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सर्वदलीय वादा निभाने का अवसर

लोकसभा का चुनाव सामने है। उम्मीदवारों के चयन का काम जारी है। भारतीय संसद ने 1में ‘राजनीति के अपराधीकरण और भ्रष्टाचार की समाप्ति’ के लिए जो सर्वसम्मत संकल्प किया था, उसे पूरा करन का यही अवसर है। अब जबकि इन दो बुराइयों से अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद को भी ताकत मिलन की खबरें आने लगी हैं, तो अब भी हमारे देश के विभिन्न दल और नेता नहीं चेतेंगे? लोकसभा चुनाव के ठीक पहले सभी दलों के नेता आपसी सहमति से यह तय कर सकते हैं कि वे ऐसे किसी व्यक्ित को उम्मीदवार नहीं बनाएंगे, जो आदतन अपराधी प्रवृत्ति का है या फिर जिसने भ्रष्टाचार के जरिए अपार निजी संपत्ति बनाई है। यदि नेताओं की मंशा सही हो, तो इस बात का पता लगाना अत्यंत आसान है कि कौन-सा व्यक्ित अपराधी प्रवृत्ति का है और किस व्यक्ित के जीवन का उद्देश्य जनसेवा नहीं बल्कि धनोपार्जन है। यदि मंशा ठीक नहीं है तो किसी को दोषी मानने से पहले उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट की कॉपी की मांग की जा सकती है। पिछले एक चुनाव में बिहार के एक प्रमुख नेता से पूछा गया था कि आप आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को अपने दल से उम्मीदवार क्यों बना रहे हैं? उन्होंने जवाब में सार्वजनिक रूप स कहा कि हम बाघ के खिलाफ किसी बकरी को तो चुनाव में उम्मीदवार नहीं बना सकते न! वे यह कहना चाहते थे कि जब तक अन्य दल बाहुबलियों को टिकट देते रहेंगे, तब तक वे भी ऐसे लोगों को उम्मीदवार बनाते रहेंगे। पर अभी समय है जबकि वे नेता अपने प्रतिद्वंद्वी नेताओं से अपील कर सकते हैं कि आप भी बाहुबलियों को टिकट इस बार मत दीजिए, हम भी नहीं देंगे। आजादी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर छह दिनों तक चले संसद के दोनों सदनों के विशेष सत्र में पारित प्रस्ताव में कहा गया कि ‘संसद ने आज एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए भारत के भावी कार्यक्रम के रूप में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास किया। प्रस्ताव में भ्रष्टाचार को समाप्त करने, राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करन के साथ-साथ चुनाव सुधार करने, जनसंख्या वृद्धि, निरक्षरता और बेरोजगारी को दूर करन के लिए जोरदार राष्ट्रीय अभियान चलान का संकल्प किया गया। ’ छह दिनों की चर्चा के बाद जो प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास किया गया, उस प्रस्ताव को अटल बिहारी वाजपेयी, इंद्रजीत गुप्त, सुरजीत सिंह बरनाला, कांशीराम, जार्ज फर्नांडीस, शरद यादव, सोमनाथ चटर्जी, मुरासोली मारन, मुलायम सिंह यादव, डा़ एमोगन्नाथ, अजित कुमार मेहता, मधुकर सरपोतदार, सनत कुमार मंडल, वीरन्द्र कुमार वैश्य, ओम प्रकाश जिंदल और राम बहादुर सिंह ने सामूहिक रूप से पेश किया था। प्रस्ताव की एक खास पृष्ठभूमि थी। सन् 1े लोकसभा चुनाव में विभिन्न दलों की ओर से 40 ऐसे व्यक्ित लोकसभा के सदस्य चुन लिए गए थे, जिन पर गंभीर आपराधिक मामले अदालतों में चल रहे थे। दो बाहुबली सदस्यों ने लोकसभा के अंदर एक दिन आपस में मारपीट कर ली। इसको लेकर अनेक नेता शर्मसार हो उठे और तय किया गया कि ऐसी समस्याओं पर सदन में विशेष चर्चा की जाए, उन्हें रोकने के लिए कदम उठाए जाएं। इस विशेष चर्चा के दौरान सदन में कोई दूसरा कामकाज नहीं हुआ। वक्ताओं ने सदन में देशहित में भावपूर्ण भाषण किए, पर उसके बाद जब सन् 1और 2004 में जब लोक सभा के चुनाव हुए तो हमारे इन्हीं नेताओं ने अपने ही वायदे भुला दिए। बाहुबली सांसदों की संख्या इस बीच 40 से बढ॥