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राजरंग

नेता जी की मौजा ही मौजा..ड्ढr दीपों को प्रज्वलित करने वाले, राज्य में पंजा छाप के मुखिया। बालकों का स्वभाव नहीं है फिर भी बाल स्वरूप। नेता जी डायरक्ट यूपीए की सरकार तो नहीं बना पाये, लेकिन बंधुबांधव और भानुमति का पिटारा के मालिक के प्रयास से यूपीए सत्ता में आ गयी। नेता जी की खिचड़ी दाढ़ी और चमकने लगी। हमेशा कांके रोड में ही नजर आते थे, लेकिन मुखिया जी को हड़काते भी थे। हमारा काम करिये नहीं तो कुर्सी पर से गिरा देंगे। राजनीतिक गेम में दाढ़ी वाले बाबा सफल नहीं हो पाये, तो पंजा के मुखिया जी दिल्ली तक दौड़ लगा दिये कि अब किसी की सरकार नहीं बननी चाहिए ताकि अप्रत्यक्ष रूप से उनका शासन आ जाये। शासन भी आ गया। काम भी होने लगा। अब नेता जी पार्टी में अपना जलवा दिखाना शरू कर दिये हैं। पार्टी की बात पब्लिक के बीच लाने वाला सही रहेगा, तो पार्टी का रंग-ढंग सही रहेगा। चुनाव में स्थिति ठीक रहेगी। नेता जी सोच रहे हैं कि पंजा छाप पूरी तरह से छा जाये, तो उनका राज प्रत्यक्ष से आ जायेगा। फिर तो नेता जी की मौजा ही मौजा होगी।

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