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20 नबम्बर, 2019|11:49|IST

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अज्ञेय की जन्म शताब्दी पर डाक टिकट निकालने की मांग

अज्ञेय की जन्म शताब्दी पर डाक टिकट निकालने की मांग

आधुनिक हिन्दी साहित्य एवं पत्रकारिता को नई दिशा देने वाले यशस्वी लेखक सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' की जन्मशती कल [रविवार] से शुरू हो रही है।

हिन्दी के कई लेखकों ने उनकी स्मृति में डाक टिकट निकालने तथा दूरदर्शन एवं फिल्म डिविजन से उन पर डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने की मांग की है। अज्ञेय जन्मशती के आयोजन के सूत्रधार एवं हिन्दी के प्रसिद्ध कवि तथा संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेई ने बताया कि कल से अज्ञेय की जन्म शताब्दी शुरू हो रही है। इस मौके पर हमने उनकी आवाज में उनकी कविताओं की रिकार्डिंग सुनवाने का एक कार्यक्रम का आयोजन किया है।

अशोक वापेयी ने कहा कि हम साल भर उनकी स्मृति में कोई न कोई कार्यक्रम, प्रकाशन, संगोष्ठी आदि करेंगे। दिल्ली के कुछ लेखकों को मिलाकर हमने अज्ञेय की जन्म शताब्दी मनाने की रूपरेखा तैयार की है। हम सभी यह भी चाहते हैं कि उनकी स्मृति में सरकार उन पर डाक टिक निकाले और डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाए।

अज्ञेय आजादी की लडा़ई में छह वर्ष तक जेलों में रहे। लाहौर में वह क्रान्तिकारियों के साथ बम बनाने के अरोप में पकडे़ गए थे। वह एक स्वतंत्रता सेनानी, उच्च कोटि के लेखक और संपादक थे जिन्होंने तार सप्तक के जरिए कई महत्वपूर्ण कवियों को सामने लाकर अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

वाजपेई ने कहा कि हम देशभर के सभी विश्वविद्यालयों, हिन्दी संस्थानों, अकादमियों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अनुरोध कर रहे हैं कि अज्ञेय की जन्मशती वर्ष में उन पर संगोष्ठियां आयोजित हो और नए सिरे से शोध एवं अनुसंधान हो ताकि नई पीढी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान से परिचित हो सके।

उन्होंने कहा कि हम अज्ञेय की कविताओं, कहानियों तथा उनकी आलोचना और उनके उपन्यासों के अंशों का एक संचयन प्रकाशित करने जा रहे हैं। उनकी कविताओं की एक सीडी भी निकालने की योजना है। भारतीय ज्ञानपीठ उनकी सम्पूर्ण रचनावली प्रकाशित कर रहा है। अज्ञेय को 1978 में 'कितनी नावों में कितनी बार' को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था। अज्ञेय की कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद का एक कलेक्शन भी प्रकाशित करने की योजना है।

सात मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के खुशीनगर में जन्मे अज्ञेय ने मद्रास क्रिश्चियन कालेज से 1927 में इन्टर तथा 1929 में लाहौर के फोरमन क्रिश्चियन कालेज से बीएससी किया था। वह सैनिक, विशाल भारत, दिनमान और नवभारत टाइम्स के संपादक एवं अमेरिका के केलीफोर्निया तथा जर्मनी के हाईडेलबर्ग विश्वविद्यालय में अतिथि प्रोफेसर भी थे। उनका पहला काव्य संग्रह भग्न दूत वर्ष 1933 में तथा 1941 में शेखर एक जीवनी नामक चर्चित उपन्यास प्रकाशित हुआ था।

उधर आधुनिक हिन्दी साहित्य में प्रयोगवादी आंदोलन के जनक अज्ञेय के संपूर्ण लेखन कार्य को ज्ञानपीठ प्रकाशित करने जा रहा है। ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया ने बताया कि अज्ञेय द्वारा लिखे गये संपूर्ण गद्य, पद्य, संपादकीय और कॉलम को एक साथ 13 खंडों में प्रकाशित करने जा रहा है। उन्होंने बताया कि इसमें विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में अज्ञेय के द्वारा लिखा गये संपादकीय और कालम को भी संग्रहीत किया गया है। इसके साथ ही व्यक्ति को अज्ञेय का संपूर्ण लेखन कार्य एक स्थान पर मिल सकेगा।

अज्ञेय ने आधुनिक हिन्दी कविता में प्रयोगवाद आंदोलन को सन 1943 में तार-सप्तक नामक कविता संग्रह के प्रकाशन द्वारा जन्म दिया था। इसकी भूमिका में उनके द्वारा लिखित विचार को हिन्दी आलोचना का प्रमुख स्तंभ माना जाता है। इसके जरिये उन्होंने गजानन माधव मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, रामविलास शर्मा, कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना सहित नये कवियों की खेप का परिचय साहित्य सुधियों से कराया था।

ज्ञानपीठ से जुडे़ कुणाल सिंह ने बताया कि अज्ञेय ने हिंदी में तकनीकी का समर्थक बनाने वाले लेखन तरीके का इस्तेमाल किया। अज्ञेय ने नया प्रतीक पत्रिका में पहली दफा अल्पविराम के स्थान पर पूर्णविराम और चंद्रबिंदु के स्थान पर अनुस्वार का इस्तेमाल किया था। उन्होंने बताया कि हिन्दी साहित्य की पत्रिकाओं में अज्ञेय ने ही पहली दफा अंग्रेजी अंकों का प्रयोग किया था।

सिंह ने बताया कि आज भी हंस जैसी कई पत्रिकाएं है, जो अज्ञेय के हिन्दी लेखन से जुड़े तकनीकी सुधारों का अनुसरण कर रही हैं। उन्होंने बताया कि अज्ञेय के संपूर्ण लेखन को एक जगह एकत्र किए जाने से सबसे अधिक लाभ शोधार्थियों को होगा, जिन्हें किसी एक लेख की खोज में इधर उधर नहीं भटकना पड़ेगा।
 चार अपैल 1987 में संपूर्ण रचनाकर्म को हिन्दी पाठकों को सौंपकर अज्ञेय इस दुनिया से कूच कर गये।

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