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मानसिक चिकित्सा तंत्र के मनोविकार

‘नंग-धड़ंग, सिर पर कचरे का बोझ, जहां कहीं जगह मिली सो गए, कुछ भी खा लिया, किसी ने छेड़ा तो पत्थर चला दिया।’ भारत के हर शहर-कस्बे में ऐसे महिला या पुरुष चरित्रों की मौजूदगी लगभग जरूरी है। आम लोगों की निगाह में ये भूत-प्रेत के प्रकोपधारी, मजनूं, बदमाश या फिर देशी-विदेशी जासूस होते हैं। यह विडंबना है कि वे जो हैं, उसे न तो उनके अपने स्वीकारते हैं और न ही पराए। शरीर के अन्य विकारों की तरह मस्तिष्क अव्यवस्थित होन के कारण बीमार, मानसिक रोगी! इसी तरह महानगर की सड॥कों पर आए रोज छोटी-छोटी बात पर खून-खराबा, गलत निर्णय, ये सब भी मानसिक असंतुलन का ही नतीजा होता है। मानसिक स्वास्थ्य, एक स्वस्थ शरीर का जरूरी हिस्सा है। यह हमारे देश की कागजी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में भी दर्ज है। वैसे 1में मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू हुआ था। एक दस्तावेज के मुताबिक, करीब तेरह करोड़ भारतीयों को किसी न किसी रूप में मानसिक चिकित्सा की जरूरत है। प्रत्येक हजार जनसंख्या में 10 से 20 लोग जटिल मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं, जबकि दुखदाई और आर्थिक अक्षमता पैदा करने वाले भावुक रोगों के शिकार लोगों की संख्या इसका तीन से पांच गुना है। इतने लोगों के इलाज के लिए कोई 32 हजार मनोचिकित्सकों की जरूरत है, जबकि देशभर में इनकी संख्या बामुश्किल साढ़े तीन हजार है और इनमें भी तीन हजार तो चार महानगरों तक ही सिमटे हैं। सन् 17में पाइनल नामक व्यक्ित ने पेरिस में मानसिक रोगियों का मानवीय संवेदनाओं के साथ इलाज करना शुरू किया था। इससे पहले ऐसे रोगियों को जंजीरों से जकड़ कर रखा जाता था। देखा गया कि ऐसे मरीज उत्तेजित होकर तोड़-फोड़ करते थे। पाइनल का प्रयोग सफल रहा। इसी सामाजिक सुधार से प्रेरित होकर अमेरिका में बेंजामिन रश और ब्रिटेन में कोनोली व ट्यूक ने मनोरोगियों की ‘सामाजिक मनोविकार चिकित्सा’ शुरू की। भारत में पागलपन कानून 1में बनाया गया था, जिसमें अदालती प्रमाण-पत्र के जरिए रोगियों को केवल पागलखानों में इलाज की सीमा तय की गई थी, लकिन 1में इस कानून में बदलाव किया गया और मरीज को खुद की इच्छा पर भर्ती होने, सामान्य अस्पतालों में भी इलाज कराने जैसी सुविधाएं दी गई हैं। दिनोंदिन बढ़ रही भौतिक लिप्सा और उससे उपजे तनावों व भागमभाग की जिंदगी के चलते भारत में मानसिक रोगियों की संख्या पश्चिमी देशों से भी ऊपर जा रही है। विशेष रूप से महानगरों में ऐसे रोग कुछ अधिक ही गहराई से पैठ कर चुके हैं। दहशत और भय के इस रूप को फोबिया कहा जाता है। इसकी शुरुआत होती है चिड़चिड़ेपन से। बात-बात पर बिगड़ना और फिर जल्द से लाल-पीला हो जाना ऐसे ‘रोगियों’ की आदत बन जाती है। काम से जी चुराना, बहस करना और खुद को सच्चा साबित करना इनके प्रारंभिक लक्षण हैं। जहां एक ओर मर्ज बढ़ता जा रहा है, वहीं हमारे देश के मानसिक रोग अस्पताल सौ साल पुराने पागलखाने के खौफनाक रूप से ही जाने जाते हैं। ये जर्जर, डरावनी और संदिग्ध इमारतें मानसिक रोगियों की यंत्रणाओं, उनके प्रति समाज के उपेक्षित रवैये और सरकारी उदासीनता की मूक गवाह हैं। मानसिक विक्षिप्त लोगों को समाज से दूर ऊंची चाहरदीवारियों में नारकीय जीवन जीन को मजबूर करना क्या मौलिक अधिकारों का हनन नहीं है? छोटे-छोटे दड़बेनुमा जेल की कोठरियां। वहां जानवरों से भी बदतर