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एचटीटीपी/2 से वेब ब्राउजिंग होगी और तेज

अभी तक अगर आप वेब ब्राउजिंग करते हैं तो वेब एड्रेस की शुरुआत एचटीटीपी (हाइपरटेक्स्ट ट्रांसफर प्रोटोकॉल) से होती है। 1999 से अब तक इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया था। मगर अब एचटीटीपी/2 को इंटरनेट इंजीनियंरिंग टास्कफोर्स ने मंजूरी दे दी गई है। इससे वेब ब्राउजिंग तेज होगी। एचटीटीपी यूजर के ब्राउजर और वेबसाइट के सर्वर के बीच कनेक्शन को नियंत्रित करता है। एचटीटीपी की खोज सर टिम बर्नर्स-ली ने की थी।

एचटीटीपी/2 क्या है?
एचटीटीपी/2 एचटीटीपी का अगला वर्जन है। यह गूगल के एसपीडीवाइ पर आधारित है, जो कि वेब पेज की लोडिंग की प्रक्रिया को तेज करने के लिए डिजाइन किया गया है। एचटीटीपी/2 एक नया मानक है जिसका इस्तेमाल मौजूदा एचटीटीपी1 की जगह किया जाएगा। एचटीटीपी 1 का इस्तेमाल अधिकांश वेबसाइटों द्वारा किया जा रहा है। इससे ब्राउजिंग तेज होती है।

दोनों में क्या है फर्क
एचटीटीपी/2 ज्यादा आधुनिक प्रोटोकॉल है जो की इंटरनेट पर ब्राउजर और सर्वर के बीच डेटा भेजने की प्रक्रिया को नए तरीको से तेज करता है। हालांकि यह बहुत हद तक एचटीटीपी1 से मेल खाता है लेकिन यह सर्वर को ज्यादा कंटेंट पेश करने देता है। हाइ-स्पीड ब्रॉडबैंड ने पहले से ही पेज लोड होने का समय घटा दिया है लेकिन इससे ब्राउजर हाइ-स्पीड बैंडविड्थ का फायदा उठा सकते हैं।


एचटीटीपी और एचटीटीपीएस
एचटीटीपी का पूरा नाम हाइपरटेक्स्ट ट्रांसफर प्रोटोकॉल है। इस प्रोटोकॉल का इस्तेमाल सर्वर और क्लाइंट के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए होता है। वहीं एचटीटीपीएस में एक शब्द एस भी जुड़ा हुआ है। इस एस का मतलब सिक्योर सॉकेट लेयर है। यह प्रोटोकॉल एचटीटीपी और एसएसएल/टीएलएस का मिला-जुला संस्करण है। जब कोई वेब ब्राउजर इस प्रोटोकॉल के तहत किसी सूचना को मांगता है तो सर्वर और क्लाइंट के बीच होने वाला सूचनाओं का आदान-प्रदान पूरी तरह एनक्रिप्टेड (कूट) रूप में होता है। इससे कोई भी बीच में उस डेटा को देखकर पढ़ नहीं सकता है। इसीलिए इसका उपयोग बैंकिंग, कॉर्पोरेट लॉग इन, ई-कॉमर्स वगैरह में होता है।

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