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30 मार्च, 2020|6:48|IST

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आठ उम्मीदवार ही छह वर्षों के लिए होंगे एमएलसी

विधान परिषद में निकाय कोटे के आठ उम्मीदवार ही छह वर्षों के लिए एमएलसी होंगे। जबकि 8 चार वर्षों के लिए और बाकी बचे 8 उम्मीदवार सिर्फ दो वर्षों के लिए एमएलसी बनेंगे। पटना हाईकोर्ट ने 30 जून तक निर्वाचन आयोग को पूर्व में जारी अधिसूचना में संशोधन कर नए सिरे से जारी करने का आदेश दिया है। वहीं आदेश की वैधता को सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की अनुमति को अदालत ने एक सिरे से खारिज कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एल नरसिम्हा रेड्डी तथा न्यायमूर्ति सुधीर सिंह की खंडपीठ ने विधायक देवेश चंद्र ठाकुर एवं वैद्यनाथ प्रसाद की ओर से दायर अर्जी पर सुनवाई की। आवेदक की ओर से अदालत को बताया गया कि एक साथ 24 सीट पर चुनाव कराया जा रहा है। इससे भारतीय संविधान तथा आरपी एक्ट का खुला उल्लंघन किया जा रहा है।

उनका कहना था कि विधान परिषद स्थायी सदन होता है और यह कभी विघटित नहीं होता है। कानून के अनुसार प्रत्येक दो वर्षों पर एक तिहाई सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होता है। गवर्नर के आदेश से तत्कालीन मुख्य सचिव एलपी सिंह ने 17 जून 1953 को इस बारे में अधिसूचना जारी की थी। जिसके तहत प्रत्येक दो वर्षों पर 24 सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने तथा उनकी जगह चुनाव कराने की अधिसूचना जारी की थी।

24 सदस्यों में आठ स्थानीय निकाय के सदस्यों द्वारा चुने गए सदस्य। दो स्नातक क्षेत्र एवं दो शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से तथा आठ बिहार विधानसभा के द्वारा चुने गए एवं महामहिम द्वारा मनोनीत चार सदस्यों को रखा गया था। कुल 72 सदस्यों को बिहार विधान परिषद में भेजने का प्रावधान है जिसके लिए प्रत्येक दो वर्ष पर एक तिहाई सदस्यों का निर्वाचन किए जाने का प्रावधान किया गया।

अधिसूचना के तहत एक तिहाई सदस्यों का कार्यकाल प्रत्येक दो वर्षों पर 7 मई को समाप्त होगा। इसे लागू कर पहली बार 1954 में एक तिहाई सदस्यों का कार्यकाल समाप्त किया गया। फिर 1956 में अगले एक तिहाई और अंत में 1958 में बाकी बचे एक तिहाई सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हुआ। इस अधिसूचना के अनुसार 1972 तक चुनाव का काम किया गया। उसके बाद चुनाव मनमाने ढंग से होने लगा।

केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए ए़िडशनल सॉलिसिटर जनरल वरीय अधिवक्ता एसडी संजय ने पूर्व के सॉलिसिटर जनरल के मंतव्य पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि कानून में बदलाव की जरूरत नहीं है। मौजूदा कानून के तहत चुनाव कराया जाना चाहिए। उनका कहना था कि कानून की विवेचनासही तरीके से की जानी चाहिए। जबकि निर्वाचन आयोग के वकील ने कहा कि एक बार चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद कोर्ट को हस्तक्षेप करने का अधिकार काफी सीमित हो जाता है।

वहीं राज्य सरकार की ओर से प्रधान अपर महाधिवक्ता ललित किशोर ने अर्जी का पूरजोर विरोध  करते हुए कहा कि जब तक कानून में संशोधन नहीं किया जाता, तब तक प्रत्येक दो वर्षों पर एक तिहाई सदस्यों का कार्यकाल समाप्त करने का आदेश जारी नहीं किया जा सकता। उनका कहना था कि कोर्ट विधानसभा को कानून में बदलाव करने के लिए निर्देश नहीं दे सकता। पूर्व से ऐसा चला आ रहा है।  इसे आगे भी जारी रहने दिया जाए।

अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद निर्वाचन आयोग को चुनाव अधिसूचना में आगामी 30 जून तक संशोधन कर जारी करने का आदेश दिया। अदालत ने 1953 की अधिसूचना के तहत एक तिहाई सदस्यों का कार्यकाल समाप्त करने को आधार मानकर संशोधित अधिसूचना जारी करने का आदेश दिया। अदालत का आदेश आने के बाद राज्य सरकार की ओर से आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के लिए अनुमति मांगी गई। सरकार के अनुरोध को कोर्ट ने खारिज करते हुए कि वह आदेश को चुनौती देने के लिए स्वतंत्र है। अदालत की अनुमति की कोई जरूरत नहीं है।

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