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बंद चीनी मिल के मसले पर नेताओं को घेरेगी पूर्णिया की जनता

बंद चीनी मिल के मसले पर नेताओं को घेरेगी पूर्णिया की जनता

चुनावों में मुद्दत से मुद्दा बन रही ‘बनमनखी चीनी’ मिल के जीर्णोद्धार की मांग गुजरते वक्त के साथ मंद पड़ती जा रही है। वादों और आश्वासनों की लंबी फेहरिस्त में लोग इसे असाध्य रोग मान भूल भी गए हैं। हालांकि, इस बार फिर चुनाव में चीनी मिल के मसले को हवा दिया जा रहा है। वैसे पूर्णियावासियों को यह सवाल पिछले कई सालों से साल रहा है कि जिसे वे मुद्दत से मुद्दा बनाते आ रहे हैं उसके प्रति राजनीतिक नेतृत्व इतना उदासीन क्यों बना रहा? औद्योगिक विकास की घोषणाओं की भीड़ में बनमनखी चीनी मिल का मसला आखिर क्यों गौण होकर रह गया? भुखमरी से जूझते इसके कामगार व गन्ने की खेती करने वाले किसानों की उम्मीदों के प्रति सरकार व राजनीतिक महकमा आखिर क्यों कभी गंभीर नहीं हुआ। पूर्णियावासियों के जेहन में सवाल ढेर सारे हैं जो फिर उछाल मारने लगे हैं। याद रहे कि बनमनखी चीनी मिल को बंद हुए करीब तीन दशक से अधिक हो गए। बीते दशकों में कई चुनाव हुए और अमूमन हर चुनाव में यह मुद्दा बना पर आज तक स्थिति जस की तस है। भुखमरी से जूझते कई कामगार स्वर्ग सिधार गए तो कई ने हताशा में पेट की भूख की खातिर मजदूरी की राह पकड़ ली। प्रबंधकीय विसंगतियों के कारण बनमनखी चीनी मिल 1997-98 से ही बंद पड़ी है। इस मिल को चालू कराने की मांगें कई दफे उठायी गईं। धरना और प्रदर्शन भी हुए पर इलाके के लोगों को आश्वासन के सिवाय कभी कुछ नहीं मिला। इस बीच मिल के कामगारों की माली हालत बिगड़ती चली गई। मिल के बंद होने से किसानों को बड़ा नुकसान हुआ। एक तो बकाया नहीं मिला और फिर गन्ना की खेती पर ब्रेक भी लग गया, जबकि यह पूर्णिया की मुख्य नकदी फसलों में था। पहली दफे 1995 में बनमनखी चीनी मिल को मुद्दा बनाया गया था। तबसे यह हर चुनाव में मुद्दा बनता आ रहा है। 2000, 2005 और 2010 के चुनाव में भी यह मुद्दा बना था। इस बार लोग इसे चुनावी मुद्दा बनाने का तैयार हैं।

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  • Web Title:Get off on the issue of Chinese leaders Geregi people of Purnia