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21 नवंबर, 2019|6:05|IST

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राजनीति से पहले अर्थनीति पर छा चुकी हैं वे

राजनीति से पहले अर्थनीति पर छा चुकी हैं वे

‘स्त्री दुनिया का आखिरी उपनिवेश है।’ 
मर्दो की दुनिया में शोषण और हिंसा की शिकार औरत के बारे में किसी दार्शनिक का उपरोक्त बयान बड़ा प्राचीन है। लेकिन अब वक्त बदल गया है। अब सिर्फ किताबी आंकड़े ही नहीं, आंखों के सामने पसरी हकीकत भी चिल्ला चिल्ला कर बता रही है कि उत्पादन तंत्र में महिलाएं हाशिए पर नहीं रहीं। वे बड़ी तेजी से अर्थचक्र के केंद्र की ओर बढ़ रही हैं।

जरा गौर कीजिए। बोस्टन कंसल्टेंसी ग्रुप की एक ताजा रिपोर्ट बता रही है कि दुनिया भर के उपभोक्ता कुल लगभग 18.4 खरब डॉलर (लगभग 920 खरब रुपये) बाजार खरीदारी पर खर्च करते हैं और इस राशि का 65 प्रतिशत हिस्सा 12 खरब डॉलर यानी लगभग 600 खरब रुपये महिला उपभोक्ताओं के पर्स से निकलता है। यह राशि भारतीय अर्थव्यवस्था के कुल आकार से तकरीबन 10 गुना ज्यादा है! बोस्टन कंसल्टेंसी का ही एक दूसरा आंकड़ा बताता है कि अगले पांच साल में दुनिया भर में महिलाओं की कुल सालाना आय बढ़कर 900 खरब रुपये हो जाएगी और यह राशि भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं के कुल कारोबार के जोड़ से भी ज्यादा बैठेगी!
 
गौरतलब यह भी है कि भारत में आज की तारीख में लगभग 57 करोड़ महिलाएं हैं और उन्होंने भी मार्केटिंग के दिग्गजों को नाकों चने चबवाए हुए हैं। वे लगातार इस जद्दोजहद में जुटे हैं कि कैसे आबादी के इतने बड़े वर्ग के मन को रास आने वाले उत्पाद तैयार किए जाएं। नास्कॉम और मर्सर इंडिया के शोध बताते हैं कि भारत की 57 करोड़ महिलाओं में से 14 करोड़ कामकाजी महिला वर्ग में आती हैं और उनमें से सिर्फ 20 फीसदी शहरों में काम करती हैं। एक उपभोक्ता के रूप में उन्होंने कमाल कर रखा है। देश में 20 हजार करोड़ रुपये सालाना टर्नओवर वाले सौंदर्य प्रसाधन उद्योग में दहाई अंकों की वृद्धि दर के साथ लगातार तेजी दर्ज हो रही है।

नास्कॉम और मर्सर इंडिया का एक शोध यह भी बता रहा है कि भारतीय वर्कफोर्स में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने में आईटी इंडस्ट्री और बिजनेस प्रोसेसिंग आउटसोर्सिग (बीपीओ) ने क्रांतिकारी भूमिका निभाई है। वर्ष 2006 में भारतीय आईटी इंडस्ट्री में 4 लाख 21 हजार महिलाएं थीं। सिर्फ दो साल बाद 2008 में उनकी संख्या बढ़ कर 6 लाख 70 हजार हो गई। यहां तक कि तकनीकी विभागों में भी महिला अनुपात 36 प्रतिशत के सम्मानजनक स्कोर पर है।

यही उम्मीद रिटेल सेक्टर में भी दिख रही है। कुछ ही वर्षो पहले रीटेल सेक्टर का सिर्फ 25 फीसदी कारोबार महिला खरीदारों की जेब से आता था। अब यह अनुपात बढ़ कर 45 प्रतिशत हो गया है। विश्व भर में रिटेल सेक्टर में लगभग 60 प्रतिशत कामगार महिलाएं हैं। भारत में यह आंकड़ा अभी सिर्फ 35 प्रतिशत है। इसका अर्थ? यही कि आने वाले वर्षो में रिटेल सेक्टर में महिलाओं की भागीदारी बड़ी तेजी से बढ़ने वाली है। यहां यह जिक्र करना जरूरी नहीं होना चाहिए कि गांव-देहात में तो कुल महिलाओं में से 90 प्रतिशत खेती-बाड़ी में हाथ बंटाती हैं।

