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विकास बनाम गठचाोड़

बिहार के संसदीय चुनावों में यह शायद पहला मौका होगा जब चुनाव में जाति, बाहुबल और गठाोड़ के अलावा भी कुछ नजर आएगा। देश के अन्य प्रदेशों में बह रही और चुनावों में अपना असर दिखा चुकी विकास की बयार के झोंके यहां भी असर दिखा रहे हैं। अच्छा तो यह है कि जनता भी विकास को कुछ मुद्दों से ऊपर मान रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसे अभी तक अपना मुद्दा मान रहे थे और उन्होंने काम-प्रचार साथ कर इसको बहस के रूप में बदलवा भी दिया।ड्ढr ड्ढr लालू प्रसाद यादव भी बतौर रलमंत्री ऐसा कुछ करने की कोशिश कर गए कि बिहार को काफी कुछ मिला और प्रदेश में अपनी पार्टी के तीन कार्यकालों की छवि को साफ करने में लग गए। प्रदेश के तीसर बड़े नेता उर्वरक मंत्री रामविलास पासवान भी इसमें जुटे। कारखाने लगाने की प्रक्रिया शुरू की और लगवाए भी। पर संसदीय चुनाव में पहली बार ऐसा होगा कि जनता के समक्ष सिर्फ वोट बैंक का मुद्दा नही होगा। इसे सड़क, पुल, शिक्षा, मकान और भयमुक्त राज्य की बातों पर भी साक्षी होना पड़ रहा है। ऐसा बहुत कम प्रदेशों में होगा जहां विपक्ष भी अपने तरीके से विकास की बात कर रहा है। लेकिन सब कुछ आसान नहीं होगा। चुनाव जीतने के लिए जितने भी गठाोड़ किए जा सकते हैं, किए जा रहे हैं। प्रदेश में सत्तारूढ़ जद(यू)-भाजपा का गठाोड़ फेवीकोल सा है। आडवाणी के मंदिर राग के बावजूद। 40 सीटों में से 24:16 अनुपात तक साथ मान्य है। खेल तो दूसर खेमे में है और अगर सब कुछ ठीक रहा तो सामने वाले का खेल बिगाड़ने की कूव्वत भी लालू-पासवान गठाोड़ में है।ड्ढr ड्ढr लेकिन यहां दिक्कत सीटों के बंटवार पर ही है। लालू उदार नजर आ रहे हैं और पासवान कड़े। फिलहाल वह16 पर डटे हैं। कांग्रेस यहां पांच पर ही सिमटी रहेगी। राष्ट्रीय जनता दल ने पिछले चुनाव में 22 सीटें जीती थी, इसलिए इससे कम पर लड़ना नहीं चाहती। लालू की समस्या बाकी और साथी दलों को एडास्ट करने की है। पासवान थोड़ा हां, थोड़ा ना के बाद 13 तक आ सकते हैं। लेकिन यह सच है कि समीकरण में पासवान आज यूपीए की जरूरत बन गए हैं। दलित प्रधानमंत्री मायावती की कुर्सी के सामने उनकी कुर्सी रखने का काम चल रहा है। पिछले लोकसभा-विधानसभा चुनाव में सीटों के हेरफेर के बावजूद जद (यू)-भाजपा का मत-प्रतिशत घटा-बढ़ा नहीं। पर लोकसभा से विधानसभा आते-आते लालू की पार्टी का सात प्रतिशत मत घटा और पासवान की पार्टी लोजपा का भी वोट बैंक तीन प्रतिशत बढ़ गया। लेकिन दिक्कत यह है कि जद (यू)-भाजपा के साथ कोई और आने को तैयार नहीं और राजद-लोजपा कैसे पुराने साथियों को जोड़ेंगे, यह बड़ा सवाल होगा। प्रदेश के 16 फीसदी मुसलमानों के एकमुश्त जाने की संभावनाएं अब भी लालू को कितना उत्साहित करंगी, यह भी वक्त तय करगा। लेकिन यह तय है कि इस बार चुनावी पंडितों के वोट प्रतिशत की जड़ता, विकास के पुज्रे कुछ तोड़ेंगे जरूर।

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  • Web Title: बाइस्कोप