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11 दिसंबर, 2019|6:14|IST

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बजट में उलझी दक्षिण की राजनीति

संसद में पेश हुए सालाना बजट का असर हर किसी की जिंदगी पर पड़ेगा ही। इसलिए जाहिर ही है कि सभी राजनैतिक दल बजट प्रस्तावों की गहन समीक्षा करेंगे और सरकार पर उन प्रस्तावों को वापस लेने के लिए दबाव डालेंगे जो उनकी नजर में ‘जनविरोधी’ हैं।

दूसरी तरफ सत्ताधारी पार्टी बजट प्रस्तावों की तारीफों के पुल बांधने की हर मुमकिन कोशिश भी करेगी ही। वह यही कहेगी कि देश की आर्थिक स्थिति को देखते हुए आम आदमी की भावनाओं का जितना ज्यादा खयाल रखा जा सकता था बजट में वह रख दिया गया। इसके पीछे पक्ष विपक्ष दोनों की नीयत एक ही होगी- अपने राजनैतिक आधार को मजबूत बनाना। महंगाई सभी राजनैतिक दलों के लिए एक भावनात्मक मुद्दा होती है और इसका इस्तेमाल सरकार की खिंचाई करने के लिए किया जाता है।

गठबंधन सरकारों के दौर में इस नजारे में खासा बदलाव आ गया है। अब सरकार के कईं सहयोगी दल भी बजट पर महंगाई बढ़ाने का आरोप लगा देते हैं। इस बार कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दो घटक द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस पेट्रोलियम और डीज़ल में की गई मूल्यवृद्धि के विरोध में न सिर्फ सबसे आगे हैं, बल्कि वे तो इसे वापस लेने तक की मांग कर रहे हैं। ये दोनों ही पार्टियां ऐसी हैं जिन्हें अगले 12 महीनों में विधानसभा चुनाव का सामना करना है।

द्रमुक अध्यक्ष और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने तो इस मामले में कलाबाजी ही दिखा दी। पहले दिन तो उन्होंने बजट की तारीफ की क्योंकि इसमें सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास सुनिश्चित किया गया था। उन्होंने कहा, ‘मैं शिक्षा, जनकल्याण और इन्फ्रास्ट्रक्चर को प्राथमिकता देने के लिए प्रधानमंत्री की तारीफ करता हूं।’

लेकिन अगले ही दिन उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी और वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी को चिट्ठी लिखकर पेट्रोलियम पदार्थो के दाम बढ़ाने पर नाराजगी प्रकट की। उनके नजरिये में बदलाव पार्टी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री टी आर बालू की सलाह के बाद आया। द्रमुक पहले ही ईंधन की कीमतें बढ़ाने का विरोध करती रही है, पिछले साल तो बालू ने सदन में ही इसका विरोध किया था।

केरल की एलडीएफ सरकार माकपा की पार्टी लाइन पर ही चलती रही। पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार को अगले साल मई में चुनाव में उतरना है और उसे लग रहा है कि ईंधन की कीमत में बढ़ोतरी के कारण ममता बनर्जी यूपीए की आलोचना कर रही हैं तो इसका फायदा उसे ही मिलेगा। यह अलग बात है कि वह इसका विरोध करते समय केंद्र के स्तर पर भाजपा के साथ और राज्य के स्तर पर तृणमूल के साथ खड़ी हो गई।

केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चे ने बजट में यह खामी देखी कि वह महंगाई को रोक पाने में नाकाम है, इसके अलावा उसने आम आदमी पर भार को बढ़ा भी दिया है। राज्य के वित्तमंत्री टी एम थॉमस आईज़क का कहना है कि बजट केरल के लिए खासतौर पर निराश करने वाला है। इसमें केंद्र से राज्य को मिलने वाली मदद काफी कम है जिससे वित्तीय घाटा कम करना संभव नहीं होगा।

कुछ मामलों में कर्नाटक सरकार की प्रतिक्रिया भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय लाइन से अलग थी। पार्टी के मतभेद उस समय दिखे जब ममता बनर्जी ने रेल बजट पेश किया। कर्नाटक के वरिष्ठ भाजपा नेता अनंत कुमार ने बजट को भ्रमजाल बताया जबकि मुख्यमंत्री बी एस येदुरप्पा ने राज्य को कईं परियोजनाएं देने के लिए रेलमंत्री को धन्यवाद दिया। लेकिन जब प्रणव मुखर्जी ने बजट पेश किया तो मुख्यमंत्री थोड़ा सावधान रहे और उन्होंने पार्टी की सोच के हिसाब से प्रतिक्रिया दी।

तेलंगाना के मसले पर आंध्र प्रदेश में इतनी उठापटक चल रही है कि वहां दलों की विभाजन रेखाएं इन दिनों धूमिल पड़ गई हैं। इस बार के बजट विरोध तो कईं कांग्रेस नेताओं ने ही किया। राज्य के विपक्षी तो खैर विरोध कर ही रहे थे। बजट को वहां तेलंगाना मसले के नजरिये से ही देखा गया। कईं कांग्रेस नेताओं का कहना था कि ईंधन की कीमतें बढ़ाने का यह सही समय नहीं था।

हालांकि इन तमाम तरह की आलोचनाओं से वित्तमंत्री डिगे नहीं हैं। कांग्रेस के एक मंजे हुए नेता को पूरा विश्वास है कि यूपीए में घटकों की नाराजगी दूर करने की जो व्यवस्था है उसके चलते ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी पर हो रहे हल्ले हंगामें को भी शांत कर दिया जाएगा। पेट्रोल और डीजल की बढ़ी कीमत वापस लेने के मांग पर उनका कहना है कि गठबंधन सरकार में किसी भी मसले पर इस तरह के परस्पर विरोधी विचारों का आना स्वाभाविक है। लेकिन सरकार जिस तरह अडिग दिख रही है उससे लगता है कि इस मामले में अब और सौदेबाजी नहीं हो सकेगी।

radha.viswanath@gmail.com

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

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