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13 नबम्बर, 2019|1:39|IST

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मनाइए कि पास हो जाए महिला बिल

हम सब इतिहास जीते हैं। हमारी जिंदगी में हर रोज कुछ न कुछ बनता-बिगड़ता है पर हम में से कितने जानते हैं कि वे इतिहास बना रहे हैं? क्या सोच समझकर हमेशा ऐसे काम किए जा सकते हैं जिसे काल अपने बहीखाते में दर्ज कर ले? पर शायद कल ऐसा हो। महिला दिवस की एक सौवीं वर्षगांठ पर लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पेश होने जा रहा है। इसको लेकर तमाम सियासी अगर-मगर हैं। कुछ दोस्त दग़ाबाज नजर आ रहे हैं तो दुश्मनों के चेहरे पर दोस्ती की गर्मी छा रही है। 

हर बार की तरह वक्त अपनी ठंडी नजर से सब परख रहा है। सभ्यता और संस्कृति के मामले में कभी अगुआ रहने वाला भारत क्या 21वीं सदी में नारी सम्मान के नए मानदंड गढ़ेगा? सियासती मल्लों से ही नहीं बल्कि हर चेतना सम्पन्न भारतीय से जैसे काल यह सवाल  कर रहा है।

हमें भूलना नहीं चाहिए। पिछले 40 साल में ऐसे तमाम मौके आए हैं जब भारतीय मनीषा ने हालात के सही आकलन में चूक की। 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया था तो बहुत से लोगों को अच्छा लगा था। वे मानते थे कि देश की तमाम दिक्कतों का हल सिर्फ राजदंड है। संत विनोबा भावे इसे ‘अनुशासन पर्व’ तक कह गए थे। ये वे विनोबा थे जिन्होंने अपना सारा जीवन सत्य, नैतिकता और सर्वहारा के लिए लगा दिया था। लोग उन्हें गांधी का सच्चा उत्तराधिकारी मानते थे पर आंकलन की एक गलती ने उनकी उज्जवलता को धूमिल कर दिया। इसी तरह 1977 में जब जनता पार्टी हुकूमत में आई थी तो तमाम लोगों को लगा था कि यह अहिंसक राज्य क्रांति है।

कइयों ने लिखा भी था कि फ्रांस या रूस की तरह हमारे यहां खून नहीं बहा। आम आदमी ने बैलेट को बुलेट से बड़ा साबित कर इतिहास रच दिया। पर दो साल भी नहीं बीते। जनता पार्टी की हंडिया चौराहे पर फूटती नजर आई। साथ ही इस देश के आम आदमी के सपनों की भी भ्रूण हत्या हो गई। आगे चलकर वीपी सिंह ने जब तथाकथित सत्य और ईमानदारी के नाम पर राजीव गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस के खिलाफ जंग छेड़ी, तब लगा गांधी और जयप्रकाश के बाद राजनीति के गंदे होते नाले में भी कमल खिल सकते हैं।

वे सत्ता में पहुंचे पर अपने सारे वायदे भूल गए। सरकार को संभालते-संभालते खुद ऐसे गिरे कि फिर कभी उबर नहीं सके। हम कह सकते हैं कि बुढ़ाते नेताओं की सत्तालिप्सा ने दोनों बार भारतीय जनमानस की उम्मीदों के साथ दगा किया। जनादेश चौधरी चरणसिंह या चंद्रशेखर के लिए नहीं था। उसको जोड़तोड़ के जरिये अपने सांचे में ढाला गया। आम आदमी का इसमें क्या कसूर?

पर दुर्भाग्यगाथा यहीं खत्म नहीं होती। संघ परिवार ने जब राम मंदिर के नाम पर भड़काऊ राजनीति शुरू की तो इस देश के बहुसंख्यकों में बहुतों के तेवर बदलने लगे। कहते हैं इतिहास कहानी नहीं बल्कि विज्ञान होता है पर ऐसा लगा जैसे कहानियों का युग शुरू हो गया है। हर रोज तवारीख की एक नई व्याख्या पेश की जाती थी और लोगों के मन में पैठी गंगा-यमुनी संस्कृति कंपकंपाने लगती।

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने यदि राजनीति में सत्य का इस्तेमाल किया था तो संघ परिवार ने धर्म को अपना जरिया बनाया। वे भी सत्ता में पहुंचे पर मंदिर नहीं बना सके। जिन लोगों को उन्होंने सत्ता के लिए बरगलाया था वे खुद भी पछताने लगे। राजनीति ने पहले सच को रुसवा किया, इस बार आस्था की बारी थी।

