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10 दिसंबर, 2019|4:09|IST

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हे पुरुष, आओ कुछ प्रायश्चित कर लें

भारतीय नारी क्या है। सीता, सावित्री या द्रोपदी। राधा या मीरा। वो शिव की पार्वती है या फिर विष्णु की लक्ष्मी। कई चेहरे लेकिन कहानी लगभग वही। सीता जो पति की खातिर चौदह साल तक बनवास भोगती है। सावित्री जो पति सत्यवान के जीवन के लिये यमराज से लड़ जाती है। द्रोपदी जो पांच महाबली पतियों के बावजूद दुशाशन के चीरहरण की शिकार होती है। राधा और मीरा कृष्ण के प्यार में दीवानी। पार्वती और लक्ष्मी देवियां हैं, लेकिन उनकी पहचान शिव और विष्णु से है।

सीता को पति चुनने का अधिकार दिया गया और द्रोपदी को भी जीतने के लिये अर्जुन को मछली की आंख में तीर भेदना पड़ा। सावित्री भी अपने पिता की इच्छा के विपरीत गरीब सत्यवान का वरण करती है, यह जानते हुए कि यमराज के बहीखाते में उनकी उम्र काफी कम है। तीनों तेजस्वी हैं और स्वतंत्र मस्तिष्क की स्वामिनी, लेकिन कहानी शादी के बाद खत्म प्रतीत होती है। सीता राम के साथ सहर्ष वनवास जाती है। क्योंकि यही एक पत्नी का धर्म है।

हरण के बाद उन्हें अशोक वाटिका में दिन गुजारने पड़े। ये वो वक्त था जब राम भी अकेले थे और सीता भी लेकिन युद्ध के बाद जब सीता और राम का मिलन होता है तो एक धोबी की बात सुनकर राम सीता से अग्नि परीक्षा लेते हैं और सीता इसका बिना विरोध किये परीक्षा दे भी देती है। हालांकि बाद में वह ये अपमान बर्दाश्त नहीं कर पातीं और धरती में समा जाती हैं। पर यह सवाल सीता नहीं उठाती कि जो नियम सीता पर लागू होता है वही राम पर क्यों नहीं? राम भी तो सीता के बगैर रहे, उनके मन में भी तो किसी और स्त्री का स्मरण हो सकता है तो फिर वही अग्नि परीक्षा राम ने क्यों नहीं दी?

सावित्री का पूरा चरित्र ही इस तरह से गढ़ा गया है कि पति के बिना वह कुछ भी नहीं। यमराज से उनकी पूरी लड़ाई भारतीय नारी के लिये एक स्टीरियोटाइप बन गयी और हर स्त्री के पत्नी होने की एकमात्र कसौटी। पत्नी की पवित्रता के लिये यह जरूरी हो गया कि वे सावित्री की तरह पति के प्रति समर्पित और एकनिष्ट रहे और उसके अलावा कही अपने आप को न तलाशे। पति कैसा भी हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, पत्नी को सती-सावित्री ही होना चाहिए। सावित्री भारतीय पुरुष को परमेश्वर बनाने की कहानी है। पुरातन परंपरा को दार्शनिक आधार देने का अजीबोगरीब तर्क।

द्रोपदी बन कर वह अपने आपको थोड़ा स्वतंत्र दिखाने की कोशिश जरुर करती है लेकिन वह कभी इस बात का विरोध नहीं करती है कि कुंती के कहने मात्र से ही वह पांचों पांडवों की पति क्यों होगी? वो उन नियमों की दासी है जो सामंतवादी समाज ने गढ़े। वह पुरुषों के झूठे अहम की बलिबेदी पर चढ़ी है। जब उसका अपमान हो रहा होता है तो इंसान नहीं भगवान ही उसकी रक्षा करते हैं यानी अगर चुनाव पुरुष के अहम और स्त्री के सतीत्व में होगा तो जीत सिर्फ पुरुष के अहम की ही होगी, भले ही उसका चीरहरण हो जाये।

राधा और मीरा को भले ही प्रेम का प्रतीक माना जाये लेकिन वो भी कृष्ण रूपी पुरुष में अपनी पूर्णता को देखती है। वे कृष्ण के प्रेम में पागल है, कृष्ण उनके प्रेम में नहीं। उन्हें एक खास सामाजिक पृष्ठभूमि में आप बागी भी कह सकते है, लेकिन ये बगावत अपना स्वतंत्र अस्तित्व खोजने की कथा नहीं है, यह विलीन हो जाने का फसाना है। पार्वती की चर्चा कभी भी शिव के बिना नहीं होती और लक्ष्मी का भी यही हाल है। दोनों ही देवो के देव शिव और विष्णु की अर्धागनियां हैं। इन तमाम बिंबों में शायद दुर्गा या काली ही अकेली हैं जिनको परिभाषित करने के लिये किसी पुरुष की जरूरत नहीं होती। वह आदि शक्ति हैं। ये हमारी भारतीय पंरपरा में अपवाद है, नियम नहीं।

ये अद्भुत संयोग है या फिर हमारी पंरपरा का दोहरा चरित्र,सीता हो या सावित्री या फिर द्रोपदी या पार्वती सबको पुरुष चुनने का अधिकार तो दिया गया लेकिन चयन की प्रकिया पूरी होते ही सारे अधिकार छीन कर पुरुषों को दे दिये गये यानी स्त्री जाने-अनजाने बराबरी के अधिकार को त्याग देती है। ये शायद उस देश काल की मजबूरी रही हो।

यही परंपरा आजाद हिंदुस्तान में भी बखूबी चली आ रही है। हम घरों में देवियों की पूजा करते हैं, लेकिन उसे बराबरी का दर्जा नहीं देते। दहेज हत्या हो या फिर भ्रूण हत्या, ये इस गैर बराबरी और पुरुषवादी मानसिकता का ही रिफलेक्शन है। अतीत तो हम बदल नहीं सकते और न ही उसकी मान्यताओं और प्रतीकों को लेकिन संविधान के जरिये सदियों से दबाई गयी स्त्री को बराबरी का कुछ दर्जा जरूर दे सकते हैं। ऐसे में अगर महिला आरक्षण बिल आता है तो हमे खुल कर समर्थन करना चाहिए ताकि हम पुरुष अपने किये पापों का कुछ तो प्रायश्चित कर सकें।

लेखक आईबीएन-7 में मैनेजिंग एडीटर हैं

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