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नीतीश के नेतृत्व में

बिहार में जनता दल (यू) और राष्ट्रीय जनता दल का गठबंधन चुनावी रणनीति के तौर पर जितना आकर्षक लगता है, उसको जमीनी स्तर पर उतारना उतना आसान नहीं है। इसके रास्ते में कितनी बाधाएं हैं, यह चुनाव जितने करीब आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे दिखाई दे रहा है। लेकिन यह भी लग रहा है कि बाधाओं को हटाने का काम भी काफी मुस्तैदी से चल रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की घोषणा कर दी गई है। यूं नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार होना बहुत स्वाभाविक लग सकता है। वह मौजूदा मुख्यमंत्री हैं और मुख्यमंत्री के तौर पर वह देश के सफलतम मुख्यमंत्रियों में गिने जाते हैं। यह बहुत साफ है कि नीतीश कुमार के अगले मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित होने से जद (यू)-राजद गठबंधन के वोटों में इजाफा होगा। अगर मुख्यमंत्री के पद को अनिश्चित छोड़ दिया जाता या किसी और को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाता, तो गठबंधन के फिर से सत्ता में आने की संभावनाओं को धक्का पहुंचता।

यह लग रहा था कि लालू प्रसाद यादव चूंकि मुख्यमंत्री नहीं बन सकते, इसलिए मुख्यमंत्री पद को लेकर कोई विवाद नहीं होना चाहिए। लालू प्रसाद यादव या उनके परिवार के किसी सदस्य के प्रतिस्पर्धा में न होने की स्थिति में राजद के किसी नेता में महत्वाकांक्षा पैदा भी हो, तो जीतनराम मांङी के अनुभव के बाद कोई ऐसा खतरा मोल नहीं लेना चाहेगा। सिद्धांतत: यह आदर्श स्थिति थी। लालू यादव के पास नीतीश कुमार से ज्यादा मजबूत वोट बैंक है और नीतीश के पास अच्छे मुख्यमंत्री व प्रशासक होने की छवि है। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव करीब आते गए, गठबंधन में दरारें दिखने लगी थीं। यह भी स्वाभाविक था। पिछले लगभग दो दशक से जद (यू) और  राजद अलग-अलग खेमों में रहे हैं और उनके कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर एक-दूसरे के खिलाफ सक्रिय रहे हैं। ऐसे में, नेताओं व कार्यकर्ताओं के बीच अचानक सौहार्द और समन्वय पैदा हो भी नहीं सकता। दूसरी बड़ी चुनौती सीटों के बंटवारे की है, जो संभवत: सबसे बड़ी चुनौती होगी। इससे निपटने के लिए छह सदस्यों की एक समिति बनाई गई है, जिसमें तीन-तीन नेता दोनों पार्टियों के होंगे। समिति का काम किसी भी नजरिये से आसान नहीं होगा। राजनीति में एक आम तरीका यही होता है कि किसी भी समझौते के लिए जायज से ज्यादा की मांग की जाए, ताकि मोल-भाव में बेहतर फायदा हासिल कर लिया जाए। नीतीश को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने पर संदेह खड़ा करने का उद्देश्य भी संभवत: यही, यानी मोल-भाव के लिए एक मुद्दा खड़ा करना रहा हो और सीटों के बंटवारे में भी पार्टियां इसी तरह अपना दावा रखेंगी। लेकिन साथ रहना दोनों के लिए फायदेमंद है और दोनों पार्टियों की मजबूरी भी है। अगर भाजपा का मुकाबला करना है, तो दोनों पार्टियों को साथ रहना ही होगा।

यह दिलचस्प है कि मुलायम सिंह यादव दोनों पार्टियों को साथ रखने के लिए मध्यस्थता कर रहे हैं। मुलायम सिंह यादव ने ही साझा प्रेस कांफ्रेंस में नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की घोषणा की। समाजवादी पार्टी का बिहार में कोई स्वार्थ नहीं है, इसलिए एक तटस्थ सहयोगी की तरह मुलायम सिंह यादव विवादास्पद मुद्दों पर सुलह कराने में मदद कर सकते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर छह पार्टियों के गठबंधन का हित भी इसी में है कि दोनों पार्टियां सिर्फ साथ-साथ नहीं, बल्कि तालमेल बनाकर काम करें। जनता परिवार के घटकों का इतिहास साथ रहने से ज्यादा अलग होने का है, लेकिन जरूरी नहीं कि इतिहास हर वक्त दोहराया ही जाए।

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