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दक्षिण एशिया पर अमेरिका की नजर

ओबामा प्रशासन की विदेश नीति के केंद्र में एशिया है। इस नए रुझान पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि एक तरफ चीन इस इलाके की एसी उभरती हुई शक्ित है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अमेरिका की प्रधानता को चुनौती देने की ताकत रखता है। दूसरी तरफ अमेरिका अफगानिस्तान की लड़ाई हारने के कगार पर पहुंच गया है। इसी के तहत विदेश मंत्री हिलेरी क्िलंटन ने अपने पहले दौर के लिए एशिया को चुना ताकि पुराने मित्रों को आश्वस्त किया जा सके और नए मित्रों से कंधा मिलाया जा सके। इस दौरान दक्षिण एशिया का एक और महत्वपूर्ण दौरा पाकिस्तान और अफगानिस्तान के विशेष अमेरिकी दूत रिचर्ड हॉलब्रुक का चल ही रहा था। यह ओबामा प्रशासन का एक महत्वपूर्ण प्रयास है क्योंकि उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता अफगानिस्तान में जीत की नई रणनीति बनाने की है। हॉलब्रुक का दक्षिण एशिया का दौरा उस समय हुआ जब इस इलाके में बेचैनी बढ़ रही थी। सन् 2001 में अफगानिस्तान पर पश्चिमी आक्रमण के बाद तालिबान और अलकायदा के खिलाफ अमेरिका और नाटो की लड़ाई सबसे कमजोर स्थिति में चल रही है। पाकिस्तान की स्वात घाटी जिस तरह से लगातार तालिबानी नियंत्रण में होती जा रही है, उससे स्पष्ट है कि वहां की स्थिति बड़ी नाजुक है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने साफ तौर पर कहा है कि उनका देश अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। इस बीच पिछले नवंबर में मुंबई पर आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव भी बढ़ गया है। अफगानिस्तान में हामिद कराई के नेतृत्व से अमेरिका की निराशा आज अपने चरम पर है। हॉलब्रुक कराई के कड़े आलोचक रहे हैं, इसलिए उन्हें काबुल में कुछ कुशल राजनयिक काम भी करने थे। दरअसल कराई की सरकार बेहद भ्रष्ट, अकुशल रही है, इसीलिए सरकार की विश्वसनीयता की रिक्तता को भरने के लिए तमाम विद्रोही समूहों को उभरने का अवसर मिला। मौजूदा अमेरिकी उपराष्ट्रपति जोए बिडेन जब पिछली फरवरी में सीनेटर थे तो अफगानी राष्ट्रपति कराई के हाथों से हालात के फिसलने पर नाराजगी जताते हुए उनके डिनर से उठ कर चले गए थे। लेकिन असली समस्या पाकिस्तान के उन आदिवासी इलाक ों से उठ रही है जहां विद्रोहियों ने पनाह ले रखी है। फाटा और बलूचिस्तान के अपने अभयारण्यों से वे अफ गानिस्तान में लड़ रही पश्चिम की सेनाओं पर कहर बरपा रहे हैं। अफगानिस्तान के हालात तब तक नहीं सुधर सकते जब तक पाकिस्तान के सीमाई इलाके के नियंत्रण में प्रगति न हो। इस बीच पाकिस्तान सरकार ने कट्टर इस्लामी संगठनों की मांगों को मान कर, कभी मशहूर पर्यटन स्थल रही स्वात घाटी में शरीयत कानून लागू कर दिया है। यह इस्लामी संगठनों को दी गई खतरनाक रियायत है। हॉलब्रुक ने स्पष्ट कहा है कि स्वात घाटी में बागियों की जीत अमेरिका, भारत और पाकिस्तान के लिए समान रूप से खतरा है। तालिबान जिस तरह से दुनिया के दूसर नंबर के सबसे बड़े और एटमी हथियार संपन्न एकमात्र मुस्लिम देश पर अपनी पकड़ जमा रहा है, उससे वैश्विक सुरक्षा के लिए बेहद खतरनाक स्थिति बन रही है। अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तान आतंकवादियों का अच्छी तरह से मुकाबला कर और अपने सीमाई इलाकों को नियंत्रित कर जो भारत और पाकिस्तान के स्थिर रिश्तों पर निर्भर है। इस मामले में पाकिस्तान