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भागलपुर में धीरे-धीरे खत्म होता गया वामपंथियों का दबदबा

भागलपुर में धीरे-धीरे खत्म होता गया वामपंथियों का दबदबा

भागलपुर जिले में कभी लाल झंडे का बोलबाला हुआ करता था। लेकिन धीरे-धीरे वामदलों का गढ़ जिले में ढहता चला गया। 1977 में तीन सीटों पर जीत दर्ज करने वाली सीपीआई आज जिले की राजनीति में हाशिये पर आ गई है। पिछले दो विधानसभा चुनाव में तो वामदल किसी भी सीट पर दूसरे स्थान पर नहीं रही। 16 साल से वामदलों को जिले में कोई सफलता नहीं मिल पाई है। जिले में सीपीआई और सीपीएम का मजबूत संगठन था। कार्यकर्ताओं की लंबी फौज थी। पीरपैंती विधानसभा क्षेत्र सीपीआई का गढ़ माना जाता था। यहीं से सीपीआई के टिकट पर अम्बिका प्रसाद सात बार जीत दर्ज की। लेकिन 2005 से पीरपैंती क्षेत्र भी सीपीआई के हाथों से फिसलता चला गया। 1977 में पहली बार जिले की सात सीटों में से तीन सीटों पर सीपीआई ने जीत दर्ज की थी। 1977 में सीपीआई के टिकट पर पीरपैंती से अम्बिका प्रसाद, गोपालपुर से मणिराम सिंह और बिहपुर सीट से सीताराम सिंह निर्वाचित हुए थे। इसके बाद पीरपैंती को छोड़ किसी क्षेत्र में पार्टी को सफलता नहीं मिली। हालत यह हो गई कि किसी विधानसभा क्षेत्र में पार्टी दूसरे स्थान पर भी नहीं रही। सीपीएम से सुबोध राय एक बार विधान परिषद सदस्य रहे। 1999 में राजद के साथ गठबंधन के तहत सीपीएम प्रत्याशी सुबोध राय ने भागलपुर लोकसभा सीट से जीत दर्ज की थी।

2004 में भाजपा प्रत्याशी सुशील कुमार मोदी से पराजित होने के बाद लाल झंडा हर विधानसभा क्षेत्र में पिछड़ता चला गया। अब भी वामदलों की जिले में अच्छी पकड़ है। लेकिन वोट की राजनीति में वामदल को सफलता नहीं मिल पा रही है।

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  • Web Title:Left end has gradually dominate in Bhagalpur