क्या आप तैयार हैं राजनीति की पारी के लिए? - क्या आप तैयार हैं राजनीति की पारी के लिए? DA Image
21 नबम्बर, 2019|4:07|IST

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क्या आप तैयार हैं राजनीति की पारी के लिए?

सन् 1992 में जबसे देश की पंचायतों और नगर निगमों (या नगर पालिकाओं) में महिलाओं को 33% आरक्षण मिला है, उनकी सामाजिक स्थिति बदली है। इस एक फैसले से देश की दस लाख महिलाएं सीधे राजनीति में आ गईं। इससे उन्हें अपनी, बाकी महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा और स्वास्थ्य की नीतियों को जानने का मौका मिला। गांव की पंचायत हो, कस्बे की नगर पालिका या फिर बड़े शहरों के नगर निगम उनका हिस्सा बनकर भारत की महिलाओं ने समाज और व्यवस्था में निर्णायक हस्तक्षेप किया।

आंकड़े बताते हैं कि उनके स्थानीय राजनीति में आने के बाद 60% जल परियोजनाएं शुरू की गईं। यानी उन्हें बखूबी पता है कि बुनियादी मुद्दे क्या हैं। हालांकि लंबे समय तक यह माना जाता रहा है कि निर्वाचित महिला प्रतिनिधि अपने पति या पुरुष संबंधी की रबर स्टैंप मात्र हैं, लेकिन धीरे-धीरे यह हालत भी बदली। जैसे-जैसे वे शिक्षित और जागरूक हो रही हैं, वे अपनी भूमिका खुद और पूरी शिद्दत से निभा रही हैं।

18 साल में उन्होंने अपनी राजनीति को लेकर समाज की सोच बदलने में बड़ी कामयाबी हासिल की है। अगर संसद और विधानसभाओं में भी महिलाएं के लिए 33% सीटें तय हो जाती हैं तो इसमें पंचायतों और नगर निगमों (या नगर पालिकाओं) की समर्पित महिलाओं का योगदान भी कम नहीं होगा। तो देखें गत सदी में शनै:शनै: आए बदलावों का दशकवार ब्यौरा -

किस तरह हुआ बदलाव
बीसवीं शताब्दी का आरंभ - महिलाएं घर से निकलने के बारे में सोच भी नहीं सकती थीं। घर के अंदर भी घूंघट। पढ़ना लिखने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती थी। जीवन मुश्किल था। वो महज आज्ञापालक थीं। पुरुष की बात ब्रह्मवाक्य। तर्क करना अक्षम्य अपराध था।

1920 के आसपास का समय - जब भारत में पहले पहल लड़कियों के लिए कुछ स्कूल खोले गये तो रूढ़िवादी तबके ने उसका जबरदस्त विरोध किया। किसी की हिम्मत नहीं थी कि वो समाज से लड़कर अपनी बेटियों को स्कूल भेजें। स्कूलों जाने वाली लड़कियों के परिवारों का सामाजिक और जातीय बहिष्कार कर दिया गया। लेकिन जागृति चेतना की शुरुआत तो हो ही चुकी थी। हालांकि घरों में औरत का हाल कमोबेश वैसा ही था। मूक गुड़िया सरीखा।

1940 - स्कूल जाने वाली महिलाओं की संख्या विरोध के बावजूद बढ रही थी। में इजाफा शुरू हो गया। पुरुषों में एक ऐसा वर्ग पैदा हो गया था जो चाहते थे कि उनके घरों की महिलाएं भी पढ़ें लिखें। लेकिन इसके बावजूद महिलाओं की स्थिति में आमतौर पर कोई खास तब्दीली नहीं आई थी। उन्हें अपनी जुबान मूक रखनी थी और पुरुषों की हर आज्ञा को मानना था। चाहे जैसा हो लेकिन वही उनके लिए देवता था।

आजादी के बाद - हालात कमोबेश कुछ हद तक बदले। पढ़-लिखकर बड़ी हो रही नारियों की पीढ़ी ने समाज में एक जागरूकता पैदा करनी शुरू की। लड़कियों की पढ़ाई को सामाजिक स्वीकार्यता मिल चुकी थी। बहुत कम संख्या में महिलाएं नौकरी की ओर कदम बढ़ा रही थीं। सभ्रांत परिवारों की महिलाएं राजनीति में प्रवेश कर चुकी थीं।

1960 - लेकिन परिवार का मुखिया अब भी पुरुष था। घर को उसी की मर्जी पर चलना था। महिलाओं की सीमाएं अब भी तय थीं। घूंघट प्रथा भी जारी थी। लेकिन उन्हें लगने लगा था कि वो भी इंसान हैं और परिवार में उनकी भी अहम जगह होनी चाहिए।

1970 - महिलाएं कुछ ज्यादा नौकरियों की ओर कदम बढ़ा रही थीं। लेकिन रूढ़ियां खत्म नहीं हुई थीं। उनका हंसना बोलना अपराध की तरह था। अपने फैसले लेने की छूट तो उन्हें नहीं थी लेकिन वो इसकी हिम्मत जुटाने लगी थीं।

