थानीय नेता प्राणोन कलिता ने कहा, हम राज्य सरकार से केंद्र से मिलकर इस इलाके को छोटा वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने के लिए जरूरी काम शुरू करने की मांग कर रहे हैं। मुलई ने कहा कि अगर वन विभाग मुझसे इस जंगल की सही देखभाल का वादा करता है तो मैं राज्य के दूसरे हिस्सों में जाकर वहां भी ऐसी ही काम शुरू कर दूंगा।

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