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लोकसभा का लेखा

चौदहवीं लोकसभा ने भारतीय लोकतंत्र को वहां तक सकुशल पहुंचा दिया है, जहां तक का टिकट उसने लिया था। त्रिशंकु जनादेश वाली संसद और पहले आर्थिक तरक्की के साथ ही जुड़े आतंकवाद और फिर आर्थिक मंदी से बनी निराशा के बीच एसा हो पाना लोकतंत्र और उसके लोकधर्म को साधने वाले सबसे महत्वपूर्ण उपकरण के लिए एक उपलब्धि तो कही ही जाएगी। जब लोकतंत्र अगली यात्रा के टिकट लेने और गठरी बांधने में लगा है तो यह जानकर आश्चर्य होता है कि जो विपक्ष में था, उसने सक्रिय भूमिका नहीं निभाई और जो सत्तापक्ष के साथ था उसने सबसे सक्रिय विपक्ष का काम किया। माकपा का कोई सांसद बहस से गैर-हाजिर नहीं रहा, जबकि भाजपा के 13 प्रतिशत सांसदों ने बहस में हिस्सा नहीं लिया। जहां तक सदन में हाजिर होने की बात है तो माकपा सांसदों की हाजिरी सबसे ज्यादा यानी 7ीसद और भाजपा सांसदों की 67 फीसद रही। सत्तारूढ़ दल होने के नाते कांग्रेस सदस्यों की उपस्थिति 73 फीसद रही जो कि कम ही कही जाएगी, लेकिन आमतौर पर कुछ क्षेत्रीय और निजी हितों से जुड़े मुद्दों में उलझे रहने का आरोप झेलने वाले क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी और भागीदारी भाजपा जसे प्रमुख विपक्षी दल की तुलना में बेहतर रही । वैसे लोकसभा की बैठकों की घटती संख्या और बैठकों के दौरान होने वाले बढ़ते व्यवधानों से जहां चिंता बढ़ती है, वहीं भागीदारी के दलगत आंकड़ों को देखकर लगता है कि हमारी लोकसभा का एक अप्रत्याशित और नया रूप उभर रहा है। विडंबना देखिए कि जो पार्टी अपने संविधान को देश के संविधान से बड़ा मानते हुए स्पीकर पर इस्तीफा देने का दबाव डालती है, उसी पार्टी का 3साल तक प्रतिनिधित्व करने वाले सोमनाथ चटर्ाी संविधान के साथ जा खड़े होते हैं। दूसरी तरफ जिस भाजपा पर सरकार की सबसे कड़ी निगरानी करने की जिम्मेदारी थी, वह सबसे ज्यादा खामोश रहती है और यहां तक कि प्रधानमंत्री को उसके रचनात्मक सहयोग को याद करना पड़ता है। लेकिन उससे भी नई बात यह है कि गैर-ािम्मेदार कहे जाने वाले क्षेत्रीय दल जिम्मेदार भूमिका निभाते हुए दिखे। रिश्वत लेकर सवाल पूछने के आरोप में दस सांसदों का निष्कासन, सांसद निधि के घपले में चार सांसदों का निलंबन और संसद में नोट की गड्डियां लहराए जाने की घटनाएं जरूर इस लोकसभा को लांछित करती रहेंगी, पर इसी से सबक लेकर एक बेहतर लोकसभा चुने जाने का विकल्प भारतीय जनता के सामने खुला हुआ है।

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