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17 नबम्बर, 2019|12:29|IST

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खतरनाक संकेत

अगर बहुत उदारता बरती जाए तो भी यह कहना मुश्किल है कि भारत-पाकिस्तान के बीच जो बातचीत शुरू हुई है, उसमें पाकिस्तान का रवैया सहयोगपूर्ण है। बातचीत के पहले और बातचीत के दौरान भी पाकिस्तान की ओर से जो बयान आए थे, वे बातचीत को बिगाड़ने वाले थे। अब पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह मुहम्मद कुरैशी ने बयान दिया है कि बातचीत में लश्करे तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद का कहीं जिक्र नहीं हुआ। यह तार्किक रूप से भी असंभव लगता है कि भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों के बीच आधिकारिक बातचीत हो और लश्करे तैयबा या हाफिज सईद की कारगुजारियों का जिक्र न हो। भारत के गृह सचिव जी.के. पिल्लई का कहना है कि पाकिस्तानी विदेश सचिव को सईद की 26/11 में भूमिका के बारे में दस्तावेज दिए गए थे। विदेश सचिव निरुपमा राव का भी यही कहना है कि उन्होंने बातचीत में सईद के उत्तेजक बयानों और इस मुद्दे पर पाकिस्तान सरकार की निष्क्रियता का जिक्र किया था। बातचीत के दौरान पाकिस्तानी विदेश सचिव ने व्यंग्यात्मक अंदाज में हाफिज के खिलाफ सौंपे गए दस्तावेजों को ‘साहित्य’ कहा था, इसका अर्थ है कि ऐसा दस्तावेज सौंपा तो गया ही था। अभी हाफिज सईद ने एक रैली में भारत के खिलाफ आरोप लगाया है कि भारत ‘गैरकानूनी’ बांध बनाकर पाकिस्तान का पानी छीन रहा है। उसने भारत पर ‘पानी का आतंकवाद’ अपनाने का आरोप लगाकर युद्ध का आह्वान भी किया। दोनों देशों  के बीच जल विवाद है और इन पर उपयुक्त मंचों पर बातचीत भी होती है। इसमें सईद की तो कोई भूमिका नहीं हो सकती। इस मुद्दे पर भड़काऊ बयान देकर सईद अपनी जड़ें पाकिस्तान में मजबूत कर रहा है। यह भी साफ है कि उसे पाकिस्तानी सत्ता तंत्र का प्रोत्साहन भी मिल रहा है। दरअसल, अमेरिका की अफगानिस्तान में ‘अच्छे तालिबान’ ढूंढ़कर उनसे समझौता करने की नई रणनीति के बाद पाकिस्तानी सत्ता तंत्र ज्यादा दुस्साहसी हो गया है। वह जानता है कि यह रणनीति अमेरिकी कमजोरी को दिखाती है और तालिबान से समझौता सिर्फ पाकिस्तान करवा सकता है। इसलिए वह इस समझौते के लिए शर्ते रख रहा है तो दूसरी तरफ भारत के साथ भी उसका रुख कड़ा हो गया है। उसने बातचीत के पहले भी यह प्रचारित किया कि अमेरिकी दबाव की वजह से भारत राजी हुआ है।
यह सब इस बात का संकेत है कि जैसे-जैसे पाकिस्तान के पश्चिम से अमेरिकी वापसी की रणनीति आगे बढ़ेगी, पाकिस्तान का रुख भारत के प्रति ज्यादा आक्रामक और शत्रुतापूर्ण होता जाएगा। पाकिस्तानी विदेश मंत्री का बयान और हाफिज की भारत विरोधी रैली एक तरह से पिछले दिनों हुई विदेश सचिवों की बातचीत को व्यर्थ करने की कोशिश है। इस बात के भी संकेत हैं कि जैसे-जैसे अमेरिकी पाकिस्तान के सहारे तालिबान से समझौता करने की दिशा में आगे बढ़ेगा, भारत पर आतंकवाद की मार तेज हो सकती है। अब यह साफ होने लगा है कि अमेरिकियों का लक्ष्य फिलहाल अफगानिस्तान से निकलना है, इसमें संभव है कि भारतीय हितों की उपेक्षा हो। भारत के लिए यह जरूरी है कि वह नई परिस्थितियों के हिसाब से अपनी कमर कसे और शांति और अपने हितों की रक्षा के लिए नए समीकरण और नई रणनीतियां बनाए।

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