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21 नवंबर, 2019|5:42|IST

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स्त्री के संसार का सार दिखाती लीला

स्त्री के संसार का सार दिखाती लीला

8 मार्च यानी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से एक अनूठा नाट्य उत्सव लीला-2010 प्रारंभ हो चुका है। यह उत्सव अनूठा इस अर्थ में है कि पहली बार दक्षिण एशियाई स्तर पर स्त्री और उससे जुड़े मुद्दों पर केंद्रित नाटकों का मंचन किया जाएगा। इसमें सभी सार्क देशों के प्रमुख नाटय़-समूह शिरकत कर रहे हैं। 15 मार्च तक चलने वाले इस उत्सव पर संजीव माथुर की रिपोर्ट।

लीला-2010

स्त्री का संसार कोई अपरिचित संसार नहीं है। हां, यह संसार पुरुष को अक्सर रहस्यमय व गूढ़ अवश्य लगता है। पर क्या सच में ऐसा है? हाल ही में शुरू हुए नाट्य उत्सव लीला -2010 की संकल्पना को देखने- समझने के बाद यह धारणा टूटती है। लीला में दिखाए जा रहे 14 नाटकों की सूची पर नजर डाली जाए तो साफ दिखाई देता है कि स्त्री का संसार सिर्फ भाव या अभाव भर की कथा नहीं है। स्त्री को केवल स्त्री ही नहीं समझ सकती। पुरुष के भीतर स्त्री और स्त्री के भीतर पुरुष पनपता है। जीवन के सौंदर्य और त्रसदी को दोनों मिल कर रचते हैं।

एक प्रकार से यह उत्सव स्त्रीवादी विमर्श के रचनात्मक सजर्न की परंपरा के भीतर ही सीमित नहीं है। यह हमारे वक्त की राजनैतिक-सामाजिक आलोचना भी प्रस्तुत करता है, स्वरूप में गुंथे  सार-तत्व को प्रदर्शित करता है। जैसे महाश्वेता देवी की कहानी पर कन्हाईलाल द्वारा निर्देशित मणिपुरी नाटक द्रौपदी के प्रमुख पात्र विद्रोह की शुरुआत तो अपनी निजी पीड़ाओं के आधार पर करते हैं, पर धीरे-धीरे यह विद्रोह नए समाज की रचना की प्रथम आहुति बन जाता है। इस नाटक की प्रमुख पात्र द्रौपदी अपनी माटी और समाज को राह दिखाती ज्वाला बनती है। वहीं पाकिस्तानी नाट्क अब जंग नहीं होगी परंपरा में सिमटे सवाल को आज के परिदृश्य से जोड़ कर सामने लाता है। इस नाटक में दो आदिवासी समूहों द्वारा उपनिवेशवादी ताकत से एकजुट होकर आजाद होने और इस प्रक्रिया में दोनों समूहों में पुरुष सत्ता द्वारा स्त्री को उपनिवेश बनाने की मंशाओं के विरुद्ध स्त्री के संघर्ष को उकेरा गया है। इससे पूर्व 2003 में नटरंग प्रतिष्ठान ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के सहयोग से एशियाई महोत्सव किया था, पर इस उत्सव में  सिर्फ महिला नाटककारों व निर्देशकों के काम को मंचित किया गया था। लीला-2010 इस अर्थ में खासा अलग है। इसमें न सिर्फ महिला, अपितु पुरुष नाटककारों व निर्देशकों के नाटकों का भी मंचन किया जा रहा है।

एनएसडी की कीर्ति जैन के मुताबिक, इस उत्सव में मंचित किए जाने वाले नाटक स्त्री और उससे जुड़े मुद्दों पर ही केंद्रित होंगे। गौरतलब है कि लीला- 2010 का आयोजन राष्ट्रीय नाट्य़ विद्यालय,  इंडियन काउंसिल फॉर कलचरल रिलेशंस व जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है।

दिखाए जाने वाले नाटकों की सूची:

धोहनहीयाला: 6:30 शाम, कमानी10 मार्च। नागमंडल: 8:30 शाम, एसआरसी10 मार्च। जंग अब नहीं होगी: 6:30 शाम, एसआरसी11मार्च। सदाकनाइया जात का: 8:30 शाम,मेघदूत, संगीत नाटक अकादमी, 11मार्च। द्रोपदी: 6:30 शाम, एसआरसी 12 मार्च। 10 सो सेड शकुनी: 6:30 शाम, एसआरसी13मार्च। सालसाल एंड शाहमामा: 8:30 शाम, मेघदूत, संगीत नाटक अकादमी13 मार्च। बेहुलार भासान: 6:30 शाम, एसआरसी14 मार्च। सोनाटा: 6:30 शाम, एसआरसी15 मार्च। गलीम गीलू: 8:30 शाम, मेघदूत, संगीत नाटक अकादमी,15 मार्च।

लीला 2010 में प्रदर्शित किए गए कुछ प्रमुख नाटक

नटी विनोदनी - यह नाटक कलाकार विनोदनी के जीवन संघर्ष की गाथा सुनाता है। विनोदनी का शुमार गुलाम भारत के भद्र बंगाल में बतौर कलाकार सार्वजनिक तौर पर प्रवेश करने वाली स्त्रियों की प्रथम पंक्ति में किया जाता है। विनोदनी का अपनी पहचान, सम्मान और स्वतंत्रता को लेकर किया संघर्ष का हमारे नवजागरण में अहम स्थान है। नाटक का निर्देशन एनएसडी की अध्यक्ष अमाल अल्लाना ने किया है।

सक्कूबाई- प्रसिद्ध रंगकर्मी नादिरा जहीर बब्बर द्वारा लिखित व निर्देशित यह नाटक हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में अहम किरदार निभाने वाले घरेलू कामगार महिलाओं की जीवन कथा बताता है।

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