अमेरिका को लंबे समय से ब्लैकमेल कर रहा है और मुंबई पर आतंकी हमले के बाद भारत ने जिस तरह दबाव बनाया है, उससे उसकी यह दलील और तेज हो गई है कि वह अपनी पश्चिमी सीमा से सेनाएं हटा कर भारतीय सीमा पर लगाना चाहता है। लेकिन इस तरह का रुख भी लंबे समय तक ठहर नहीं सकता क्योंकि इस्लामी हमले बढ़ने के साथ पाकिस्तान का अपना भविष्य दांव पर लग गया है। अमेरिकी सीनेट की खुफि या समिति के सामने अपने बयान में राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी के निदेशक एडमिरल डेनिस ब्लेयर ने कहा, ‘पाकिस्तान के कानून और अन्य हालात बेहद चिंताजनक हैं फिरकापरस्ती, जातीय और गिरोहों की हिंसा बढ़ने की आशंका इस कदर है कि पाकिस्तान का एलीट खुद खतर में है।’ पाकिस्तान चाहता है कि अमेरिका करोड़ों डालर की नई सहायता जल्दी दे और रक्षा व खुफिया सहयोग का दायरा बढ़ाए। हालांकि इसके भी काफी संकेत हैं कि पाकिस्तान को सहायता मिलने की शर्त उसकी आतंक विरोधी लड़ाई से जुड़ी होगी। इन दोनों देशों का समाज एक दूसर से होड़ करते आदिवासी और जातीय समुदायों के जटिल संबंधों का एक जाल है और उनकी स्थिरता के लिए सेक्युलर शिक्षा प्रणाली जसे राष्ट्रीय संस्थान और नागरिक प्रशासन के तहत काम करने वाले सुरक्षा बल जरूरी हैं। यह एक कठिन लक्ष्य है, पर यह एसा उद्देश्य है जिस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जोर देते रहना चाहिए। भारत ने इसी लक्ष्य को ध्यान में रख कर अफगानिस्तान में 1.2 अरब डालर का विकास संबंधी अनुदान उड़ेल दिया था। अपने दौर के समय हॉलब्रुक ने पाकिस्तान पर इस बात के लिए काफी दबाव डाला कि वह यह स्वीकार कर कि मुंबई हमलों की साजिश पाकिस्तान में ही रची गई थी। हालांकि पाकिस्तान ने उस मामले पर ना-नुकुर करने में कई हफ्ते निकाल दिए। लेकिन दशकों के आतंकवाद के बाद उसने पहली बार यह माना कि इसकी योजना उसकी जमीन पर बनी। ओबामा प्रशासन ने पाक सेना पर नागरिक प्रशासन नियंत्रण बढ़ाने का निर्णय ले लिया है ताकि वह सेना से अफगानिस्तान में आतंक से लड़ाई लड़वा सके। लेकिन यह अभी स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका इस नीति पर चलने के लिए कितना धैर्य दिखा पाएगा? फिलहाल अमेरिका पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता में बेतहाशा बढ़ोतरी कर रहा है। गैर सैन्य सहायता को तीन गुना कर रहा है और मौजूदा सैन्य सहायता को बरकरार रख रहा है। पर वह बदमाश खुफिया संगठन आईएसआई को नागरिक प्रशासन के नियंत्रण में लाने का प्रयास नहीं कर रहा है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में स्थिरता लाने और सिंधु व हिंदकुश इलाके के बीच से उठने वाली सुरक्षा चुनौतियों को रोकने में भारत और अमेरिका का साझा हित है, लेकिन भारत के लिए चिंताजनक बात यह है कि अमेरिका ने अच्छे और बुर आतंकियों और हमारी व उनकी सुरक्षा के लिए खतरनाक समूहों में भेद करना शुरू कर दिया है। वे अलकायदा और तालिबान के बीच भी एसा ही फर्क कर रहे हैं । इस रवैए पर भारत को अपनी आपत्तियां दर्ज करा देनीं चाहिए। हालांकि हॉलब्रुक की दक्षिण एशिया की हाल की यात्रा से यह संकेत मिले हैं कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के लिए अमेरिका की नई रणनीति की घोषणा के साथ भारत के साथ उसका सहयोग और बढ़ सकता है। द्धड्डrह्यद्ध.श्चड्डठ्ठह्ल ञ्चद्मष्द्य.ड्डष्.ह्वद्म लेखक किंग्स कॉलेज लंदन में प्राध्यापक हैं।

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