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15 नबम्बर, 2019|12:52|IST

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बोरियत मार देगी यार

वह काम करते-करते थक गए थे। थोड़ा सा फ्रेश होना चाहते थे। गलियारे में एक साथी मिले। उन्होंने पूछा, ‘क्या हो रहा है?’ वह बोले, ‘कुछ नहीं यार। बुरी तरह बोर हो रहा हूं।’ फिर हंसते हुए कहा, ‘ये बोरियत मार देगी यार।’
 
ये मजाक नहीं है। सचमुच ये बोरियत हमें मार सकती है। अस्सी के दशक के आखिरी सालों में लंदन के नौकरशाहों से बोरियत पर सवाल किए गए थे। फिर 2009 तक उन पर नजर रखी गई। अब जो लोग अपनी जिंदगी में बोर महसूस कर रहे थे, वे इस जिंदगी से जल्दी चले गए और जिन्हें बोरियत महसूस नहीं होती थी, वे ज्यादा जिंदगी जी पाए। एक बात और बोरियत का अहसास करने वालों को दिल का दौरा ज्यादा पड़ा। बोर लोगों को अपनी जिंदगी की पारी जल्दी खत्म होने का जोखिम तीन गुना ज्यादा था।

हम आमतौर पर बोरियत को गंभीरता से नहीं लेते, लेकिन उसे गंभीरता से लेना चाहिए। अक्सर बच्चे घर में बैठे-बैठै बोरियत का राग अलापते रहते हैं। माता-पिता उसे बड़ी सहजता से लेते हैं। भई, थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा। असल में वहीं से इसे समस्या मान कर निबटा देना चाहिए।

बोरियत आपकी क्रिएटिविटी की सबसे बड़ी दुश्मन है। मनुष्य से ज्यादा रचनाधर्मी कोई नहीं होता। अब जब वह रच नहीं पाता, तो बोर होने लगता है। उस बोरियत में तमाम परिस्थितियां काम करती हैं। अगर हमारी जिंदगी का कोई मकसद है, तो हम कभी-कभी तो बोर हो सकते हैं, लेकिन बोरियत स्थायी भाव नहीं हो सकता। जब हमारी जिंदगी में मकसद होता है, तो हमारी रचने की ताकत बढ़ जाती है और उस मकसद में अगर हम रमने लगते हैं, तो फिर बोरियत के लिए जगह ही कहां रह जाती है? एक मकसद के लिए तो पूरी जिंदगी कम पड़ती है।

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