सहअस्तित्व भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र है। हम उसे छोड़कर जिंदा ही नहीं रह सकते। अनादिकाल से बाहर से आए लोग यहां बसते रहे हैं और सभ्यता के चढ़ाव को नई दिशा देते रहे हैं। राम मंदिर का उफान तो खत्म हो गया पर बहुत से घर उजड़ गये और ऐसी दरार पैदा हो गई जिसका दर्द रह-रहकर हमें सालता है।

काश! हमारे राजनेताओं और बुद्धिजीवियों ने समय रहते उसे भांपने में गलती न की होती? आज फिर हम इतिहास के रोचक मोड़ पर खड़े हैं। कल अगर लोकसभा में महिला बिल पास हो जाता है तो भारत पूरी दुनिया में सिर्फ सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में नहीं बल्कि सबसे ज्यादा जहीन जम्हूरियत के रूप में जाना जाएगा। तब संसद और विधानमण्डलों में 33 प्रतिशत महिलाएं होंगी। आज यदि पूरी दुनिया से तुलना करें तो अमेरिका में महिला सांसदों का प्रतिनिधित्व 21.8 प्रतिशत है। 

यूरोप(स्कैंडेनेवियन देशों को छोड़कर) में 19.1 प्रतिशत महिलाएं संसद में हैं और एशिया में यह संख्या 17.4 प्रतिशत पर जाकर सिमट जाती है। अरब देशों में 9.6 प्रतिशत महिला सांसद हैं जबकि भारत में अभी तक 543 में से कुल 19 से 47 महिलाएं ही संसद की शोभा बढ़ाती रही हैं। इस समय लोकसभा में 45 महिला सदस्य हैं। जाहिर है यह आंकड़ा बहुत उत्साहजनक नहीं है। 

संसदीय प्रणाली वाले 135 देशों में भारत 105वें नम्बर पर आता है। पंचायतों में आरक्षण के बाद से गांवों में एक नई चेतना जागृत हुई है इसे संसद तक फैलना ही चाहिए। अक्सर भारत में महिलाओं के घटते अनुपात, कन्या भ्रूणों की हत्या और महिलाओं के साथ बढ़ते अपराधों की चर्चा होती है। ऐसा नहीं होना चाहिए। यह वही देश है जहां मान्यता थी कि ‘जहां नारी की पूजा होता है, वहीं देवता वास करते हैं।’ उनके साथ राक्षसी व्यवहार अपनी ही परंपरा के साथ खिलवाड़ करना है। हालांकि, मैं गिलास को खाली की बजाय भरा देखना पसंद करुंगा।

अंधियारे के बीच कुछ चमकते द्वीप ऐसे भी हैं जो ढांढ़स बंधाते हैं। पूरी दुनिया में व्यवसायिक रूप से प्रशिक्षित सबसे ज्यादा महिलाएं भारत में रहती हैं। देश की प्रमुख 21 कंपनियों में शीर्षस्थ पदों पर महिलाएं हैं। यह अकेला ऐसा देश है जहां राष्ट्रपति, लोकसभाध्यक्ष और सबसे बड़ी पार्टी की नेता महिलाएं हैं। प्रसंगवश यह बताना उचित रहेगा कि 1925 में जब तमाम पश्चिमी देश संस्कृति के हिसाब से करवटें बदल रहे थे तब सरोजिनी नायडू कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गई थी। यहां अमेरिका के मुकाबले ज्यादा महिलाएं डाक्टर, सर्जन, वैज्ञानिक और प्रोफेसर हैं।

किसी भी मुल्क के मुकाबले भारत में कामकाजी महिलाओं की संख्या ज्यादा है। इसमें सैन्य अफसरों से लेकर अप्रशिक्षित श्रमिक तक शामिल हैं। हालांकि सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक चेतना के स्तर पर भारतीय महिलाओं को पिछड़ा हुआ माना जाता है। हम महिला आरक्षण बिल के जरिए इस अभिशाप से मुक्ति पा सकते हैं और देश की लगभग आधी आबादी को चहुंमुखी विकास में योगदान के लिए आमंत्रित कर सकते हैं। मनाइये कि कल इतिहास उस करवट बैठे जिसे हम हमेशा गर्व से याद कर सकें।

कैफी साहब और उनकी ‘औरत’ याद आ रही है-
कद्र अब तक तेरी तारीख ने जानी ही नहीं
तुझमें शोले भी हैं, बस अश्कफिशानी ही नहीं
तू हकीकत भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
अपनी तारीख का उन्वान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे।

shashi.shekhar@hindustantimes.com

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