कर करीब सौ हो गई। हाल में जब देश पर आतंकवादी हमले तेज हुए तो सुरक्षा मामलों के जानकारों ने बताया कि माफिया और आपराधिक प्रवृत्ति के प्रभावशाली लोग विदेशी आतंकियों के लिए शरणस्थली मुहैया कराते हैं। इस पृष्ठभूमि में देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जरूरी है कि जिन दलों और नेताओं ने आजादी की स्वर्ण जयंती के अवसर पर संसद में बैठकर देश के सामने जो सर्वसम्मत वादा किया था, उसे वे अब देश की सुरक्षा को ध्यान में रख कर पूरा करें। किसी विवादास्पद व्यक्ित को इस बार लोकसभा चुनाव का उम्मीदवार नहीं बनाएंगे, यह फैसला अभी भी हो सकता है। जिन मुद्दों और समस्याओं को लेकर हमारे नेताओं ने तब संसद में भारी चिंता प्रकट की थी, उन मामलों में इस देश की हालत तब की अपेक्षा अब अधिक बिगड़ी है। पर तब हमारे नेताओं ने 1में सदन में क्या- क्या कहा था, उसकी कुछ बानगियां यहां पेश हैं। इससे भी यह पता चलेगा कि इन समस्याओं को हल करना अब और भी कितना जरूरी हो गया है, यदि इस देश में लोकतंत्र को बनाए रखना है और एकता-अखंडता कायम रखनी है। लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने बहस का समापन करते हुए कहा था कि ‘एक बात सबसे प्रमुखता से उभरी है कि भ्रष्टाचार को समाप्त किया जाना चाहिए। इस बारे में कथनी ही पर्याप्त नहीं, करनी भी जरूरी है। ’ उन्होंने यह भी कहा था कि राजनीति के अपराधीकरण के कारण भ्रष्टाचार बढ़ा है। पूर्व प्रधानमंत्री एच़ डी़ देवगौड़ा न कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सभी दलों को मिलकर लड़ाई लड़नी चाहिए। तत्कालीन रेल मंत्री रामविलास पासवान न कहा कि देश के सामने उपस्थित समस्याओं के हल के लिए सभी दलों को मिल बैठकर ठोस कदम उठाने चाहिए। तत्कालीन स्पीकर पी़ ए़ संगमा ने तो आजादी की दूसरी लड़ाई छेड़ने का आह्वान कर दिया। इस बीच इस देश के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह रही कि दो प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस के टिकट पर ही गत लोक सभा चुनाव में क्रमश: 26 और 16 ऐसे उम्मीदवार जीत कर आ गए जिन पर अनेक आपराधिक मुकदमें विभिन्न अदालतों में चल रहे हैं, जबकि 1में संसद में जो प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ था, उसे भाजपा नेता वाजपेयी ने ही पेश किया था। यह भी दुर्भाग्यपूर्ण ही रहा कि इस बीच राजनीति के अपराधीकरण व भ्रष्टाचार के खिलाफ जो भी कदम उठाए गए, वे मुख्यत: चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की पहल पर ही उठाए गए। इस मामले में एनडीए सरकार का छह साल का कार्यकाल भी खुद अटल बिहारी वाजपेयी की उस भावना के अनुकूल नहीं रहा जो भावना अटल जी ने 1में लोकसभा में व्यक्त की थी। अब जब विदेशी आतंकवादियों द्वारा हमारे लोकतंत्र की उपयरुक्त बुराइयों का लाभ उठान की आशंका बढ़ गई है तो क्या अब भी पक्ष-विपक्ष की राजनीति उन वायदों को पूरा करन की दिशा में कोई कदम उठाएगी? ह्यह्वद्मन्ह्यद्धorद्गट्ठश्चड्डह्लठ्ठड्ड ञ्च4ड्डद्धoo.ष्o.न्ठ्ठ लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।ं

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