आंकड़ों को छोड़िए, अपने आसपास नजर दौड़ाइए। क्या भारी मशीनों वाले कारखानों को छोड़कर कोई ऐसा कार्यस्थल नजर आता है जहां औरतें मौजूद न हों? स्कूल, कॉलेज, सेल्समैन काउंटर, ईंट गारा ढोने और पत्थर कूटने की जगहें, दफ्तरों और होटलों के रिसेप्शन, पेट्रोल पंप, टैक्सियां, पत्रकारिता, अकाउंटिंग, मार्केटिंग, सैन्य पोस्टिंग - वे कहां नहीं हैं। हां, कुछ सेक्टर हैं जहां अभी काफी काम होना बाकी है। कंपनियों के उच्च पदों पर, बोर्डरूम में, सरकारी नौकरियों में महिलाओं की बराबरीपूर्ण भागीदारी अभी भी एक सपना है। लेकिन सपना साकार होगा, इसमें शक नहीं।

लेकिन कुछ बड़े रोचक और अर्थवान सवाल हैं? जो काम सदियों में नहीं हो पाया था वह आजादी के बाद के 50-60 बरस में कैसे हो गया? मर्दो के शताब्दियों पुराने पूर्वाग्रह ऐसे कैसे विलीन होने लगे? अपनी मानसिकता को उन्होंने ‘औरत की कमाई खानेवाला’ और ‘जनानियों के राज’ जैसे बीमार सामंतवादी जुमलों से क्योंकर आजाद कर लिया?

इसका श्रेय अर्थव्यवस्था को ही देना होगा। गौर से देखें तो पाएंगे कि स्त्री स्वातंत्र्य में साइंस और इकॅनामिक्स का योगदान कमाल का है। जिस तरह प्रेशर कुकर और वाशिंग मशीन ने औरत की आजादी में एक महान और युगांतकारी भूमिका निभाई, उसी तरह औरतों के खिलाफ मोर्चे खोले बैठे समाजशास्त्र को अर्थशास्त्र ने भी ऐतिहासिक शिकस्त दी। नए अर्थतंत्र में शहरीकरण और कृषि जोत का लगातार घटता आकार जैसी समस्याएं पैदा हुईं।

देश ने कोई तिरसठ साल पहले सरहदों का बंटवारा देखा जिसमें लाखों परिवार विस्थापित और तबाह हुए। इन टूटे बिखरे पंजाबी परिवारों में घर के हर आदमी का काम करना जरूरी था। पंजाबी औरतों ने पढ़ने-लिखने में और स्कूल-दफ्तरों की नौकरियों में लीडरशिप की चुनौती को स्वीकारा। उनकी देखादेखी हिंदी बेल्ट की असूर्यम्स्पर्शाएं भी घर की देहरी लांघने लगीं। बेटियां और बीवियां जब मोटा वेतन लाने लगीं तो मर्दवादी सामंती सोच हाथ मलने लगी। साथ ही साथ शिक्षा का प्रसार हुआ। पहले से ज्यादा बेटियों को स्कूल भेजा जाने लगा। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाईं के शब्दों में कहें तो, ‘देखते-देखते अर्थशास्त्र ने समाजशास्त्र को पटखनी दे दी।’

बाजार औरत को सबला बना रहा है या पहले से ज्यादा बारीकी से उसका शोषण करवा रहा है, इस पर बहस की गुंजाइश फिलहाल रहेगी। ठीक उसी तरह जैसे एक विवादित थ्योरी यह भी है कि ग्लोबलाइजेशन दलितों को मजबूत और ब्राह्मणवाद को कमजोर कर रहा है। या फिर उस थ्योरी की तरह, जिसका निष्कर्ष है कि अंग्रेजी सीखकर दलित सदियों पुरानी दासता को धता बता सकते हैं। लेकिन फिलहाल हमें बस यह याद रखना चाहिए कि 33 फीसदी आरक्षण से राजनीति में प्रवेश की राह भले ही अब जाकर खुलने जा रही हो, लेकिन अर्थनीति की दुनिया में तो मातृशक्ति काफी पहले से चमचमा रही है।

इसे यूं भी कह सकते हैं कि:
ऐ भारतीय औरत! राजनीति की जमीन को भी तू उसी तरह फतह कर, जिस तरह तूने अर्थनीति की जमीन पर झंडे गाड़े हैं..।

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