कैसे खत्म होगी माओवादी हिंसा - कैसे खत्म होगी माओवादी हिंसा DA Image
19 नबम्बर, 2019|10:11|IST

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कैसे खत्म होगी माओवादी हिंसा

जनवरी 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के तुरंत बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगा दी गई थी। गांधी जी का हत्यारा नाथूराम गोडसे कभी आरएसएस का सदस्य था और फिर हिंदू-मुस्लिम रिश्तों के ध्रुवीकरण में आरएसएस नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी जिसकी वजह से यह दुखद घटना हुई। एक वर्ष से कुछ ज्यादा वक्त तक आरएसएस के प्रमुख माधवराव सदाशिव गोलवलकर जेल में रहे। आखिरकार जुलाई 1949 में इस संगठन पर से पाबंदी हटा ली गई और इसके नेताओं को छोड़ दिया गया जब उन्होंने भारतीय संविधान के प्रति वफादारी का और हिंसा छोड़ने का वादा किया।

यह इतिहास इस संदर्भ में याद किया जा सकता है कि भारत सरकार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के प्रति कैसी नीतियां अपना रही है। इस पार्टी पर फिलहाल पाबंदी है क्योंकि यह सशस्त्र संघर्ष को बढ़ावा देती है और भारतीय संविधान को नहीं मानती। इसकी वजह से मध्य और पूर्वी भारत के जंगलों में भारतीय राज्य और माओवादी विद्रोहियों के बीच तेज संघर्ष चल रहा है। दोनों पक्षों की ओर से भयानक अपराध किए जा रहे हैं, जिनके मुख्य शिकार इनके बीच फंसे आदिवासी और गरीब किसान हैं।

अब 72 दिन के लिए युद्ध विराम के माओवादी प्रस्ताव से एक कमजोर ही सही लेकिन कुछ तात्कालिक शांति की उम्मीद जगी है। माओवादियों की मांग है कि उनकी पार्टी पर से पाबंदी हटाई जाए और उनके गिरफ्तार नेताओं को छोड़ दिया जाए। यह सोचना मुश्किल है कि जब तक पार्टी हथियार नहीं रख देती और भारतीय संविधान को स्वीकार नहीं करती तब तक ये शर्ते कैसे मानी जा सकती हैं। चूंकि यह मुश्किल है इसलिये सरकार एक दूसरी नजीर को देख सकती है जो नगा विद्रोहियों से बातचीत से बनी थी। इसमें संविधान के मुद्दे को स्थगित कर दिया गया था और उनके भूमिगत नेताओं को सरकार से बात करने के लिये सुरक्षित रास्ता देने की बात हुई थी।

अभी तुरंत भारत सरकार नगा मॉडल को दोहरा सकती है और माओवादियों के शांति प्रस्ताव को स्वीकार करके वह उनसे बातचीत कर साकती है, लेकिन अपेक्षाकृत दूरगामी प्रभाव में उसे आरएसएस वाले मॉडल को देखना होगा जहां एक ऐसा संगठन जो कभी भारतीय संविधान को नहीं मानता था, वह उसे मानने पर बाध्य हो गया। माओवादी समस्या से निपटने में सरकार को आज, कल और आने वाले वर्षों की दृष्टि से सोचना होगा क्योंकि पिछले दशकों में माओवाद आदिवासी समुदायों में गहरे असंतोष से पैदा हुआ है।

औपनिवेशिककाल में उनकी उपेक्षा हुई और स्वतंत्रता के बाद उनका दमन हुआ। गांधी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन में दलितों, मुस्लिमों और महिलाओं को मुख्यधारा में लाने के लिये बड़ी मेहनत की गई। ये कोशिशें पूरी तरह असफल भी नहीं हुईं, लेकिन आजादी के आंदोलन से आदिवासियों को बाहर ही रखा गया। 1947 के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक रोजगार के संदर्भ में वे दलितों और मुसलमानों से भी बुरी स्थिति में रहे। विस्थापन से भी उन्हें अपेक्षाकृत ज्यादा नुकसान हुआ।

उपेक्षा और शोषण के इस ऐतिहासिक अनुभव का माओवादियों ने लाभ उठाया, लेकिन उन्हें राज्य सरकारों की ताजा नीतियों से भी बड़ा लाभ हुआ। लगभग दस साल पहले तक उड़ीसा में कहीं माओवादी नहीं थे। लेकिन तब राज्य सरकार ने आदिवासियों की जमीनें थोक के भाव खनन कंपनियों को दे दीं। जब आदिवासियों ने विरोध किया तो उन्हें ‘नक्सलवादी’ कह दिया गया, जो एक भविष्यवाणी सिद्ध हुई, उनके विस्थापन से माओवादियों के लिए जगह बन गई।

