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17 नबम्बर, 2019|8:18|IST

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ये भी किसी पत्रकार से कम नहीं

मैं हिंदुस्तान दैनिक समाचार पत्र को रोजाना पढ़ता हूं। किसी भी अखबार के संपादकीय पृष्ठ की अहम भूमिका रहती है और इस पर छपे पत्र भी अपने आप खास होते हैं। जहां तक बात की जाये इन पत्रों में लिखने वालों ने अपनी एक अलग पहचान बना रखी है और इन्हें पत्रकार से कम समझना गलत होगा। इन पत्रों के जरिये हमे उन इलाकों की खबरें मिल जाती हैं जो किसी न किसी कारण खबर होते हुए भी खबर नहीं बन पाती है। ये पत्र लिखने वाले बिना किसी लालच के खबर या राय देते हैं तो इनकी राय को पढ़ने में सच्चाई भी नजर आती है। चूंकि ये राजधानी है और इसमें विभिन्न राज्यों से आये हुए पत्रों को भी शामिल किया जाता है तो राजधानीवासियों को इन पत्रों के जरिये उन छोटे व गाँवों की खबरें भी मिल जाती हैं।
निहाल सिंह, मंडावली (दिल्ली )

देसी पद्धति पर ध्यान दें
हजारों वर्ष से हमारे यहां आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति चली आ रही है। पिछले कुछ साल से जिस प्रकार से इस पद्धति की उपेक्षा की जा रही है, उससे इसका विकास असंभव होता जा रहा है। सरकारें अन्य पैथी के लिए 95 से 97 प्रतिशत तक का बजट का प्रावधान रखती हैं, पर आयुर्वेदिक व अन्य चिकित्सा पद्धतियों हेतु अधिकतम बजट बनता है तो वह अधिक से अधिक 3 या 4 प्रतिशत होता है। प्राचीन समय से ही भारत के आयुर्वेद में कई असाध्य रोगों जैसे कैंसर, रक्त-दाब इत्यादि का पूर्णत: निदान संभव है। हमें और हमारी सरकारों को भी चाहिए कि वह आयुर्वेद और आयुर्वेदिक औषधियों के अधिक से अधिक प्रयोग को बढ़ावा दे इससे हमारे किसानों को भी अधिक से अधिक औषधीय पौधों की खेती करने के लिए बल मिलेगा और हमारे देश के किसानों को रोजगार तो मिलेगा ही साथ ही हमारे देश का धन एलोपैथी में खर्च होकर विदेशों में न जाकर हमारे ही देश में रहेगा।
मनोज शुक्ला ‘स्वरूप’, शिवनगर, लखनऊ

राष्ट्र गान का करो सम्मान
कोई भी खेल शुरू होने से पहले, उस देश का राष्ट्र गान गाया जाता है, तब सभी को खड़ा होना पड़ता है। परंतु, जब आयोजकों की ओर से ही इन नियमों का पालन नहीं किया जाता हो, तब आप किसको क्या कहेंगे? हॉकी विश्व कप के दौरान ऐसा ही कुछ हुआ इंगलैंड़-द.अफ्रीका मैच के दौरान। मैच के दौरान ज्यादातर लोग खड़े थे तो कुछ लोग जो आयोजन में लगे थे वे बैठे रहे। यदि आयोजकों की ओर से तैनात कार्यकर्ता इस तरीके से पेश आएंगे तो हमें देख कर विदेशी सैलानी क्या सोचेंगे?
बद्री शंकर दास, कटवारिया सराय, नई दिल्ली-16

विलुप्त हो रहे पक्षी
बसंत आकर लौटने वाला है, लेकिन शहरों में रहने वालों में विरले ही होंगे, जिन्होंने कोयल की कूहू-कुहू सुनी होगी। कोयल ही नहीं, चिड़ियों की चहचहाट और कौवों की कांव-कांव सुनना भी अब बहुत कम हो गया है। गौरैया के तो अब दर्शन भी दुलर्भ हो गए हैं। शहरों में हरियाली घटती जा रही है। घनी आबादी और शोर-शराबे से माहौल और और भी बिगड़ रहा है। वैसे जब हम पेड़ पौधों के बीच, पक्षियों के कलरव के बीच पहुंचते हैं तो एक तो शहर के शोर-शराबे से दूर हो जाते हैं और दूसरा खुद को प्रकृति के करीब भी महसूस करते हैं। उस वातावरण में जो शांति और सुकून का अहसास होता है, वह अपने आप में अनोखा होता है। कुछ शहरों में भले ही कंकरीट के जंगलों के साथ हरियाली को कायम करने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन इस हरियाली के लिए लाखों रुपए खर्च कर विदेशों से जो पेड़-पौधे यहां लाए जा रहे हैं, उन पर पक्षी अपना घोंसला बनाना तो दूर बैठना भी पसंद नहीं करते।
अरविंद शर्मा, मंडी (हिमाचल)

सचिन को भारत रत्न
विश्व में भारत का नाम रोशन करने वाले हमारे भारतीय क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट में उनकी सेवा और रिकॉर्ड के लिए भारत रत्न से सम्मानित करना चाहिए। सचिन ने पूरे क्रिकेट विश्व भारत को एक नई पहचान दिलाई है, इसलिए वे भारत रत्न के लायक है। सचिन तेंदुलकर की साफ सुथरी प्रतिमा और उनका सौम्य स्वभाव भी उनको इस अवार्ड के लायक बनाते हैं। हमारे देश का यह सर्वश्रेष्ठ सम्मान है और यह किसी भी क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने वाले और सेवा करने वाले इन्सान को दिया जाता है। 
तारूलत्ता वाघेला

पुस्तक समीक्षा
आपकी रिपोर्ट में उल्लेख है कि नजीर बनारसी साहब की मृत्यु सांप्रदायिक दंगों में हुई थी जो कि सर्वथा गलत है। नजीर साहब की गिनती बनारस में एक अमनपसंद और गंगा-जमुनी तहजीब के शायर के रूप में होती हे। दंगे के दौरान मृत्यु उनके पुत्र डॉ. मोहसिन की हुई थी और नजीर साहब ने कभी भी इस विवादास्पद दुख का इजहार नहीं होने दिया और वह भी सिर्फ संप्रदायीकरण के भय से ही। यही एक बिंदु होता है जहां से जिन्ना पाक के संस्थापक हो जाते हैं, लेकिन नजीर साहब कहीं आगे बढ़कर बनारसी बन जाते हैं।
धनंजय त्रिपाठी

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