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20 नबम्बर, 2019|11:49|IST

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बेकार का शोर, फिल्में बोर

बेकार का शोर, फिल्में बोर

फरवरी में आई फिल्मों का जितना शोर मचा, उतना कारोबार नहीं हुआ। इस दौरान कुछेक अच्छी फिल्में ही देखने में आयीं। फरवरी की शुरुआत काफी सूखी रही। चंदन अरोड़ा ‘स्ट्राइकर’ लेकर आये। कैरम और सांप्रदायिक दंगों के साथ उन्होंने काफी कुछ एक साथ कहने की कोशिश की, लेकिन कोशिश नाकाम रही। पहले हफ्ते में प्रति प्रिंट करीब 43 हजार रु. की शर्मनाक कलैक्शन ही हो पाई। इसी के साथ आई ‘फांस-एक जासूस की कहानी’, जो सिनेमा के नाम पर धब्बा लगाने वाली बेहद घटिया किस्म की फिल्म थी। हॉलीवुड से आई ‘ग्लेडिएटर-2’ को भी हिन्दी बेल्ट के दर्शकों ने नकार दिया।

दूसरे सप्ताह में रिलीज हुई शाहरुख खान-काजोल-करण जौहर की करिश्माई तिकड़ी वाली ‘माई नेम इज खान’ को जबर्दस्त चर्चा और फिल्म समीक्षकों की भरपूर तारीफें मिलीं। बहुत ही ईमानदारी से अपनी बात रखने वाली इस फिल्म को प्रबुद्घ दर्शकों ने सराहा भी, लेकिन जिस आम दर्शक वर्ग के बूते कोई फिल्म सुपरहिट का खिताब पाती है, वह इससे दूर ही रही। फिर भी अपने पहले सप्ताह में इसने प्रति प्रिंट 7 लाख 51 हजार रु. की जो औसत कलैक्शन की, वह बड़ी से बड़ी हिट फिल्म भी नहीं कर पाती। इसके भारी-भरकम बजट को देखते हुए इससे हुई यह कमाई भी मुनाफे का सौदा नहीं कही जा सकती। पहले हफ्ते में मुंबई में 60, दिल्ली में 57, अलीगढ़ में 50, मथुरा में 48, बुलंदशहर में 31, खुर्जा में 26, हलद्वानी में 72, हापुड़ में 27, इलाहाबाद में 50, कानपुर में 48, आगरा में 52, जयपुर में 56 प्रतिशत दर्शक ही बटोर पायी। हॉलीवुड से आई ‘द वुल्फमैन’ और दक्षिण से आई मुमैत खान वाली ‘नागिन का इंतकाम’ को छोटे सैंटर्स पर देखा गया। ‘प्यार का फंडा’ और ‘डोन्ट ब्रेक माई हार्ट-आशिकों को जलाना बुरी बात है’ जैसी फिल्मों के तो नाम भी नहीं सुने गए।

तीसरे सप्ताह तब्बू और शरमन जोशी की ‘तो बात पक्की’ आयी, लेकिन इसकी कमजोर पटकथा इसे ले डूबी। यह फिल्म 15-20 फीसदी कारोबार ही कर पायी। श्रेयास तलपड़े की हॉरर फिल्म ‘क्लिक’ को छोटे शहरों में फिर भी देखा गया, पर बड़े सेंटर्स में यह औंधे मुंह गिरी। आखिरी हफ्ते में फरहान अख्तर और दीपिका पादुकोण वाली साईको ‘कार्तिक कॉलिंग कार्तिक’ को शहरी फ्लेवर के चलते बड़े शहरों में अच्छा रिस्पॉन्स मिला, लेकिन सिंगल स्क्रीन्स और छोटे सैंटर्स में इसे नकारा गया। अमिताभ बच्चन की ‘तीन पत्ती’ को कहीं भी नहीं सराहा गया। आम दर्शक की तो समझ से ऊपर निकली यह फिल्म।  कुल मिलाकर फरवरी में कुछ अलग कहने की कोशिशें तो हुईं, लेकिन टिकट खिड़की पर दर्शकों को जुटाना फिल्म वालों को भारी ही पड़ा।

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