भरे मरीज, कहीं पेड़ या खंभों से बंधे महिला-पुरुष, उनकी देखभाल के लिए सरकार से मोटा वेतन पा रहे लोगों के अमानवीय अत्याचार। अधिकांश रोगियों के लिए तो यह ताजिंदगी सजा है। अदालत से सजायाफ्ता आजीवन कैदी ता कुछ साल बाद छूट भी जाता है, लकिन पागलखानों से मुक्ित कतई संभव नहीं है। अलबत्ता तो वहां का माहौल उन्हें ठीक होने नहीं देता है, यदि कोई ठीक हो जाए, समाज उन्हें स्वीकार नहीं करता। इन अस्पतालों में ऐसे रोगियों की संख्या सैकड़ों में है, जो पिछले 35-40 साल स कैद हैं। कहीं जमीन-जायदाद पर कब्जा करन के लिए अपने ही रिश्तेदारों को पागल ठहरान की साजिश है ता कहीं सामाजिक रुतबे में ‘पागलखाना रिटर्न’ का धब्बा लगन की हिचक। देश के मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम,1में रोगियों के पुनर्वास, इसके कारणों पर नियंत्रण, दूरस्थ अंचलों के डॉक्टरों को विशेष ट्रेनिंग सहित न जाने क्या-क्या लुभावन कार्यक्रम दर्ज हैं, लकिन वास्तविकता के धरातल पर मानसिक रोगी सरकार व समाज दोनों की हेय दृष्टि से आहत हैं। हमारे देश की एक अरब होती आबादी के लिए केवल 42 मानसिक रोग अस्पताल हैं, जहां 20,000 बिस्तर हैं। यह जरूरत का एक फीसदी भी नहीं है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की एक रिपोर्ट भी इस बात का प्रमाण है कि ऐसे रोगियों की बड़ी संख्या इलाज का खर्च उठाने में असमर्थ है। सरकारी अस्पतालों के नारकीय माहौल में जाना उनकी मजबूरी होता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग मानता रहा है कि देश भर के पागलखानों की हालत बदतर है। इसे सुधारन के लिए कुछ साल पहले बंगलौर के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और चेतना विज्ञान संस्थान (निमहान्स) में एक परियोजना शुरू की गई थी, लकिन उसके किसी सकारात्मक परिणाम की जानकारी नहीं है। यह परियोजना भी नाकाफी संसाधनों का रोना रोते हुए फाइलों में ठंडी हो गई। वैसे तो 1में सुप्रीम कोर्ट भी मानसिक अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवान के निर्देश दे चुका है। आदेश के बाद दो-चार दिन तो सरकार सक्रिय दिखी, पर स्थितियों में लेशमात्र सुधार नहीं हुआ। बानगी के तौर पर देश के सबसे पुराने आगरा के पागलखान के हालात को देखें। 40 एकड़ में फैली इस ‘जेल’ के रखरखाव का सालाना बजट मात्र ढाई लाख है। यहां स्टाफ तो 500 का है, लकिन डॉक्टर व नर्स मिला कर 30 भी नहीं हैं। अधिकांश डॉक्टरों के वहीं पास में निजी क्लीनिक हैं। वैसे यहां 400 से अधिक मरीज नहीं रखे जा सकते, पर इनकी संख्या कभी भी 700 स कम नहीं रही है। इतने मरीजों को साल भर खाना देन का बजट मात्र 14 लाख रुपए और कपड़ों पर व्यय की सीमा दो लाख रुपए है। साढ़े तीन सौ मुस्टंडे अटेंडेंट, जिनके आतंक से रोगी थर-थर कांपते हैं, उनकी मौजूदगी में मरीजों के तन तक क्या पहुंचता होगा, इसकी कल्पना ही रोंगटे खड़े कर देती है। हमारे देश में कुत्ते-बिल्लियों की ठीक तरह से देखभाल के लिए अखबारों के नियमित कालम छपते हैं। इलेक्ट्रानिक्स मीडिया पर भी वे प्राथमिकता में हैं, लकिन मानव योनि में जन्मे, किन्हीं हालातों के शिकार होकर मानसिक संतुलन खोए लोगों के पशु से भी बदतर जीवन पर न तो सरकार गंभीर है और न ही समाज संवेदनशील ! श्चड्डठ्ठद्मड्डद्भट्ठष्द्धड्डह्लह्वr1द्गस्र्न्ञ्चद्धoह्लद्वड्डन्द्य.ष्oद्व लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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