पश्चिम बंगाल में नक्सलवाद के विकास में जिला प्रशासन के राजनीतिकरण से मदद मिली। पुलिस अधीक्षक और जिला मजिस्ट्रेट से ग्रामीण विकास या कानून व्यवस्था बनाये रखने की उम्मीद नहीं की जाती बल्कि सत्ताधारी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रभाव को बढ़ाने की उम्मीद की जाती है। और भी बुरा यह है कि बंगाली साम्यवाद की भद्रलोक संस्कृति में आदिवासियों को नीची नजरों से देखा जाता है, पार्टी नेतृत्व में उनका प्रतिनिधित्व कभी नहीं हुआ और हिंदू या मुस्लिम किसानों की तरह वे कभी भी कल्याण योजनाओं के केन्द्र में नहीं रहे। झारखण्ड में स्थानीय विधायक और मंत्री नियमित रूप से माओवादियों को रिश्वत देते रहे इससे उनकी हिम्मत और भी बढ़ गई।

दूसरी राज्य सरकारों की गलतियां और अपराध छत्तीसगढ़ सरकार के र्दुव्यवहार के सामने बहुत छोटे हैं। 2005 में राज्य सरकार ने सलवा जुडूम नामक एक स्वयंभू संगठन को माओवादियों से लड़ने के लिए हथियार दिये। राजनैतिक एकता के एक विचित्र भयानक विध्वंसक उदाहरण की तरह सलवा जुडूम को भाजपा के मुख्यमंत्री रमन सिंह और विपक्षी कांग्रेस के नेता महेन्द्र करमा दोनों का समर्थन मिला।

प्रशासन से खुली छूट पाकर ये लोग लूट, हत्या, आगजनी और बलात्कार के जरिये उन ग्रामीणों पर अत्याचार करने लगे जिन्हें माओवादियों का समर्थक माना जाता था। इस झगड़े के बढ़ने की वजह से अकेले दंतेवाड़ा जिले में लाख से ज्यादा लोग बेघर हो गये हैं। भाजपा के रमन सिंह और कांग्रेस के महेन्द्र करमा दोनों मिलाकर नर्मदा नदी के बांधों से ज्यादा संख्या में लोगों को विस्थापित करने के लिए जिम्मेदार हैं।

इन सारे राज्यों में आदिवासी इसलिये कष्ट में रहे क्योंकि वे कमजोर अल्पसंख्यक हैं। छत्तीसगढ़ और झारखण्ड आदिवासी हितों के नाम पर ही बनाये गये थे लेकिन दोनों ही राज्यों में आदिवासी जनसंख्या लगभग 30 प्रतिशत है। उड़ीसा में यह अनुपात 20 प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा है। गुजरात राजस्थान में 15 प्रतिशत से कम है। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और प. बंगाल में यह 10 प्रतिशत से कम है। हर जगह आदिवासियों की तादाद और उनके वोट गैरआदिवासियों से कम है। इस राजनैतिक कमी को सामाजिक और आर्थिक समस्या ने बढ़ा दिया है। हर कहीं गैरआदिवासियों के पास ज्यादा जमीन है, पैसा है, पद और प्रभाव है। राजनैतिक सत्ता, आर्थिक सत्ता, अदालत और मीडिया सबके प्रभाव बिंदु आदिवासियों की पहुंच से बाहर हैं।

माओवाद का उदय देश के संभवत: पांच सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है (कश्मीर, मणिपुर और दूसरे सीमावर्ती राज्यों में लगातार हिंसा, राजनेताओं और सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार, गरीबों और अमीरों के बीच बढ़ती दूरी और पर्यावरण का तेजी से नाश अन्य समस्याएं हैं)। इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए स्पष्ट चिंतन और कड़ी मेहनत की जरूरत है।

सबसे पहले हिंसा और प्रतिहिंसा का चक्र रुकना चाहिए और सरकार और विद्रोहियों के बीच बातचीत शुरू होनी चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे माओवादियों को बंदूक की संस्कृति से निकालने और कानून के राज व बहुदलीय लोकतंत्र में शामिल करने की कोशिश होनी चाहिए। अंत में सार्वजनिक संस्थानों और बेहतर नीतियों को बनाने की गंभीर कोशिश होनी चाहिए जिससे आखिरकार आदिवासी बराबर के नागरिक बन सकें।

ramguha@vsnl.com

लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं

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