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22 नवंबर, 2019|4:21|IST

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आम नागरिकों के लिए महंगाई तो रोको

दो मसलों पर सरकार को अब कुछ करना होगा। अगर अगले दो महीनों में सरकार ने कुछ नहीं किया, तो उन्हें उसका खामियाजा भुगतना होगा। एक मसला तो खाने पीने की चीजों के बढ़ते दाम हैं। मसलन दाल, चीनी, सब्जी, तेल वगैरह। दूसरा मसला नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में कानून-व्यवस्था लागू करना है। यह इलाका अब नेपाल की सीमा से होता हुआ पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक तक चला गया है।

पहले मसले की जिम्मेदारी अपने कृषि मंत्री शरद पवार पर है। दूसरा मसला गृह मंत्री पी. चिदंबरम को सुलझाना है। अब तक शरद पवार ने जो कुछ किया है, उससे कोई खास भरोसा उन पर जमता नहीं है। उन्होंने चीनी की कमी पर जो बयान दिया, वह तो कमाल ही था। उनका कहना था कि चीनी की कमी डायबटिक के मरीजों के लिए अच्छी है। चीनी मिल मालिकों से उनके रिश्ते रहे हैं। उन्हें तो कोई अहम भूमिका निभानी चाहिए थी। मैं तो यह जानता हूं कि अगर महंगाई कम नहीं होती है, तो आम आदमी और औरत सरकार के खिलाफ हो जाएंगे।

दरअसल, चीजों के दाम मांग और आपूर्ति पर टिके होते हैं। अगर आपूर्ति कम है तो चीजों के दाम बढ़ेंगे ही। जमाखोर इस मामले को और बिगाड़ देते हैं। वे तब तक चीजों को दबा कर रखते हैं, जब तक लोग परेशान न हो जाएं। उससे उन्हें ज्यादा दाम मिल जाते हैं। सरकार ऐसे लोगों को पकड़ती है, लेकिन सब कुछ वैसे ही चलता रहता है। इसका एक ही इलाज है। हमें ज्यादा अनाज पैदा करना चाहिए। अच्छा-खासा अनाज पैदा करना मुमकिन है। कई किसान नए-नए रास्ते अपना कर ऐसा कर भी रहे हैं। कुछ किसानों ने तो अपनी खेतीबाड़ी में शहद बनाने को भी जोड़ लिया है।

कई लोग मछलीपालन और अलग तरह की खाने की चीजें जोड़ रहे हैं। सरकार को ऐसे लोगों की हौसला अफजाई करनी चाहिए। आमतौर पर जिस तरह बिजली मिलती है, उससे अलग जाकर भी वह मिलनी चाहिए। जैसे पनबिजली और सौर ऊर्जा के विकल्पों की ओर भी देखना चाहिए। हमें अपने खाने-पीने की चीजों को आयात करने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। हरित क्रांति से पहले के हालात वापस नहीं आने चाहिए। हमें तो दूसरी हरित क्रांति की जरूरत है।

आदिवासियों को जमीन से बेदखल किया गया, जिसकी वजह से वे हथियार उठाने को मजबूर हुए। उनकी जमीन की बेदखली साल दर साल बढ़ती ही गई है। चिदंबरम को उन बुद्धिजीवियों से दिक्कत है, जो नक्सलियों से सहानुभूति रखते हैं। वे जानते हैं कि आदिवासियों का कितना बुरा हाल है। लेकिन वे जब नक्सलियों की हिंसा को भी ठीक मानते हैं तब दिक्कत होती है। आखिर पुलिस स्टेशन फूंक देने और पुलिस वालों को मारने से क्या हासिल होगा? यह सही वक्त है जब सरकार को उनके नेताओं से बातचीत करनी चाहिए। और उनकी कुछ मांगों को मान लेना चाहिए। फिलहाल चिदंबरम को कांटों में फंसे फूल को प्यार से निकाल लेना है। मुझे उनसे पूरी उम्मीद है।
 
पठान
ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी ने पठान का मतलब बताया है। उनके मुताबिक पख्तूनों का दूसरा नाम ही पठान है। और पख्तून वे लोग हैं, जो पश्तो बोलते हैं। पश्चिमोत्तर पाकिस्तान और दक्षिणोत्तर अफगानिस्तान में रहते हैं। मुङो यह परिभाषा आधी अधूरी लगी। मैं अपने लाहौर दिनों से ही कई पठानों को जानता हूं। वे हमारे इतिहास के अहम हिस्से रहे हैं। वे विजेताओं की तरह आए थे। सूरी और लोदी उनमें खास हैं।

पठान का जिक्र आते ही हमारे पुरखों के जेहन में डर बैठ जाता था। मैं एक खास पठान को जानता था। वह बुलंदशहर जिले के कस्बे बुगरासी से थे। मोहम्मद आबिद सईद खान छह फुट चार इंच के थे। लेकिन वह तो बेहद विनम्र थे। उनके आमों के बाग थे। हर साल बेहतरीन आमों की क्रेट घर भिजवा देते थे। मैंने वैसे आम कभी खाए ही नहीं।

एक बार उनके यहां गया था। वहां मैंने कहा कि जितनी किताबें लिखी हैं उसमें ‘द रिलीजन एंड हिस्ट्री ऑफ द सिख्स’ लिख कर मुझे सबसे ज्यादा सुकून मिला है। कुछ दिन के बाद उन्होंने अपनी किताब की पहली कॉपी मुझे दी। वह किताब थी ‘मेरी बस्तियां मेरे लोग मा इजमाली तारीख अफगानान वा सवाना ए हयात शेरशाह सूरी और खान जहां लोदी।’ पूरे हिंदुस्तान में पठानों के कई कबीले बिखरे हुए हैं। आबिद साहब ने बुगरासी के पास की 12 बस्तियों पर लिखा था। आमफहम उर्दू में अपने विषय पर लिखी शायद यह अकेली किताब है।

 

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