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उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में नोटबंदी के बावजूद लाखों रुपये का दान

उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में नोटबंदी के बावजूद लाखों रुपये का दान

लाखों का दान

उज्जैन में स्थित दुनिया भर में प्रसिद्ध भगवान श्री महाकालेश्वर मंदिर की दान पेटियों पर नोटबंदी का कोई असर नहीं पड़ा है। नोटबंदी के बावजूद भक्त भगवान महाकालेश्वर के मंदिर में पूरी श्रद्धा से दान कर रहे हैं। नोटबंदी हुए 15 दिन से ज्यादा हो चुके हैं। गुरुवार को मंदिर के छह दानपात्रों से सवा पांच लाख रुपये से अधिक का दान प्राप्त हुआ है।

मंदिर प्रबंधन सूत्रों के मुताबिक मंदिर दान पेटी में दान की शाखा प्रभारी, गणना पर्यवेक्षक और उनके सहयोगी के मार्गदर्शन में गणना की गई। मंदिर के नंदी मंडपम की चार भेंट पेटियों से कुल राशि दो लाख 75 हजार 886 रुपये और गर्भगृह की दो भेंट पेटियों से कुल राशि दो लाख 52 हजार 672 रुपये की निकली।

उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में नोटबंदी के बावजूद लाखों रुपये का दान
उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में नोटबंदी के बावजूद लाखों रुपये का दान

भारत के 12 ज्योतिर्लिगों में शुमार महाकालेश्वर

भारत के 12 ज्योतिर्लिगों में प्राचीन और प्रमुख भगवान महाकालेश्वर मंदिर देश का एक मात्र ऐसा शिवालय है जहां प्रतिदिन तड़के भस्म आरती होती है।  पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन किया गया है। स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यन्त पुण्यदायी महत्ता है। इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, ऐसी मान्यता है।

उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में नोटबंदी के बावजूद लाखों रुपये का दान
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इल्तुत्मिश ने तुड़वाया था मंदिर

महाकवि कालिदास ने मेघदूत में उज्जयिनी की चर्चा करते हुए इस मंदिर की प्रशंसा की है। 1335 ईसवी में इल्तुत्मिश के द्वारा इस प्राचीन मंदिर का विध्वंस किए जाने के बाद से यहां जो भी शासक रहे, उन्होंने इस मंदिर के जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण की ओर खास ध्यान दिया, इसीलिए मंदिर अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त कर सका है। प्रतिवर्ष और सिंहस्थ के पूर्व इस मंदिर को सुसज्जित किया जाता है।

मंदिर एक परकोटे के भीतर स्थित है। गर्भगृह तक पहुंचने के लिए एक सीढ़ीदार रास्ता है। इसके ठीक उपर एक दूसरा कक्ष है जिसमें ओंकारेश्वर शिवलिंग स्थापित है। मंदिर से लगा एक छोटा-सा जलस्रोत है जिसे कोटितीर्थ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इल्तुत्मिश ने जब मंदिर को तुड़वाया तो शिवलिंग को इसी कोटितीर्थ में फिकवा दिया था। बाद में इसकी फिर से प्रतिष्ठा कराई गई।
 

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