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दो टूक

अभी सूरा तप नहीं रहा, पर झारखंड में जल के लिए त्राहि शुरू हो चुकी है। भूवैज्ञानिक वर्षो से संकट की चेतावनी देते रहे हैं, पर सरकारों ने इस दिशा में कुछ भी नहीं किया। जलछाजन परियोजनाएं लटकी हैं, जलाशयों के उदर में मिट्टी भर चुकी है, मल्टीस्टोरीा बिल्डिंगों में वाटर रिचार्ज की नियमावलियां ताक पर रख काम हो रहा है। मुहल्लों में रतजगा शुरू हो चुका है। कुछ दिनों बाद पानी के लिए लाठियां भी चलेंगी। इस स्थिति तक पहुंचने की वजहें हैं। सरकारें निकम्मी हैं, यह आसानी से कह देते हैं, पर क्या अपना कोई कर्तव्य नहीं? पता नहीं, अस्तित्व से जुड़े इस मुद्दे को आमलोग और तमाम संस्थाओं ने टेकेन फॉर ग्रांटेड क्यों ले रखा है। स्थिति भयावह है। अस्तित्व दांव पर है। क्या अब भी हम चेतेंगे? ं

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