1980 - महिला आंदोलनों का असर बहुत पुख्ता तरीके से अब जाकर पड़ना शुरू हुआ। महिला अधिकारों की बातों को गंभीरता से लिया जाने लगा। महिला संगठनों की बात सुनी जाने लगी। उन्होंने कुछ नये करियर की ओर पैर बढ़ाना शुरू किया। वो आर्थिक आत्मनिर्भरता को गंभीरता से ले रही थीं। पुरुषों का बड़ा वर्ग इस हालात से नाराज भी था और कुंठित भी। घर पर वो रोब तो चलाता था लेकिन पहली बार अब उसे विरोध का भी सामना करना पड़ रहा था।

1990 - दुनिया अपने दरवाजे खोल रही थी। बदल रही थी। ग्लोबलाइजेशन का दौर दस्तक दे रहा था। एक नये तरह का आत्मविश्वास महिलाओं में देखा जाने लगा। वेशभूषा से लेकर बातचीत तक में। उसे खुद पर विश्वास था। रातों रात मानों एक नई क्रांति हो चुकी थी। सकुचाई शर्माई महिलाओं की जगह कांफिडेंट महिलाओं ने ले ली थी। शहरी महिलाएं बदल चुकी थीं लेकिन छोटे शहरों और गांवो में कमोवेश वही हाल है। पुरुष बदल रही था नई स्थितियों से समझौता कर रहा था।

21 सदी की शुरुआत - अलग तरह के पुरुष और स्त्री का उदय हुआ। बराबरी से व्यवहार करने वाले जोड़े बनने लगे। पति ज्यादा संवेदनशील होने लगा था। नौकरीपेशा बीबी के साथ उसके रिश्ते बदल रहे थे। वर्चस्ववादी पुरुष अब पहले की छाया मात्र रह गया था। वो बदल चुका था ..क्या वो वाकई बदल चुका है। मौजूदा विधेयक बेशक बहस-मुबाहिसे के दौर से गुजर रहा हो, लेकिन इसमें शक नहीं कि सामाजिक स्तर पर महिलाओं ने कई आयाम हासिल किए हैं।  

प्रस्तुति : दीपक भारती

आजादी काफी नहीं अधिकार भी मिलें
मुख्य संवाददाता, बरेली
बरेली की मेयर सुप्रिया ऐरन संसद और विधानसभा में महिला आरक्षण बिल की पक्षधर तो हैं लेकिन इससे ज्यादा जरूरत वो पावर की बताती हैं। पति पूर्व मंत्री प्रवीण सिंह ऐरन (अब सांसद) के साथ वरिष्ठ पत्रकार सुप्रिया ऐरन कब जनता में लोकप्रिय हो गयी, इसका पता तब चला जब वो मेयर का चुनाव लड़ने उतरीं और सामने खड़े सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गयी। अगले विधानसभा चुनाव के लिए उनका नाम अभी से चर्चा में हैं। 

सुप्रिया कहती हैं कि जब पुरुष प्रधान समाज में पूरी तरह पावर नहीं मिलेगी तब तक महिलाओं का कुछ भला नहीं हो सकता। आज वूमेंस डे मनाया जाता है मतलब महिलाओं के लिए केवल एक दिन और पुरुषों के 364 दिन। मैं मेयर हूं लेकिन पावर के बिना इफेक्टिव नहीं हूं। संभ्रांत घर की महिलाएं सही सोच के साथ राजनीति में उतरें तो कुछ सार्थक हो सकता है। संसद और विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण से अभी तो कुछ भला होने की उम्मीद नहीं है, शायद अगली संसद में बेहतर स्वरूप निकल कर आए। पिछड़ी और दलित महिलाओं के अलग कोटे पर सुप्रिया कहती हैं कि महिलाएं तो खुद में पिछड़ी जाति हैं उनमें विभाजन न हो तो अच्छा है।

बढ़ना चाहें तो कोई रोक नहीं सकता
आगरा की महापौर अंजुला सिंह माहौर के मुताबिक राजनीति में आने वाली महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और सबसे ज्यादा अशिक्षा का सामना करना पड़ता है। राजनीति में गहन जानकारी होने पर ही युवतियां आगे बढ़ सकती हैं। सामाजिक बंधन उन्हें रोकते हैं। मेरी पार्टी और कार्यकर्ताओं के विश्वास ने हमारी सभी चुनौतियों को आसान कर दिया। परिवार के सदस्यों ने भी मुझे राजनीति में आगे बढ़ाया। मैं मानती हूँ कि यदि कोई महिला हिम्मत के साथ आगे बढ़ने का संकल्प ले तो उसे आगे जाने से कोई नहीं रोक सकता है। युवतियों को उच्च शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। ऐसा कोई भी क्षेत्र जिसमें मान, सम्मान और स्वाभिमान बना रहे। उन्हें वह कैरियर चुनना चाहिए जो उनका अंतर्मन कहे और जिससे समाज तथा देश को कुछ लाभ भी हो सके।   
(प्रस्तुति : मनोज मिश्र)

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