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नालंदा में बुद्धत्व प्राप्ति के गुर सीख रहे विश्व के लोग

फिर से भारत को विश्व गुरु बनाने की राह पर चल चुका है नालंदा। यह सुनकर ताज्जुब होगा कि नव नालंदा महाविहार में बुद्धत्व प्राप्ति के गुर सिखाये जा रहे हैं। इस गुर को सीखने के लिए न सिर्फ भारत और बौद्धिस्ट देशों बल्कि विज्ञान के क्षेत्र में शीर्ष पर रहने वाले देशों के छात्र भी आ रहे हैं। अब तक इटली, रूस, ब्रिटेन, यूएसए, म्यांमार, श्रीलंका, आस्ट्रेलिया समेत डेढ़ दर्जन से अधिक देशों के लोग ‘विपश्यना’ सीखने नालंदा की पवित्र धरती पर आ चुके हैं।

बोधि वृक्ष के नीचे ‘विपश्यना’ की ईजाद की थी सिद्धार्थ ने
विपश्यना नामक साधना के बूते ही सिद्धार्थ ने बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर बुद्धत्व की प्राप्ति की थी। उनकी इस साधना का पूरा विश्व कायल हुआ था। इसके बाद ही भारत को विश्व गुरु के रूप में पहचान मिली थी। नव नालंदा महाविहार के अध्यापक दीपांकर लामा बताते हैं कि ‘विपश्यना’ कई देशों में अब भी प्रचलित है। लेकिन भगवान बुद्ध द्वारा ईजाद किये गये विपश्यना के मूल रूप को म्यांमार (बर्मा) के लोग जीवित रखे हुए हैं। वहां के धर्मगुरु उबाखिन ने मुम्बई के एसएन गोयनका को असह्य मानसिक रोग से छुटकारा दिलाया। इसके बाद श्री गोयनका ने इसे पूरे विश्व में फैलाने की ठानी है।

अपने पर नियंत्रण करने की क्षमता पाना ही विपश्यना है
विपश्यना शिविर में 10 दिन तक अभ्यास कराया जाता है। पहले साढ़े तीन दिन तक अपनी स्वाभाविक सांस पर ध्यान केन्द्रित कर चंचल मन को नियंत्रण करना सिखाया जाता है। शेष साढ़े छह दिन तक अंतर्मन की गहराइयों में दबे हुए विकारों को दूर किया जाता है। गृहस्थों के जीवन से दुख एवं समस्याओं को खत्म कर उल्लासपूर्ण जीवन जीने में विपश्यना महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विपश्यना के ट्रेनर कुमार आनंद बताते हैं कि अपने पर खुद नियंत्रण करने की क्षमता पा लेना ही विपश्यना है।

क्या किया जाता है शिविर में
शिविर में भगवान बुद्ध के प्रवचनों को सुनाया जाता है। विपश्यना चित्त को निर्मल के साथ व्याकुलता के कारणों को दूर करता है। विपश्यना का अभिप्राय यह है कि जो वस्तु सचमुच में जैसी हो, उसे उसी प्रकार जान लेना है। साधकों को विपश्यना के समय आर्य मौन में रहना पड़ता है। इससे मन भी मौन होने लगता है। इसके लिए अधिष्ठान अर्थात् दृढ़ निश्चय जरूरी है। अधिष्ठान की साधना से मन को अनुशासित किया जा सकता है। साधना के समय आसन बदलना भी वर्जित है। साधना का उद्देश्य सजग रहकर संवेदनाओं के अनित्य स्वभाव को समझते हुए समता बनाये रखना है। मन शुद्धि की साधना में शारीरिक पीड़ा का सामना करना पड़ता है। लेकिन विपश्यना के ध्यान से मन को वास्तविक शांति की प्राप्ति होती है। इसके कारण सुखी एवं उपयोगी जीवन जीना संभव है।

विपश्यना के लाभ
1. मन के समस्त विकार दूर होते हैं।
2. अपने कर्तव्यों व दायित्वों को कुशलतापूर्वक निर्वाह करने में मददगार।
3. सजगता, करुणा, मैत्री, समता सत्यवादिता, निश्चल प्रेम जैसे सद्गुणों को बढ़ाता है।
4. मन से उदासी, नकारात्मकता, डिप्रेशन, कमजोरी का समूल नाश करता है।
5. सहकर्मियों व पारिवारिक सदस्यों से बेहतर सामंजस्य बनाने में सहायक।
6. इम्प्रूव कंसेंट्रेशन, मन पर नियंत्रण की शक्ति का विकास।
7. याददाश्त में तीक्ष्णता।
8. निर्णय लेने की क्षमता की बढ़ोतरी।
9. सेल्फ कंफीडेंस बढ़ाता है।
10. भय, तनाव, घृणा, नर्वसनेस को कम करता है।
11. काम और पढ़ाई करने की क्षमता में वृद्धि।
12. सामने वाले की बात को शीघ्र समझने में सहायक।
13. स्पष्टवादिता बनाता है।
14. दिमाग को हेल्दी बनाता है।
15. आदमी को पूर्ण मानवता की ओर ले जाने में सहायक।

कैसे पहुंच रहे साधक
नव नालंदा महाविहार (डिम्ड यूनिवर्सिटी) की वेबसाइट (डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यूडॉटएनएनएमडॉटएसीडॉटआईएन) पर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराया जा सकता है। इसके लिए किसी प्रकार की फीस नहीं देनी पड़ती है। रहने व भोजन की व्यवस्था भी विश्वविद्यालय की ओर से की जाती है।

क्या कहते हैं साधक
दस दिनों का कोर्स कर चुके आस्ट्रेलिया के स्टीवेन ने बताया कि उनके मन से नकारात्मकता दूर हो गयी है। इटली की कॉमरी ने बताया कि धन से नहीं बल्कि मन की शांति से ही सुख की प्रप्ति होती है। विपश्यना के बाद मैं आनंदित जीवन जी रही हूं। यूएसए की कैरेन, मुम्बई की कंचन, बेंगलुरु की स्टीफन और कोलकाता के शैलेन्द्र कामत ने बताया कि विपश्यना के कोर्स के बाद चित्त शांत रहता है। मानसिक पीड़ा दूर हो गयी है।

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  • Web Title:नालंदा में बुद्धत्व प्राप्ति के गुर सीख रहे विश्व के लोग