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सक्रिय हुए जातीय संगठन

चुनाव आते ही राज्य की जातीय राजनीति में गजब की तेजी आ जाती है। अपनी जाति के वोटरों को गोलबंद करने के लिए कोई सम्मेलन आयोजित करता है तो कोई धरना व प्रदर्शन। कभी भूमिहार ब्राह्मण सभा का सम्मेलन तो कभी कुशवाहा और यादव सभा का तो कभी अति पिछड़ों का सम्मेलन।ड्ढr इन जातीय संगठनों की एक खास विशेषता यह है कि ये अपनी जाति के ही किसी न किसी महापुरुष की पुण्यतिथि या जयंती आयोजित कर सत्ताधारी दल या विपक्ष के खिलाफ जमकर भड़ास निकालते हैं। इनका एक ही मकसद होता है टिकट के लिए राजनीतिक दलों पर दबाव बनाना। इन जातीय संगठनों को किसी न किसी राजनीतिक दल के नेता का वरदहस्त प्राप्त होता है।ड्ढr ड्ढr सभी संगठनों की एक ही शिकायत रहती है-सत्ता में उनकी भागीदारी नगण्य है इसलिए सत्ता में समुचित भागीदारी चाहिए। हाल ही में जब उपेन्द्र कुशवाहा को जदयू व राष्ट्रवादी पार्टी ने रास्ता दिखाया तो कुशवाहा जाति ने हाय -तौबा मचाना शुरू कर दिया। भाजपा नेता चन्द्रमोहन राय और जदयू विधायक अजीत कुमार को जब मंत्रिमंडल से बाहर निकाला गया तो ब्रह्मर्षि और भूमिहार महासभा सक्रिय हो गयी। हाल में ही दोनों पूर्व मंत्रियों ने सर गणेश दत्त और स्वामी सहजानंद सरस्वती की जयंती के बहाने राज्य सरकार पर खूब निशाना साधा।ड्ढr ड्ढr प्राय: हर चुनाव के पहले ये संगठन सक्रिय हो जाते हैं। चुनाव के मौके पर इन नेताओं की रणनीति यही हाती है कि किसी तरह पार्टी का टिकट लिया जाए और फिर मंत्री बना जाए। जब अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल से पद्मश्री डा. सी. पी. ठाकुर को हटाया गया तो ब्रह्मर्षि सभा के राजनेता पूर प्रदेश में आंदोलन चलाने लगे और मजबूरन एनडीए सरकार में डा. ठाकुर को फिर से जगह मिली। जद यू में जब पूर्व मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र और आपदा प्रब़ंधन मंत्री नीतीश मिश्रा को दरकिनार किया गया तो हाल ही में ब्राह्मण महासभा ने मालवीय महापर्व के बहाने राज्य सरकार को जमकर कोसा। लोकसभा चुनाव में अधिक से अधिक टिकट पाने के लिए वैश्य महासम्मेलन ने पूर राज्य में वैश्य चेतना यात्रा शुरू की। अपनी जाति के वोट बैंक में सेंधमारी को रोकने के साथ ही इनकी नजर इन दिनों महादलितों व अतिपिछड़ों पर भी टिकी है, तभी तो उनके कल्याण के लिए वायदों की बौछार करने व आंसू बहाने से भी ये बाज नहीं आते।

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