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12 दिसंबर, 2019|8:01|IST

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भाषा में यकीन के कवि

वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा
मुक्ति का जब कोई रास्ता नहीं मिला
मैं लिखने बैठ गया हूँ
मैं लिखना चाहता हूँ ‘पेड़’
यह जानते हुए कि लिखना पेड़ हो जाना है
मैं लिखना चाहता हूँ ‘पानी’
‘आदमी’ मैं लिखना चाहता हूँ
एक बच्चे का हाथ
एक स्त्री का चेहरा
मैं पूरी ताकत के साथ
शब्दों को फेंकना चाहता हूँ आदमी की तरफ
यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा
मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूँ वह धमाका
जो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता है
यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा
मैं लिखना चाहता हूँ।

क्या मुक्ति शीर्षक की इस कविता का कवि सचमुच यह जानता है कि लिखने से कुछ नहीं होगा? फिर भी वह लिखना चाहता है तो क्यों? आखिर कोई कविता क्यों लिखता है? कविता बिना शक भाषा में की जाने वाली एक कार्रवाई है, लेकिन इस कार्रवाई से होता जाता क्या है? शब्दों का एक खेल? एक मनोरंजन या और भी कुछ?

आजकल भाषाविज्ञान का बड़ा जलवा है। हमें बताया गया है कि भाषा सच्चाई को जानने और बताने का एक माध्यम मात्र नहीं है। वह तो दरअसल सच्चाई को बनाने का और जरूरत पड़ने पर बिगाड़ने का जरिया है। सच्चाई का खुद कोई वजूद नहीं है। वह तो भाषा की एक निर्मिती है। इसलिए मनुष्य भी भाषा की ही एक निर्मिती है। भाषा के बाहर मनुष्य का न कोई अर्थ है, न अस्तित्व। यूं मनुष्य अपनी ही रची हुई भाषा के सामने इस कदर असहाय है, जैसे वह स्वयं द्वारा कल्पित ईश्वर के सामने होता है।

केदार नाथ सिंह की कविता की ढेर सारी खूबियों की चर्चा की जाती है। इस बात पर कम ध्यान दिया गया है कि भाषा और मनुष्य के गहरे और जटिल रिश्ते की पड़ताल उनके कवि कर्म की बुनियादी प्रेरणाओं में से एक है। उनकी कविता उस भाषाई नियतिवाद को चुनौती देती है, जो मानता है कि मनुष्य भाषा का एक खिलौना मात्र है। दूसरी तरफ वह उस नजरिए को भी नामंजूर करती है, जो भाषा को मनुष्य के खिलवाड़ का इलाका घोषित करती है।

ऊपर दी गयी कविता केदारजी की रचना प्रक्रिया का भेद खोलने वाली कविता है। कविता शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होने वाला धमाका है, एक ऐसा बेआवाज धमाका, जिससे कोई क्रान्ति भले ही न हो, लेकिन वह मनुष्य और भाषा दोनों को कहीं कुछ तोड़ता और तब्दील करता है।  केदार नाथ की शक्ति यह है कि वे भाषा के एक दूसरे से उलट दोनों आयामों को समझते हैं। वह मनुष्य की आत्मा की कोख है, तो उसकी जबान कैद कर लेने वाली जंजीर भी।

मातृभाषा के बारे में उनकी मशहूर कविता यों है-
जैसे चींटियाँ लौटती हैं
बिलों में
कठफोड़वा लौटता है
काठ के पास
वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक
लाल आसमान में डैने पसारे हुए
हवाई-अड्डे की ओर
ओ मेरी भाषा
मैं लौटता हूँ तुम में
जब चुप रहते-रहते
अकड़ जाती है मेरी जीभ
दुखने लगती है
मेरी आत्मा

लेकिन कवि यह देख कर हैरान है की जो भाषा के सब से बड़े जानकार हैं, वे ठीक उस वक्त खामोश रह जाते हैं, जब बोलना निहायत जरूरी होता है -
बिजली चमकी , पानी गिरने का डर है
वे क्यों भागे जाते हैं जिन के घर हैं
वे क्यों चुप है जिनको आती है भाषा
वह क्या है जो दिखता है हरा हरा -सा 

जैसे घर एक शरणस्थली है और एक बंदीगृह भी, वैसे ही भाषा भी है। केदारजी वस्तुओं की स्वायत्तता का सम्मान करने वाले कवि हैं। दरअसल वे उस जमाने के कवि हैं, जिसमें कवियों को यह मुगालता नहीं रह गया है कि वे वस्तुओं को अपने मन माफिक उलट पलट सकते हैं, बदल सकते हैं। संसार जहां है, वहाँ है, मनुष्य उस का नियंता नहीं है, जैसे कि आधुनिक वैज्ञानिक मनुष्य को कभी लगता था।

लेकिन मनुष्य अपने रचे इतिहास के हाथों अपने कर्तापन को पूरी तरह गंवा चुका हो, ऐसा भी नहीं है। जैसे दुनिया के साथ है, वैसे ही भाषा के साथ भी है। भाषा अपनी स्वायत्तता में कितनी कठोर और तटस्थ हो, मनुष्य के साथ अपनी अंतरंगता में वह कविता में तब्दील होने के लिए बाध्य होती है। केदार जी निरपेक्ष संसार के साथ ऐसी ही मानवीय अंतरंगता को रेखांकित करते हुए अपनी कविता उपलब्ध करते है।

यह कोई कोमल मधुर संगीतमय संसार नहीं है, जैसा कि कुछ लोग समझाते हैं, वहाँ जीवन की सारी जटिलताएं हैं। प्रेमकविता की पंक्तियों के बीच हत्याओं के सुराग मिलते हैं। बनारस के सारे मिथकीय रहस्य को भिखारियों के कटोरों का निचाट खालीपन तोड़ता है। उनकी कविता में सारस का दिखना किसी स्वर्गीय सरोवर के आसपास होने का संकेत न हो कर उस अकाल का संकेत है, जिसका साया समकालीन मनुष्य की नियति पर पड़ा दीखता है। लेकिन केदारजी सभ्यता के इस संकट को एक ठेठ हिंदी कवि की तरह कहते हैं-

मेरी भाषा के लोग
मेरी सड़क के लोग हैं
सड़क के लोग सारी दुनिया के लोग
पिछली रात मैंने एक सपना देखा
कि दुनिया के सारे लोग
एक बस में बैठे हैं
और हिंदी बोल रहे हैं
फिर वह पीली-सी बस
हवा में गायब हो गई
और मेरे पास बच गई सिर्फ मेरी हिंदी
जो अंतिम सिक्के की तरह
हमेशा बच जाती है मेरे पास
हर मुश्किल में।

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं

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