कांगड़ा का श्रीज्वालामुखी मंदिर, यहां ज्योति ही शक्तिपीठ - कांगड़ा का श्रीज्वालामुखी मंदिर, यहां ज्योति ही शक्तिपीठ DA Image
19 नबम्बर, 2019|11:15|IST

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कांगड़ा का श्रीज्वालामुखी मंदिर, यहां ज्योति ही शक्तिपीठ

श्रीज्वालामुखी मंदिर की मान्यता 51 शक्तिपीठों में सर्वोपरि है। महामंदिर में मां भगवती के दर्शन ज्योति के रूप में होते हैं। पर्वत की चट्टान से, 9 अलग-अलग जगहों पर अखंड ज्योति बिना ईंधन के स्वत: प्रज्जवलित हैं। ज्योतियों का निरंतर जगमग जलना सदियों से जारी है। इसीलिए देवी को ज्वालाजी के नाम से जाना जाता है।

ज्वालामुखी पहुंचना आसान है। बसें सीधे ज्वालामुखी बस अड्डा पहुंचाती हैं। रेल से पठानकोट तक जा सकते हैं। आगे छोटी लाइन की रेलगाड़ी जोगिंदर नगर बरास्ता ज्वालामुखी आती है। मंदिर से ज्वालामुखी रेलवे स्टेशन की दूरी 22 किलोमीटर है। कांगड़ा से ज्वालामुखी तक सड़क मार्ग तय करने में करीब 2 घंटे लगते हैं।

सिंह द्वार से प्रवेश करते ही सामने प्रमुख मंदिर है। सूर्य की किरणों में मंदिर के स्वर्ण पत्र गुम्बद जगमगा उठते हैं। माना जाता है कि शेर-ए-पंजाब महाराजा रंजीत सिंह ने मंदिर के कलश और गुम्बद पर स्वर्ण-पत्र चढ़ाया था। मंदिर में चांदी के दरवाजे सिख राजा खड़क सिंह ने भेंट किए थे।

आसपास सेज-भवन, वीर कुंड, लंगर भवन और एक कक्ष में अकबर का छत्र रखा है। बाईं तरफ 10-12 फुट ऊंची-ऊंची सीढ़ियां चढ़ कर गोरख डिब्बी है। गोरख डिब्बी में एक छोटे-से कुंड में जल हमेशा खौलता प्रतीत होता है। लेकिन असल में जल ठंडा है। बगल में एक कुंड के ऊपर धूप की जलती बत्ती स्पर्श करने से, जल पर ज्योति प्रकट होती है। यह रूद्र कुंड है। यहीं भगवान शिव के परमभक्त नाथ सम्प्रदाय के गुरु गोरखनाथ ने तपस्या की थी।

श्रीज्वालामुखी मंदिर के निर्माण की अपनी अलग कहानी है। सतयुग के सम्राट भूमिचंद्र को विश्वास था कि भगवती सती की जीभ भगवान विष्णु के धनुष से कट कर हिमालय के धौलीधार पर्वत पर कहीं गिरी है। भरसक प्रयासों के बावजूद वह स्थल खोजने में कामयाब नहीं हुए। आखिरकार सम्राट ने नगरकोट कांगड़ा में ही एक देवी मंदिर स्थापित किया। कुछ अर्से के बाद, एक ग्वाले ने सम्राट भूमिचंद्र को खबर दी कि अमुक पर्वत पर, मां की ज्योत की भांति ज्वाला निकल रही है। सम्राट भूमिचंद्र ने भी पवित्र ज्योत के दर्शन किए और घने जंगल में मंदिर का निर्माण करवाया।

पूजा-अर्चना का संपूर्ण कार्य शाक द्वीप से बुलाए भोजन ब्राह्मण जाति के दो पंडित श्रीधर और कमलपति को सौंपा गया। भोजन ब्राह्मण के वंशज आज भी ज्वालाजी की पूजा-अर्चना में लीन हैं। महाभारत के एक प्रसंग के अनुसार अज्ञातवास के दौरान युधिष्ठिर, भीम, अजरुन, नकुल और सहदेव पांच पांडवों ने ज्वालामुखी की यात्रा और महामंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। इस संबंध में कांगड़ा का प्रचलित लोकगीत है-‘‘पंजा पंजा पांडवां तेरा भवन बनाया, अजरुन ने चंवर झुलाया..’’

भक्त सीथे ज्योतियों के भवन में जाते हैं। मां के भवन में, नौ ज्योतियों की जगमग है। यहां देवी की कोई प्रतिमा नहीं है, केवल यहीं स्वयंभू जागृत ज्वालाएं हैं। दीवार पर सफेद पत्थर लगा है। बीच-बीच में चट्टान को संगमरमर से नहीं ढका गया। इन्हीं चट्टानों से ज्योतियां जल रही हैं। सामने चांदी के पत्तरे में सुसज्जित आले में, मुख्य ज्योति सुशोभित है। यही ज्योति महाकाली का प्रतिरूप है, जो मुक्ति और भक्ति प्रदाता है। इसके जरा नीचे भंडार भरने वाली महामाया अन्नपूर्णा की ज्योत है। 

एक तरफ शत्रुओं की विनाशक चंडी मां की ज्योति है। साथ ही समस्त व्याधियों का नाश करने वाली ज्योति हिंगलाज भवानी की है। पांचवीं ज्योति विंध्यवासिनी की है। भवन के बीचों-बीच एक कुंड है, जो करीब तीन फुट गहरा है। इसी के बीच ज्वाला प्रकट होती है। हवन-कुंड में धन-धान्य बरसाने वाली महालक्ष्मी की ज्योति है। कुंड में ही विद्यादात्री सरस्वती की ज्योति है। संतान सुख देने वाली अम्बिका के भी दर्शन कुंड में ही होते हैं।

यहीं ओज, आयु और सुख की प्रतीक अंजना मां भी हैं। ज्वालाजी में हलुवा और नारियल चढ़ाने की परंपरा है। भक्त ज्योतियों को माथा टेकते हैं और पुजारी ज्योति से स्पर्श करते हुए प्रसाद चढ़ाते हैं।

ज्योतियों का निरंतर जलते रहना माई का चमत्कार
ज्वालाजी की ज्योतियों के जलने का वैज्ञानिक आधार क्या है? अंग्रेजी हुकूमत के दौरान गोरे वैज्ञानिकों ने ज्वालामुखी पर्वत के इर्द-गिर्द खोज-परख की ताकि प्राकृतिक गैस का भंडार हाथ लग जाए। लेकिन आस्था और विश्वास के आगे माथा टेक दिया। गोरे वैज्ञानिकों ने भी माना कि ज्योतों का निरंतर जलते रहना माई का चमत्कार है। और तो और, सिख राजा खड़क सिंह द्वारा भेंट चांदी के दरवाजे की शोभा भारत के वायसराय लॉर्ड हेस्टिंग्ज को इस कदर भाई कि उन्होंने हू-ब-हू वैसा ही दूसरा दरवाजा बनवा दिया। भक्तों को विश्वास है कि ज्वालाजी के पवित्र दर्शन से मुंह-मांगी मुरादें पूरी होती हैं।

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